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Home » दाखिले का नया फॉर्मूला, भाषाओं पर भारी? झारखंड में क्लस्टर सिस्टम पर छिड़ी बड़ी बहस
झारखंड

दाखिले का नया फॉर्मूला, भाषाओं पर भारी? झारखंड में क्लस्टर सिस्टम पर छिड़ी बड़ी बहस

June 25, 2026No Comments3 Mins Read
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भाषाओं
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Ranchi : राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) के तहत झारखंड के विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में लागू क्लस्टर सिस्टम को लेकर छात्रों, शोधार्थियों और भाषा प्रेमियों की चिंता बढ़ गई है। खासकर जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषा (टीआरएल) विभागों में सीटों की कटौती और विषयों के पुनर्वितरण को लेकर सवाल उठ रहे हैं। झारखंड टीआरएल संघ ने राज्यपाल और मुख्यमंत्री को ज्ञापन देकर जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषाओं को क्लस्टर सिस्टम से बाहर रखने की मांग की है।

छात्रों को नहीं मिल रहा मनचाहा विषय

छात्रों का कहना है कि पहले वे अपने नजदीकी कॉलेज में पसंद के विषय के साथ आसानी से नामांकन ले लेते थे, लेकिन अब चांसलर पोर्टल के जरिए सीट आवंटन होने से उन्हें दूसरे कॉलेजों में भेजा जा रहा है। इसका सबसे ज्यादा असर कुरमाली, खोरठा, संताली, मुंडारी और अन्य क्षेत्रीय भाषाओं के विद्यार्थियों पर पड़ा है। कई कॉलेजों में सीटें कम कर दी गई हैं, जबकि कुछ जगहों पर इन विषयों की पढ़ाई सीमित हो गई है।ग्रामीण क्षेत्रों से आने वाले छात्रों को लंबी दूरी तय करनी पड़ रही है। इससे परिवहन खर्च बढ़ रहा है और छात्राओं के सामने सुरक्षा संबंधी चुनौतियां भी खड़ी हो रही हैं।

भाषा संरक्षण पर पड़ सकता है असर

शोधार्थियों और भाषा विशेषज्ञों का मानना है कि यदि क्षेत्रीय भाषाओं में पढ़ाई के अवसर कम होंगे तो इन भाषाओं के संरक्षण और शोध कार्य पर भी असर पड़ेगा। उनका कहना है कि झारखंड की सांस्कृतिक पहचान उसकी भाषाई विविधता से जुड़ी है, इसलिए इन विषयों को विशेष महत्व मिलना चाहिए।

विश्वविद्यालय ने बताया व्यवस्था का उद्देश्य

रांची विश्वविद्यालय की कुलपति डॉ. सरोज शर्मा ने कहा कि क्लस्टर सिस्टम का उद्देश्य उपलब्ध शिक्षकों और संसाधनों का बेहतर उपयोग करना है। उनके अनुसार जिन कॉलेजों में शिक्षकों और विद्यार्थियों का संतुलन बेहतर है, वहां विषयों और सीटों का आवंटन किया जा रहा है। उन्होंने यह भी माना कि छात्रों को आ रही व्यावहारिक समस्याओं पर विश्वविद्यालय गंभीरता से विचार कर रहा है।

शिक्षकों की कमी भी बड़ी चुनौती

कुरमाली भाषा के विद्वान राजाराम महतो का कहना है कि जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषाओं के लिए पुरानी व्यवस्था अधिक उपयुक्त थी। उन्होंने कहा कि भाषा संरक्षण के लिए विद्यार्थियों की आसान पहुंच और पर्याप्त शिक्षकों की उपलब्धता जरूरी है। वर्तमान में नियमित शिक्षकों की कमी भी कई समस्याओं की बड़ी वजह बनी हुई है।क्लस्टर सिस्टम का उद्देश्य शिक्षा व्यवस्था को बेहतर बनाना है, लेकिन झारखंड में इसके क्रियान्वयन को लेकर उठ रहे सवाल यह संकेत दे रहे हैं कि जनजातीय और क्षेत्रीय भाषाओं जैसे संवेदनशील विषयों के लिए स्थानीय जरूरतों को ध्यान में रखते हुए संतुलित समाधान तलाशना जरूरी है।

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