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Assam/Ranchi : असम की हरी-भरी पहाड़ियों और दूर तक फैले चाय बागानों के बीच मंगलवार को एक अलग ही माहौल देखने को मिला। बिस्वनाथ चारियाली के मेजिकाजन चाय बागान में सैकड़ों आदिवासी मजदूर, महिलाएं, बुजुर्ग और युवा इकट्ठा हुए थे। उनके चेहरे पर थकान भी थी और उम्मीद भी। मौका था आदिवासी स्टूडेंट यूनियन ऑफ असम, जारी शक्ति और आदिवासी काउंसिल ऑफ असम की ओर से आयोजित जागरूकता जनसभा का इस जनसभा, में झारखंड के मुख्यमंत्री Hemant Soren मुख्य अतिथि के रूप में पहुंचे।
सभा में मौजूद कई मजदूर सुबह से ही काम खत्म कर यहां पहुंचे थे। उनके हाथों में चाय की टोकरी की जगह आज उम्मीद की बातें थीं। वे सुनना चाहते थे कि उनके संघर्ष और अधिकारों की बात कोई बड़े मंच से भी कर रहा है।
चाय की खुशबू के पीछे छिपी कठिन जिंदगी
असम के चाय बागानों की हरियाली जितनी खूबसूरत दिखती है, वहां काम करने वाले मजदूरों की जिंदगी उतनी ही कठिन होती है।
पीढ़ियों से यहां रह रहे आदिवासी परिवार रोज सुबह सूरज निकलने से पहले काम पर निकलते हैं और दिन भर चाय की पत्तियां तोड़ते हैं। कई मजदूरों का कहना है कि मेहनत बहुत है, लेकिन मजदूरी कम है। शिक्षा, स्वास्थ्य और बेहतर जीवन जैसी बुनियादी सुविधाएं आज भी उनके लिए संघर्ष का विषय बनी हुई हैं। इसी दर्द को समझते हुए मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने अपने संबोधन में कहा कि असम के चाय उद्योग की असली ताकत यही आदिवासी मजदूर हैं।
उन्होंने कहा, “हजारों वर्षों से आप लोग सिर्फ असम ही नहीं, बल्कि पूरे देश के चाय व्यापार को मजबूत बना रहे हैं। लेकिन इसके बावजूद आपके अधिकार और सम्मान को लेकर आज भी सवाल खड़े हैं।”
पहचान की लड़ाई आज भी जारी
सभा में मुख्यमंत्री ने साफ कहा कि असम में रहने वाले आदिवासी समुदाय को आज भी अपने अस्तित्व और पहचान के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है। उन्होंने सवाल उठाया कि जो लोग पीढ़ियों से यहां रह रहे हैं, उन्हें आज भी पूरा आदिवासी दर्जा क्यों नहीं मिल पाया। उन्होंने कहा कि यह स्थिति बदलने के लिए समाज को एकजुट होकर आगे बढ़ना होगा।
झारखंड आंदोलन की कहानी सुनाई
अपने भाषण के दौरान मुख्यमंत्री ने झारखंड राज्य के निर्माण की कहानी भी लोगों के सामने रखी। उन्होंने बताया कि झारखंड बनने से पहले वहां भी आदिवासी समाज को अपने अधिकारों के लिए लंबा संघर्ष करना पड़ा था। उन्होंने कहा कि उस आंदोलन का नेतृत्व दिशोम गुरु स्वर्गीय शिबू सोरेन और कई क्रांतिकारी नेताओं ने किया था। उस संघर्ष में कई लोग शहीद हुए, कई परिवारों ने अपना सब कुछ खो दिया, लेकिन लोगों ने हार नहीं मानी। उन्होंने कहा कि उसी संघर्ष का नतीजा है कि आज झारखंड एक अलग राज्य के रूप में मौजूद है।
शहीदों के बलिदान को किया याद
सभा में मुख्यमंत्री ने आदिवासी अधिकारों के लिए लड़ते हुए जान गंवाने वाले नेता प्रदीप नाग को भी याद किया। उन्होंने कहा कि समाज के अधिकारों के लिए लड़ते-लड़ते उन्होंने अपने प्राणों की आहुति दे दी। मुख्यमंत्री ने कहा कि ऐसे बलिदान समाज को आगे बढ़ने की ताकत देते हैं और लोगों को यह याद दिलाते हैं कि अधिकार बिना संघर्ष के नहीं मिलते।
शिक्षा और जागरूकता से बदलेगा भविष्य
सीएम सोरेन ने आदिवासी युवाओं से खास अपील करते हुए कहा कि अब समय आ गया है कि समाज शिक्षा के जरिए खुद को मजबूत बनाए। उन्होंने कहा कि जब समाज बौद्धिक रूप से मजबूत होगा, तब वह अपने अधिकारों की लड़ाई भी मजबूती से लड़ सकेगा। उन्होंने यह भी कहा कि संविधान ने आदिवासी समुदाय को कई अधिकार दिए हैं और जरूरत पड़ने पर इन अधिकारों के लिए कानूनी लड़ाई भी लड़नी होगी।
उम्मीद के साथ लौटी भीड़
सभा खत्म होने के बाद भी लोग देर तक वहां खड़े रहे। कई मजदूर आपस में चर्चा कर रहे थे कि शायद अब उनकी आवाज थोड़ी और मजबूत होगी। चाय बागान की पगडंडियों पर लौटते हुए मजदूरों के कदम भले ही रोज की तरह थके हुए थे, लेकिन उनके मन में एक नई उम्मीद जरूर थी कि एक दिन उनकी मेहनत को भी पूरा सम्मान और अधिकार मिलेगा।
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