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Garhwa (Nityanand Dubey) : विश्व एड्स दिवस पर सोमवार की सुबह गढ़वा जिला अस्पताल का माहौल थोड़ा अलग था। सामान्य दिनों की भीड़ के बीच आज लोगों की नजरें एक छोटे से मंच पर टिक गई थीं, जहां डॉक्टर, नर्सें और जिला विधिक सेवा प्राधिकरण के लोग एक ही मकसद से इकट्ठा हुए थे। मकसद था जानकारी, भरोसा और हौसला बांटना।
लोगों की आंखों में सवाल, डॉक्टरों के जवाब साफ
कार्यक्रम की शुरुआत जैसे ही हुई, भीड़ में खड़े कई लोगों के चेहरे पर झिझक साफ दिख रही थी। एचआईवी को लेकर समाज में अब भी कई भ्रम हैं। इस झिझक को सबसे पहले डॉक्टर जिया उल हक ने अपनी सहज और सीधी बातों से कम किया। उन्होंने समझाया कि सुरक्षित तरीके से जीना किस तरह इस बीमारी से बचाव में मदद करता है। उन्होंने सुई, खून और मां से बच्चे में संक्रमण होने की प्रक्रिया को इतने सरल तरीके से बताया कि लोग सिर हिलाते हुए बातें समझते चले गए। “टेस्ट करवाना शर्म की बात नहीं, जिम्मेदारी की बात है,” उन्होंने यह बात ऐसे कही कि कई लोग तुरंत समझ गए कि यह खुद की और परिवार की सुरक्षा से जुड़ा मामला है।
इलाज की बात होने पर लोगों में आई राहत
इसके बाद जब डॉक्टर सुशील कुमार रमन एंटीरेट्रोवायरल थेरेपी के बारे में बोलने आए, तो भीड़ का रवैया थोड़ा बदला। कई लोग पहले यह मानकर चलते थे कि एचआईवी की पहचान हो जाए तो जीवन रुक जाता है। उनकी बातें सुनकर लोगों की आंखों में हल्की राहत दिखी। उन्होंने बताया कि ART की वजह से लाखों लोग सालों से सामान्य जीवन जी रहे हैं। डॉ प्रशांत प्रमोद, डॉक्टर अनुप्रिया और डॉ सत्येंद्र ने भी अपनी बातें रखीं। हर डॉक्टर की बात लोगों को डर से दूर और समझ के करीब लाती चली गई।
कानून भी साथ, यही भरोसा दिलाया DLSA ने
कार्यक्रम में DLSA के पैरा लीगल वॉलंटियर रविंद्र कुमार पाठक जब माइक पर आए, तो माहौल थोड़ा बदल गया। उन्होंने कानून की भाषा को लोगों की भाषा में बदला। उन्होंने बताया कि एचआईवी पॉजिटिव व्यक्ति के साथ भेदभाव करना कानूनी अपराध है। इस बात पर कई लोगों ने आपस में कानाफूसी की। शायद उन्हें पहली बार पता चला कि इस बीमारी से लड़ने वाले लोगों के अधिकार इतने मजबूत हैं। पाठक ने लोगों को भरोसा दिलाया, “अगर कोई भी एचआईवी प्रभावित व्यक्ति परेशानी में है, तो जिला विधिक सेवा प्राधिकरण उसे मुफ्त कानूनी मदद देगा।” यह सुनकर भीड़ में खड़ी एक बुजुर्ग महिला ने तसल्ली की सांस ली। शायद उसके मन में अपने किसी रिश्तेदार की चिंता छिपी थी। जानकारी और कानून दोनों का साथ देखकर लोगों के भीतर एक नया भरोसा आया कि एचआईवी न तो छिपाने की चीज है और न ही डरने की।
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