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Varanasi : वाराणसी की सुबह हमेशा कुछ खास होती है, लेकिन संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय का यह दिन और भी विशेष था। चारों ओर पीले फूल, हल्की ठंडी हवा और विद्यार्थियों के चेहरे पर मुस्कान… मानो बसंत स्वयं विश्वविद्यालय परिसर में उतर आया हो।

परंपरा से जुड़ने की अनोखी पहल
इसी माहौल में डॉ. श्रुति शाश्वत उपाध्याय अपने सहयोगियों के साथ एक ऐसी पहल में जुटी थीं, जिसका मकसद सिर्फ एक कार्यक्रम करना नहीं था, बल्कि अपनी जड़ों से जुड़ने की कोशिश थी। उनके साथ आचार्य अनुराग तिवारी, मानस तिवारी और अन्य शिक्षक-शिक्षिकाएं भी इस सांस्कृतिक यात्रा का हिस्सा बने।
डॉ. श्रुति की सोच : संस्कृति से जुड़ाव जरूरी
डॉ. श्रुति बताती हैं, “आज की तेज़ रफ्तार ज़िंदगी में बच्चे अपनी परंपराओं से दूर होते जा रहे हैं। हमने सोचा कि क्यों न संगीत के माध्यम से उन्हें फिर से अपनी संस्कृति से जोड़ा जाए।” डॉ. श्रुति की आंखों में संतोष झलक रहा था। वह कहती हैं, “अगर आज एक भी बच्चा अपनी परंपरा से जुड़ गया, तो हमारा प्रयास सफल है।”
बनारस के संपूर्णानंद विवि में बसंतोत्सव : संगीत के सुरों में सजी भारतीय परंपरा…
डॉ. श्रुति शाश्वत उपाध्याय अपने सहयोगी आचार्य अनुराग तिवारी, मानस तिवारी और अन्य के साथ गया गीत।#banaras #varanashi pic.twitter.com/ujifCv8bQM— News Samvad (@newssamvaad) January 25, 2026
सुरों में बसी यादें और भावनाएं
कार्यक्रम की शुरुआत जैसे ही पारंपरिक गीतों से हुई, माहौल भावनाओं से भर गया। कुछ छात्र आंखें बंद कर सुरों में खो गए, तो कुछ बुज़ुर्ग शिक्षक अपने पुराने दिनों को याद करते नजर आए। हर सुर, हर ताल, मानो अतीत और वर्तमान के बीच एक पुल बना रहा था।
आचार्य अनुराग का भावुक संदेश
आचार्य अनुराग तिवारी कहते हैं, “यह सिर्फ प्रस्तुति नहीं थी, यह हमारी आत्मा की आवाज़ थी। जब बच्चे इन गीतों को सीखते हैं, तो वे अपने इतिहास को भी सीखते हैं।”
मेहनत और समर्पण की कहानी
मानस तिवारी और उनकी टीम ने कार्यक्रम की तैयारी में कई दिन लगाए। सुबह की कक्षाओं के बाद अभ्यास, शाम को रियाज़ और फिर मंच पर वही मेहनत रंग लाती दिखाई दी। किसी ने अपनी पढ़ाई के साथ संतुलन बनाया, तो किसी ने घर की जिम्मेदारियों के बीच समय निकाला।
मौके पर मौजूद एक छात्रा कहती है, “पहले मुझे ये गीत पुराने लगते थे, लेकिन जब मैंने इन्हें समझा, तो लगा कि ये हमारी पहचान हैं।”
दर्शकों की आंखों में गर्व
कार्यक्रम के दौरान दर्शकों की आंखों में गर्व साफ दिखाई दे रहा था। अभिभावक, शिक्षक और विद्यार्थी… सभी को महसूस हो रहा था कि यह आयोजन सिर्फ मनोरंजन नहीं, बल्कि संस्कृति को बचाने की एक कोशिश है।
तालियों में गूंजता संदेश
कार्यक्रम के अंत में तालियों की गूंज देर तक परिसर में गूंजती रही। वह सिर्फ कलाकारों के लिए नहीं थी, बल्कि उस सोच के लिए थी, जो कहती है कि आधुनिकता के बीच भी अपनी जड़ों को थामे रखना जरूरी है।
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