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Home » अमेरिका ने ऐसे बनाया था तालिबान, अब खुद हो गया परेशान; जानें पूरी कहानी
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अमेरिका ने ऐसे बनाया था तालिबान, अब खुद हो गया परेशान; जानें पूरी कहानी

August 22, 2021No Comments7 Mins Read
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नई दिल्ली। अफगानिस्तान की पहाड़ी और पथरीली जमीन की तपिश ने एक बार फिर पूरी दुनिया को झुलसा दिया है. अफगानिस्तान की करीब पौने 4 करोड़ की आबादी के सामने 2021 में 1998 की तस्वीर एक बार फिर जिंदा हो गई. क्योंकि 23 साल बाद तालिबान फिर लौट आया है. पूरे बीस साल तक अमेरिका ने खुद को अफगानिस्तान में झोंक दिया. बीस सालों में लगभग 61 लाख करोड़ रुपये फूंक डाले. 20 सालों में साढ़े तीन लाख अफगानी फौजी तैयार करने के दावे किए गए. लेकिन 20 सालों के ये दावे तालिबान ने महज दस दिनों में ही तबाह कर दिए. फिर तालिबान के 70 हजार लड़ाके साढ़े 3 लाख अफगानी फौजियों पर भारी पड़ गए. इसी के साथ 1998 की कहानी तालिबान ने वहां फिर से दोहरा दी. तालिबान लौट आया.

पर बड़ा सवाल ये है कि बीस साल से सोया तालिबान अचानक कैसे जाग गया. बीस साल बाद बिना खून खराबा किए वो कैसे काबुल में राष्ट्रपति भवन तक पहुंच गया. अमेरिका की वो ट्रेनिंग और ट्रेनिंग के नाम पर लाखों करोड़ों का खर्च सब कहां है? खुद अमेरिका अफगानिस्तान को इस हाल में छोड़कर क्यों चला गया. इसके लिए अतीत में झांकना होगा.

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ये कहानी 101 साल पहले शुरू होती है. 1919 में अफगानिस्तान अंग्रेजों की गुलामी से आजाद हो चुका था. उसी के बाद अफगानिस्तान में राजशाही शुरू हुई. अगले 54 साल तक शाह परिवार ने वहां राज किया. अफगानिस्तान के आखरी राजा मोहम्मद जहीर शाह 1973 में बीमार हुए. इलाज के लिए उन्हें इटली जाना पड़ा. लेकिन उनके इटली जाते ही उनके सेनापति दाऊद खान ने तख्ता पलट कर दिया और खुद को अफगानिस्तान का प्रधानमंत्री घोषित कर दिया.

इनसाइड स्टोरीः सोवियत संघ के साथ कोल्ड वॉर के दौरान अमेरिका ने ऐसे बनाया था  तालिबान - Soviet Union America Cold War CIA Afghanistan Power Intervention  Mujahideen Taliban Funding ...

दाऊद खान ने अवाम से वादा किया कि वो नया संविधान लाएंगे. लेकिन 1977 में दाऊद खान ने संविधान के नाम पर सिंगल पार्टी सिस्टम कायम कर दिया. ताकि वही अकेले सत्ता में रह सके. अवाम ने इसका पुरजोर विरोध किया और फिर 1978 में पहली बार वहां एक क्रांति के नाम से आंदोलन शुरु हो गया. जिसकी अगुवाई की नूर मोहम्मद तारीकी ने. उन्हें अफगान जनता का भरपूर समर्थन मिला और आखिरकार क्रांति कामयाब हो गई. दाऊद खान को कुर्सी छोड़नी पड़ी.

अब अफगानिस्तान की सत्ता नूर मोहम्मद तारीकी के हाथों में थी. वो अफगानिस्तान के पहले राष्ट्रपति बने. नूर मोहम्मद तारीकी तब के यूएसएसआर (सोवियत संघ) के बेहद करीबी माने जाते थे. तब सोवियत संघ एक कम्यूनिस्ट देश के तौर पर जाना जाता था, जो धर्म की नहीं मानता था. सोवियत संघ से दोस्ती के बाद नूर मोहम्मद तारीकी ने पहली बार अफगानिस्तान का आधुनिकीकरण शुरु किया. इसके तहत स्कूल, कॉलेज और कलकारखाने शुरु किए गए. खासतौर पर महिलाओं की आजादी और उनकी तालीम पर जोर दिया गया.

US On Taliban: US General Warn Taliban Now Control About Half The  Countryside Of Afghanistan - अमेरिका ने माना, अफगानिस्‍तान के आधे जिलों पर  अब तालिबान का हुआ कब्‍जा, दी चेतावनी -

इतना ही नहीं सामाजिक सरोकारों के चलते तारीकी सरकार ने अमीरों की जमीनें गरीबों में बांटनी शुरू कर दी. लेकिन नूर मोहम्मद तारीकी की आधुनिकीकरण की कोशिश और महिलाओं की आजादी, वहां के कई कबीलों को रास नहीं आई. उन्हें ये सब इस्लाम के खिलाफ लगा. और यहीं से मजहब के नाम पर नूर मोहम्मद तारीकी का विरोध शुरु हो गया.

ये वो दौर था जब सोवियत संघ और अमेरिका के बीच कोल्ड वॉर चल रही थी. नूर मोहम्मद तारीकी का इस्तेमाल कर सोवियत संघ अफगानिस्तान में अपनी पैठ बना रहा था. तो वहीं उसी वक्त अमेरिका ईरान में आधुनिकीकरण के नाम पर अपनी पहुंच बढ़ा रहा था. अफगानिस्तान में सोवियत संघ के बढ़ते दबदबे को देखते हुए अमेरिका ने भी अफगानिस्तान में अपनी ताकत आजमाने का फैसला किया. अमेरिका ने वहां मजहब के नाम पर नूर मोहम्मद का विरोध करने वाले अफगानी मुसलमानों को भड़काना शुरू कर दिया.

इस काम के लिए अमेरिका ने सीआईए की मदद से नूर मोहम्मद तारीकी के विदेश मंत्री हफीजुद्दीन अमीन को अपने साथ मिला लिया. अमीन की मदद से अमेरिका ने नूर मोहम्मद तारीकी की सरकार को मुस्लिम विरोधी साबित करना शुरु कर दिया. विरोध को हवा देने के लिए अमेरिका ने हफीजुद्दीन अमीन को आगे कर दिया. और अफगान लोगों को मुजाहिदीन बनाने की ट्रेनिंग भी शुरु कर दी. इस काम के लिए अमेरिका ने पाकिस्तान की भी मदद ली. मुजाहिदीन की ट्रेनिंग पाकिस्तान में होने लगी. हथियारों के लिए पैसे भी दिए जाने लगे.

मजहब के नाम पर ही तारीकी सरकार को गिराने के लिए अमेरिका ने सऊदी अरब को भी अपने साथ मिला लिया. इसी के बाद सऊदी अरब से बहुत सारे लोग सोवियत संघ और तारीकी सरकार से लड़ने के लिए अफगानिस्तान पहुंच गए. इन्हीं लोगों में से एक था ओसामा बिन लादेन.

उधर, अफगानिस्तान में अलग-अलग कबीलों के अलावा बड़ी तादाद में तालिब यानी छात्रों को भी सोवियत संघ और तारीकी सरकार के खिलाफ भड़काया जा रहा था. बहुत से छात्र संगठन इस मुहीम से जुड़ने लगे थे. इन्हीं में से एक तालिब यानी छात्र इस विरोध आंदोलन में सबसे आगे था. आंदोलन और विरोध को बढ़ता देख नूर मोहम्मद तारीकी को सोवियत संघ जाना पड़ा. सोवियत संघ के नेताओं ने तारीकी को सुझाव दिया कि वे फिलहाल आधुनिकीकरण की मुहीम को रोक दें. सोवियत संघ ने तारीकी को ये भी बताया कि उनका विदेश मंत्री अमीन सीआईए के लिए काम कर रहा है, उसे भी हटा दें.

पर अमीन को उसके हटाए जाने की खबर सीआईए ने पहले ही दे दी थी. लिहाजा, जैसे ही नूर मोहम्मद तारीकी और उनका परिवार वापस अफगानिस्तान लौटा. तभी हफीजूद्दीन अमीन ने तारीकी और उनके पूरे परिवार का खात्मा कर दिया. और इसके बाद उसने अफगानिस्तान की सत्ता अपने हाथों में ले ली. नूर मोहम्मद तारीकी की मौत से गुस्साए सोवियत संघ ने 25 दिसंबर 1989 को अपनी थल सेना के साथ अफगानिस्तान पर हमला बोल दिया. रूसी सेना ने काबुल में घुसकर हफीजूद्दीन अमीन को मार डाला.

अफगान पर रूसी हमले के बाद अमेरिका को भी मौका मिल गया. अमेरिका ने मुजाहिदीनों को हवा दी और उन्हें रूसी सेना के खिलाफ लड़ने के लिए उकसाया. इस काम के लिए अमेरिका ने मुजाहिदीनों को तमाम हथियार, पैसे और यहां तक कि वीजा भी दे दिया. रूस ने अफगानिस्तान पर हमला तो कर दिया लेकिन पहाड़ियों और पथरीली जमीन की वजह से उन्हें परेशानी होने लगी. उनके लिए वहां टिकना आसान नहीं था. एयरफोर्स भी वहां उनकी मदद नहीं कर सकी. इसके बाद रूसी सेना लंबी लड़ाई के बाद वापस लौट गई.

रूसी सेना की वापसी के साथ ही मुजाहिदीन आपस में ही भिड़ गए. मुजाहिदीनों ने अपने अपने इलाकों में अपने गुट बना लिए. इसकी वजह से अफगानिस्तान में गृह युद्ध छिड़ गया. आम जनता परेशान हो गई. धीरे धीरे इस गृह युद्ध में छोटे छोटे गुट हारते चले गए और जो विजयी बनकर उभरा, वो गुट अफगानिस्तान के छात्रों का था यानी तालिब. और तालिब में भी एक नाम जो सबसे ज्यादा उभरकर सामने आया, वो नाम था उमर का. जिसने रूस की सेना से सीधे टक्कर ली थी. रूसी हमले में उसे अपनी एक आंख भी गवानी पड़ी. रूसी फौज की वापसी के बाद वो एक मस्जिद में जाकर नमाज पढ़ाने लगा था. तभी से लोग उसे मुल्ला उमर कहने लगे थे.

वही मुल्ला उमर जिसने तालिबान को जन्म दिया. वही मुल्ला उमर जिसने 1998 में पहली बार अफगानिस्तान की सत्ता तालिबान को सौंपी. वहीं मुल्ला उमर जो अफगानिस्तान में ओसामा बिन लादेन का सबसे वफादार साथी था. वही मुल्ला उमर जिस पर अमेरिका ने एक करोड़ डॉलर का इनाम रखा था. तालिबान के जनक मुल्ला उमर की 2013 में मौत हो चुकी थी. लेकिन तालिबान 2021 में फिर से जिंदा हो गया.

कुल मिलाकर कहानी ये है कि पहले अमेरिका ने अफगानिस्तान में सोवियत संघ को हराने के लिए मुजाहिदीनों की खेप तैयार की. फिर तालिबान को पैदा किया. फिर उसी तालिबान के खात्मे के लिए 20 साल तक अफगानी पहाड़ों और पथरीली जमीन की खाक छानी. हजारों सैनिकों को गंवाया. 61 लाख करोड़ रुपये खर्च किए. पर अफसोस ये सब बेकार हो गया. बीस साल पहले तालिबान की सरकार को उखाड़ने के लिए अमेरिका ने अफगानिस्तान में कदम रखा था और बीस साल बाद अब अमेरिका की वापसी के साथ ही अफगानिस्तान में तालिबान का राज लौट आया है.

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