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Pakur (Jaydev Kumar) : सुबह की हल्की धूप में पुराना समाहरणालय परिसर धीरे-धीरे भरने लगा था। गांव की पगडंडियों से आई महिलाएं, स्कूल यूनिफॉर्म में सजी किशोरियां, सिर पर गमछा डाले बुजुर्ग और कंधे पर फाइल लटकाए अधिकारी, सब एक ही जगह जमा हो रहे थे। वजह थी “मिशन शक्ति” की वह कार्यशाला, जो सिर्फ एक सरकारी कार्यक्रम नहीं, बल्कि सैकड़ों परिवारों की अनकही कहानी बन गई।
मां की आंखों में बीता कल, बेटी की हथेली में आने वाला कल
भीड़ में खड़ी 32 साल की मीरा हांसदा अपनी 12 साल की बेटी पूजा का हाथ थामे थीं। धीमे स्वर में बोलीं, “मेरी शादी तेरह साल में कर दी गई थी। पढ़ना चाहती थी, पर किताबें वहीं छूट गईं। आज पूजा को स्कूल भेजती हूं तो लगता है मैं खुद पढ़ रही हूं।” मीरा अकेली नहीं थीं। ऐसी कई मांएं थीं, जिनकी अधूरी पढ़ाई अब बेटियों के सपनों में सांस ले रही थी।

जब मंच से उतरी योजनाएं और लोगों के जीवन से जुड़ गईं
कार्यशाला में घरेलू हिंसा, दहेज, डायन प्रथा, बाल विवाह और नशे जैसे मुद्दों पर चर्चा हुई। अधिकारियों ने योजनाओं की जानकारी दी, लेकिन असली संवाद तब शुरू हुआ जब महिलाओं ने खुलकर सवाल पूछे। “अगर बेटी को जबरन शादी के लिए ले जाएं तो क्या करें?”
“अगर घर में मारपीट हो तो कहां जाएं?” जवाब साफ था – 1098 और 181 सिर्फ नंबर नहीं, संकट में खड़ी महिलाओं और बच्चों के लिए सहारा हैं।
एक छोटा सा नाटक, बड़ी सी सच्चाई
रानी विद्यालय की छात्राओं का नुक्कड़ नाटक शुरू हुआ। एक बच्ची गुड़िया के साथ खेल रही थी, तभी पिता का किरदार निभा रही छात्रा बोली, “अब शादी करनी है।” बच्ची ने कांपती आवाज़ में कहा, “मुझे गुड़िया नहीं, किताब चाहिए।” इतना सुनते ही कई चेहरों पर सन्नाटा उतर आया। कुछ आंखें भीग गईं। शायद कई लोगों को अपना अतीत याद आ गया।

“कानून हाथ में है, पर बदलाव दिल से होगा”
जिला समाज कल्याण पदाधिकारी बसंती ग्लाडिस बाड़ा ने कहा, “जब बेटी बोझ मानी जाएगी, तब तक योजनाएं अधूरी रहेंगी। कानून हमारे पास हैं, पर समाज की सोच बदलना सबसे जरूरी है।” उन्होंने पलायन, मानव तस्करी और नशे की लत को भी महिलाओं की पीड़ा से जोड़ा।
प्रशासन का भरोसा, गांव तक पहुंचे बदलाव
वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग से जुड़े उपायुक्त मनीष कुमार ने कहा कि प्रशासन का प्रयास है कि जागरूकता कागजों तक सीमित न रहे, बल्कि हर गांव और हर घर तक पहुंचे। अनुमंडल पदाधिकारी साईमन मरांडी ने जोड़ा, “डंडे से नहीं, जानकारी से समाज बदलेगा।”
एक शपथ, कई खामोश उम्मीदें
कार्यक्रम के अंत में जब अधिकारियों और कर्मचारियों ने बाल विवाह और डायन प्रथा के खिलाफ शपथ ली, तो तालियों की आवाज़ में औपचारिकता नहीं, भरोसा था।

लौटते कदम, बदला हुआ भरोसा
शाम ढलने लगी थी। लोग अपने अपने घरों की ओर बढ़ रहे थे। मीरा अपनी बेटी पूजा का हाथ पकड़कर निकल रही थीं। उन्होंने मुस्कराते हुए कहा, “आज समझ आया कि डर के खिलाफ भी एक रास्ता होता है।” पुराना समाहरणालय परिसर खाली हो रहा था, लेकिन वहां छूट गई थीं कई कहानियां, कई सवाल और शायद कुछ नए सपने।
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