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Patna : बिहार के गांवों में अब सुबह की शुरुआत सिर्फ मवेशियों के सानी-पानी से नहीं, बल्कि महिलाओं के नए आत्मविश्वास के साथ हो रही है। बरसों से घर के बाड़े में गाय-भैंसों की देखभाल का जिम्मा संभालने वाली ग्रामीण महिलाएं अब महज देखभाल तक सीमित नहीं रहेंगी। बिहार स्टेट मिल्क को-ऑपरेटिव फेडरेशन लिमिटेड यानी कॉम्फेड ने एक नई पहल शुरू की है, जिसे नाम दिया गया है ‘सुधा सखी’। राज्य सरकार के ‘सात निश्चय-3’ के तहत चल रहे ‘सहकार से समृद्धि’ अभियान के जरिए गांव-गांव में दुग्ध उत्पादक सहकारी समितियां बनाई जा रही हैं। इसका सीधा मकसद यह है कि राज्य की 8 हजार 53 पंचायतों में स्थानीय महिलाओं को आगे लाकर पशुपालकों और डॉक्टरों के बीच की दूरी को खत्म किया जाए।
मवेशी बीमार तो नहीं भटकेगा किसान, सखी करेगी प्राथमिक उपचार
अक्सर देहात में देखने को मिलता है कि अगर गाय या भैंस अचानक बीमार पड़ जाए, तो किसान को कई किलोमीटर दूर ब्लॉक या कस्बे के चक्कर काटने पड़ते हैं। कई बार सही समय पर दवा न मिलने से पशुपालक की जमा-पूंजी दांव पर लग जाती है। अब इस मुश्किल का हल सुधा सखियां निकालेंगी। 38 जिलों से चुनी गई महिलाओं को पटना में छह दिनों का खास आवासीय प्रशिक्षण दिया गया है। इस दौरान उन्हें सिखाया गया कि मवेशियों में बीमारी के शुरुआती लक्षण कैसे पहचानें, प्राथमिक उपचार कैसे करें, संतुलित आहार कैसे तैयार करें और कृत्रिम गर्भाधान की आधुनिक तकनीक से नस्ल कैसे सुधारें। गांव में मौजूद यह सखी अब पशुपालक की पहली मददगार बनेगी। इससे जहां समय पर इलाज मिलने से दुधारू पशु सुरक्षित रहेंगे, वहीं दूध का उत्पादन भी तेजी से बढ़ेगा।
न नौकरी की झंझट, न दफ्तर का चक्कर… काम के आधार पर कमाई
यह पहल महिलाओं के लिए किसी बंधी-बंधाई सरकारी नौकरी जैसी नहीं है, बल्कि यह अपने पैरों पर खड़े होकर सम्मान से कमाने का जरिया है। सुधा सखी कोई नियमित या संविदा कर्मचारी नहीं होंगी, बल्कि वे पंचायत स्तर पर दी जाने वाली सेवाओं के बदले तय कमीशन और प्रोत्साहन राशि से अपनी कमाई करेंगी। यानी वे जितना ज्यादा पशुपालकों की मदद करेंगी, उनकी आमदनी भी उतनी ही बेहतर होगी। इसके साथ ही सरकार दुग्ध उत्पादन से जुड़े किसानों का दायरा मौजूदा 12 लाख से बढ़ाकर 50 लाख से ऊपर ले जाने की तैयारी में है। राष्ट्रीय स्तर पर इस क्षेत्र में महिलाओं की भागीदारी करीब 70 फीसदी है, जिसे बिहार में 80 फीसदी तक पहुंचाने का लक्ष्य तय किया गया है।
दुकान खोलने के लिए 60 हजार की मदद और दवा केंद्र
महिलाओं को केवल पशुओं की सेहत तक सीमित नहीं रखा जा रहा है, बल्कि उन्हें दूध के कारोबार का सीधा साझीदार भी बनाया जा रहा है। मुख्यमंत्री महिला रोजगार योजना के तहत पंचायतों में सुधा बिक्री केंद्र खोलने के लिए महिलाओं को दो किस्तों में कुल 60 हजार रुपये की सहायता दी जा रही है। दुकान आवंटन में पूरी पारदर्शिता रहे, इसके लिए लॉटरी के जरिए जीविका दीदियों का चयन हो रहा है। इसके अलावा मवेशियों की जरूरी दवाएं आसानी से मिल सकें, इसके लिए राज्य के सभी 534 प्रखंडों में पशु औषधि बिक्री केंद्र भी खोले जा रहे हैं।
जीविका से जुड़ी 7 हजार दीदियां अब बकरियों और भेड़ों की भी करेंगी देखभाल
इस पूरी व्यवस्था की नींव काफी पहले से तैयार की जा रही थी। कॉम्फेड और जीविका ने मिलकर पहले ही लगभग 7 हजार दीदियों को पशु सखी के रूप में तैयार किया है। ये दीदियां अब अपने-अपने गांवों में स्वयं सहायता समूहों से जुड़ी बाकी महिलाओं को भी पशुपालन के गुर सिखा रही हैं। आने वाले दिनों में इनका दायरा सिर्फ गाय और भैंस तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि ग्रामीण इलाकों में आजीविका का बड़ा सहारा बनने वाली बकरी, भेड़ और सूअर पालन के लिए भी खास तौर पर महिलाओं को प्रशिक्षित किया जाएगा। चालू वित्तीय वर्ष में हर पंचायत के लिए एक सुधा सखी का चयन पूरा करने की योजना है, जिससे अगले साल तक पूरे बिहार के ग्रामीण अंचल में यह नेटवर्क पूरी मजबूती से काम करने लगेगा।
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