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Patna / Muzaffarpur : बिहार के खेतों में जब मक्के की तुड़ाई खत्म होती है, तो किसान भुट्टे के छिलकों को या तो वहीं फेंक देते हैं या जलाकर राख कर देते हैं। मुजफ्फरपुर के कुढ़नी प्रखंड के मुरादपुर गांव में रहने वाले एक युवा इंजीनियर को इसी कचरे में भविष्य की साफ-सुथरी तस्वीर दिखाई दी। पेशे से इंजीनियर नाज ओजैर ने पांच साल की कड़ी मेहनत के बाद मक्के के उसी सूखे छिलके से चाय के कप, नाश्ते की प्लेट, कटोरी, पानी पीने के ग्लास, स्ट्रॉ और मजबूत थैले बनाकर तैयार कर दिए हैं। उनका यह देसी जुगाड़ अब केंद्र सरकार की मुहर लगकर एक अधिकृत पेटेंट बन चुका है और गांव के युवाओं के लिए कमाई का जरिया भी।
बांस और पपीते से शुरू हुआ सफर, मक्के के छिलके पर आकर रुका
प्लास्टिक के बर्तनों में गर्म चाय या खाना खाने से शरीर में जाने वाले धीमे जहर को नाज काफी समय से देख रहे थे। वे एक ऐसा विकल्प चाहते थे जो पूरी तरह कुदरती हो, सस्ता हो और फेंकने पर कचरा न बने। इस धुन में उन्होंने साल 2014 के आसपास प्रयोग करने शुरू किए। शुरुआत में उन्होंने बांस के रेशे, केले के तने और पपीते के डंठलों पर खूब माथापच्ची की। बात बन तो रही थी, लेकिन बड़े पैमाने पर काम करने लायक टिकाऊ समाधान नहीं मिल पा रहा था।

इसके बाद नाज की नजर अपने ही इलाके में बहुतायत से होने वाली मक्के की खेती पर पड़ी। उन्होंने देखा कि मक्के का छिलका रेशेदार भी होता है और सूखने के बाद काफी मजबूत भी रहता है। प्रयोगशाला और अपनी छोटी सी वर्कशॉप में लगातार तापमान और दबाव के सैकड़ों ट्रायल करने के बाद उन्हें सही फार्मूला मिल गया। उन्होंने पाया कि छिलके को एक तय तापमान पर गर्म करके जब सांचे में दबाया जाता है, तो वह मनचाहे बर्तन का रूप ले लेता है। सबसे अच्छी बात यह निकली कि ठंडा होने के बाद यह बर्तन न तो पानी सोखकर गलता है और न ही अपना आकार बदलता है।
नाज ने अपनी इस तकनीक को सुरक्षित रखने के लिए 1 मार्च 2019 को पेटेंट का आवेदन डाला था। पांच साल की लंबी तकनीकी पड़ताल के बाद 21 फरवरी 2024 को सरकार ने उन्हें इसका आधिकारिक पेटेंट प्रमाणपत्र दे दिया। इसके बाद उन्होंने एमएनओ स्वदेशी इंडिया प्राइवेट लिमिटेड नाम से अपनी कंपनी बनाई और गांव में ही छोटी सी प्रोडक्शन यूनिट शुरू कर दी।
“ग्रामीण इलाकों में इस तरह के जमीनी नवाचार बिहार को सही मायनों में आत्मनिर्भर बनाने की ताकत रखते हैं। खेतों से निकलने वाले कचरे को उपयोगी बर्तनों में बदलना बेहद सराहनीय पहल है। सरकार ऐसे युवाओं को आगे बढ़ाने और कृषि कचरे से कमाई के साधन तैयार करने में पूरी मदद कर रही है। यह काम प्लास्टिक प्रदूषण से तो बचाएगा ही, गांव के युवाओं के लिए घर बैठे रोजगार भी लाएगा।”
– श्रवण कुमार, मंत्री, ग्रामीण विकास एवं सूचना जनसंपर्क विभाग
45 पैसे की लागत और 2 रुपये में बिक्री, गांव में ही मिल गया काम
नाज का यह काम केवल पर्यावरण बचाने तक सीमित नहीं है, बल्कि इसने ग्रामीण अर्थव्यवस्था में भी जान फूंक दी है। मक्के की कटाई के दिनों में नाज आसपास के किसानों से यह छिलका 1 से 2 रुपये प्रति किलो के हिसाब से खरीद लेते हैं। जिस छिलके को फेंकने का भी कोई मोल नहीं था, अब किसान उसे सहेजकर नाज के कारखाने तक पहुंचा रहे हैं।
कारखाने में एक कटोरी या प्लेट तैयार करने में बिजली, छिलके और सांचे की घिसाई मिलाकर करीब 45 से 50 पैसे का खर्च बैठता है। बाजार में यह कटोरी आराम से 2 रुपये प्रति पीस के भाव से बिक जाती है। इस छोटे से सेटअप के दम पर नाज आज सालाना करीब 5 लाख रुपये की साफ बचत कर रहे हैं। सबसे बड़ा संतोष यह है कि उनकी इस छोटी सी इकाई में गांव के 8 स्थानीय लड़कों को पक्की नौकरी और नियमित आमदनी मिल रही है। राज्य सरकार का ग्रामीण विकास विभाग भी अब लोहिया स्वच्छ बिहार अभियान के तहत इस मॉडल को आगे बढ़ाने में जुटा है, ताकि दूसरे गांवों के लोगों को भी इसकी ट्रेनिंग दी जा सके।

10 साल में 100 प्लास्टिक आइटम हटाने का इरादा
कारोबार की शुरुआत अच्छी होने के बाद नाज अब अपने दायरे को बड़ा करने में जुटे हैं। उनका लक्ष्य अगले 10 सालों में दैनिक जीवन में इस्तेमाल होने वाली कम से कम 100 तरह की प्लास्टिक और थर्माकोल की चीजों को मक्के के छिलके से बदलना है। शादियों, चाय की थड़ियों और पार्टियों में जो प्लास्टिक के कप और प्लेट आज नालियों को जाम कर रहे हैं, उनकी जगह यह कुदरती बर्तन पूरी तरह ले सकते हैं। इन बर्तनों की सबसे बड़ी खूबी यह है कि इस्तेमाल के बाद अगर इन्हें जमीन में दबा भी दिया जाए, तो कुछ ही हफ्तों में यह गलकर बेहतरीन जैविक खाद बन जाते हैं।

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“ग्रामीण इलाकों में इस तरह के जमीनी नवाचार बिहार को सही मायनों में आत्मनिर्भर बनाने की ताकत रखते हैं। खेतों से निकलने वाले कचरे को उपयोगी बर्तनों में बदलना बेहद सराहनीय पहल है। सरकार ऐसे युवाओं को आगे बढ़ाने और कृषि कचरे से कमाई के साधन तैयार करने में पूरी मदद कर रही है। यह काम प्लास्टिक प्रदूषण से तो बचाएगा ही, गांव के युवाओं के लिए घर बैठे रोजगार भी लाएगा।”