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Patna : भारत और बांग्लादेश के बीच 1996 में हुई 30 साल पुरानी गंगा जल संधि इस साल 11 दिसंबर को खत्म होने जा रही है। संधि की अवधि पूरी होने से पहले बिहार सरकार ने अपने राज्य की जल सुरक्षा और भविष्य की जरूरतों को लेकर मजबूत तैयारी शुरू कर दी है। जल संसाधन विभाग की ओर से 30 अक्टूबर को पटना के होटल चाणक्या में ‘गंगा जल संधि: बिहार की जल सुरक्षा’ विषय पर एक अहम सेमिनार का आयोजन किया जा रहा है। इसमें देशभर के जल विशेषज्ञ, तकनीकी जानकार और नीति निर्माता जुटेंगे, जो गंगा में गाद के जमाव, बाढ़ नियंत्रण और जल बंटवारे के तकनीकी पहलुओं पर विस्तार से चर्चा करेंगे। इस बीच, खराब मौसम के चलते बक्सर से लेकर फरक्का तक गंगा नदी में गाद की स्थिति का प्रस्तावित हवाई सर्वेक्षण फिलहाल टालना पड़ा है।
गैर-मानसून में भी चाहिए 10 हजार क्यूसेक पानी
बिहार सरकार ने आने वाले समय को ध्यान में रखते हुए वर्ष 2051 तक की जल जरूरतों का एक वैज्ञानिक आकलन कराया है। इस शुरुआती रिपोर्ट से साफ हुआ है कि राज्य को सूखे के महीनों यानी जनवरी से मई के दौरान भी कम से कम 10,000 क्यूसेक पानी की लगातार जरूरत पड़ेगी। राज्य में मौजूद जलाशयों और अन्य पारंपरिक जल स्रोतों में पर्याप्त पानी नहीं रहने से सिंचाई और पेयजल आपूर्ति पर सीधा असर पड़ता है। खेती, घरेलू उपयोग और उद्योगों के लगातार विस्तार को देखते हुए गंगा का पानी पूरे साल मिलना बिहार के अस्तित्व से जुड़ा मामला बन गया है। सेमिनार का मुख्य मकसद इन्हीं वैज्ञानिक आंकड़ों और तथ्यों के आधार पर बिहार की दावेदारी को नई संधि के लिए तैयार करना है।
गाद से उथली हो रही गंगा, राष्ट्रीय नीति की उठी मांग
बिहार में हर साल आने वाली बाढ़ और कटान की एक बड़ी वजह गंगा की तलहटी में भारी मात्रा में गाद का जमना है। हिमालय से निकलने वाली नदियां मानसून में भारी गाद लाती हैं और बिहार का मैदानी ढाल कम होने की वजह से यह गाद नदी के पेंदे में बैठ जाती है। इससे गंगा उथली हो रही है और पानी का फैलाव किनारे के रिहायशी इलाकों में बढ़ जाता है। इस संकट से निपटने के लिए बिहार सरकार ने अपनी अलग गाद प्रबंधन नीति 2026 तो लागू कर दी है, लेकिन यह समस्या सिर्फ एक राज्य तक सीमित नहीं है। राज्य सरकार का मानना है कि केंद्र स्तर पर एक ठोस राष्ट्रीय गाद प्रबंधन नीति बननी चाहिए, जिसमें ड्रेजिंग और नदी तंत्र की सफाई के लिए राज्यों को अलग से फंड और तकनीकी मदद दी जाए।
विशेषज्ञों की राय से तैयार होगा पूरा रोडमैप
सेमिनार में होने वाले मंथन के जरिए राज्य सरकार एक ठोस तकनीकी और नीतिगत ड्राफ्ट तैयार करेगी। विशेषज्ञ इस बात पर अपने सुझाव देंगे कि भविष्य में पानी का न्यायसंगत बंटवारा कैसे हो और बाढ़ के जोखिम को कैसे न्यूनतम किया जाए। सरकार का लक्ष्य है कि जब भारत और बांग्लादेश के बीच नई संधि पर बातचीत आगे बढ़े, तब गंगा बेसिन के सबसे बड़े हिस्सेदार बिहार के हितों की अनदेखी न हो सके। सेमिनार से निकलने वाले निष्कर्षों को केंद्र सरकार और संबंधित जल आयोगों के सामने पूरे वैज्ञानिक साक्ष्यों के साथ मजबूती से रखा जाएगा।
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