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Home » बिहार का ‘टीचरों का गांव’: 100 घर, 120 शिक्षक… एक चाय की दुकान ने बदल दी पूरी तकदीर
बिहार

बिहार का ‘टीचरों का गांव’: 100 घर, 120 शिक्षक… एक चाय की दुकान ने बदल दी पूरी तकदीर

July 29, 2026No Comments3 Mins Read
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टीचरों
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Nalanda: बिहार के राजगीर का गंजपर टोला अब सिर्फ एक गांव नहीं, बल्कि “टीचरों का गांव” के नाम से पहचाना जाता है। वार्ड संख्या 24 के गंजपर और उपाध्याय टोला में करीब 100 से अधिक घर हैं, लेकिन यहां 120 से ज्यादा शिक्षक सरकारी और निजी संस्थानों में सेवाएं दे रहे हैं। गांव की यह पहचान एक दिन में नहीं बनी। इसके पीछे तीन दशक की मेहनत, सही मार्गदर्शन और शिक्षा के प्रति लोगों का भरोसा है। गांव के लोगों के मुताबिक असली बदलाव साल 2005 में आया। उस समय बिहार सरकार ने प्रशिक्षित शिक्षकों की बहाली शुरू की। नागपुर से बी.पी.एड. की ट्रेनिंग लेकर लौटे गांव के कई युवाओं को एक साथ सरकारी नौकरी मिल गई। इसके बाद दूसरे युवाओं ने भी शिक्षक बनने का रास्ता चुना। धीरे-धीरे गांव में शिक्षकों की संख्या लगातार बढ़ती चली गई।

चाय की दुकान पर हुई मुलाकात ने बदल दी किस्मत

शिक्षक आर्यदेव प्रसाद बताते हैं कि इस बदलाव का श्रेय स्वर्गीय किशोरी प्रसाद यादव को जाता है। 90 के दशक में उनकी मुलाकात राजगीर के शारदा होटल के पास एक चाय की दुकान पर नागपुर के एक कॉलेज के प्रिंसिपल विवेक सर से हुई। बातचीत के दौरान गांव के युवाओं को शारीरिक शिक्षा की ट्रेनिंग दिलाने का विचार बना। इसके बाद किशोरी प्रसाद ने युवाओं को नागपुर भेजना शुरू किया और यही पहल पूरे गांव के लिए वरदान साबित हुई। शारीरिक शिक्षक रणवीर कुमार रत्नाकर बताते हैं कि पहली बहाली के बाद गांव में सरकारी नौकरी पाने की होड़ मच गई। हर परिवार चाहता था कि उसका बेटा या बेटी शिक्षक बने। आज गांव के शिक्षक प्राथमिक विद्यालयों से लेकर माध्यमिक स्कूलों और रेलवे तक अपनी सेवाएं दे रहे हैं।

प्रेरणा देने वाली कहानियां

गांव के चितरंजन ने वकालत की पढ़ाई करने और पांच साल पटना सिविल कोर्ट में प्रैक्टिस करने के बाद भी शिक्षक बनने का सपना नहीं छोड़ा। वहीं प्रधानाध्यापिका डॉ. माधवी कुमारी अपने पिता से प्रेरित होकर शिक्षा के क्षेत्र में आईं। उनका मानना है कि बच्चों को किताबों के साथ गतिविधि आधारित शिक्षा भी मिलनी चाहिए। नवनियुक्त माध्यमिक शिक्षक संघ के प्रदेश अध्यक्ष डॉ. गणेश शंकर पांडे का कहना है कि पहले की तुलना में अब शिक्षक भर्ती की प्रक्रिया काफी कठिन हो गई है। टीईटी, एसटीईटी, बीपीएससी और अन्य परीक्षाओं से गुजरना पड़ता है, जबकि सुविधाएं पहले जैसी नहीं रहीं। इन सबके बावजूद गंजपर की पहचान आज भी शिक्षा से ही है। यही वजह है कि यह छोटा सा गांव नालंदा ही नहीं, पूरे बिहार के लिए प्रेरणा बन चुका है। यहां शिक्षा की लौ आज भी उतनी ही मजबूती से जल रही है, जितनी दशकों पहले जली थी।

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