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News Samvad : इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन (ISS) पिछले कई वर्षों से धरती की कक्षा में वैज्ञानिक अनुसंधान का केंद्र बना हुआ है। अब इसका कार्यकाल समाप्त होने की ओर है और अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा इसे नियंत्रित तरीके से धरती पर वापस लाने की तैयारी कर रही है। हालांकि इस योजना को लेकर पर्यावरण विशेषज्ञों ने गंभीर चिंताएं जताई हैं।
क्या है नासा का प्लान?
नासा के अनुसार, 2028 से ISS को धीरे-धीरे नीचे लाने की प्रक्रिया शुरू होगी। इसके लिए प्राकृतिक वायुमंडलीय खिंचाव और स्टेशन के रूसी हिस्से की मदद ली जाएगी। इसके बाद 2029 में एक विशेष U.S. Deorbit Vehicle को ISS से जोड़ा जाएगा। यह वाहन नासा के लिए स्पेसएक्स ने तैयार किया है।अंतिम चरण में ISS को प्रशांत महासागर के दूरस्थ क्षेत्र पॉइंट निमो की ओर निर्देशित किया जाएगा। यह इलाका दुनिया की आबादी से सबसे दूर माना जाता है, इसलिए मलबा गिरने से लोगों को नुकसान होने की संभावना बेहद कम रहती है।
पर्यावरण विशेषज्ञों की चिंता
समुद्री पर्यावरण संरक्षण के लिए काम करने वाली ओशन फाउंडेशन ने इस योजना पर सवाल उठाए हैं। संस्था के अध्यक्ष मार्क स्पाल्डिंग का कहना है कि फुटबॉल मैदान जितने बड़े ISS का पूरा हिस्सा वायुमंडल में जलकर खत्म नहीं होगा। इसके कुछ भारी और मजबूत हिस्से समुद्र की गहराई तक पहुंच सकते हैं।विशेषज्ञों का मानना है कि अभी तक यह स्पष्ट नहीं किया गया है कि कौन-कौन से पदार्थ समुद्र तल तक पहुंचेंगे और उनका समुद्री जीवों व पारिस्थितिकी तंत्र पर क्या प्रभाव पड़ेगा। यही अनिश्चितता सबसे बड़ी चिंता का कारण है।
कानून में भी है खामी
1972 के स्पेस लायबिलिटी कन्वेंशन के तहत यदि अंतरिक्ष मलबा किसी देश की जमीन पर गिरकर नुकसान पहुंचाता है तो जिम्मेदार देश को मुआवजा देना पड़ सकता है। लेकिन खुले समुद्र में गिरने वाले मलबे के लिए ऐसी कोई स्पष्ट व्यवस्था नहीं है। इसी कारण कई स्पेस एजेंसियां पुराने अंतरिक्ष ढांचों को समुद्र में गिराने का विकल्प चुनती हैं।
ओशन फाउंडेशन की मांग
संस्था ने मांग की है कि ISS को गिराने से पहले विस्तृत पर्यावरणीय प्रभाव आकलन कराया जाए। साथ ही समुद्र तल तक पहुंचने वाले सभी मैटेरियल की जानकारी सार्वजनिक की जाए और अंतरराष्ट्रीय कानूनों के तहत जवाबदेही तय की जाए।विशेषज्ञों का कहना है कि खुले समुद्र का कोई मालिक नहीं होने के कारण जवाबदेही तय करना मुश्किल है। ISS का डीऑर्बिट प्लान अब इसी कानूनी और पर्यावरणीय बहस को दुनिया के सामने ला रहा है।
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