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Home » ‘नंबरों की दौड़ से बाहर सोचने की जरूरत…’ XLRI में गूंजा ‘जीवन कौशल’ का संदेश aa
झारखंड

‘नंबरों की दौड़ से बाहर सोचने की जरूरत…’ XLRI में गूंजा ‘जीवन कौशल’ का संदेश aa

March 11, 2026No Comments4 Mins Read
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Jamshedpur : आज की शिक्षा व्यवस्था में बच्चों के सामने सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या सिर्फ किताबों की पढ़ाई उन्हें जिंदगी के असली संघर्ष के लिए तैयार कर पा रही है? इसी अहम सवाल को लेकर जमशेदपुर के XLRI के फादर प्रभु सभागार में मंगलवार को एक ऐसा सेमिनार हुआ, जहां शिक्षा के साथ-साथ जीवन कौशल को लेकर गंभीर चर्चा हुई। नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ एजुकेशनल प्लानिंग एंड एडमिनिस्ट्रेशन (NIEPA), नई दिल्ली के प्रायोजन और सीड्स (Socio Economic and Education Development Society) संस्था के सहयोग से आयोजित इस एकदिवसीय सेमिनार में शिक्षाविदों, शिक्षकों, पंचायत प्रतिनिधियों, अभिभावकों और विद्यार्थियों ने मिलकर इस बात पर मंथन किया कि बच्चों को सिर्फ अच्छे अंक ही नहीं, बल्कि जिंदगी की चुनौतियों से जूझने की क्षमता भी कैसे दी जाए।

नंबरों की दौड़ में कहीं पीछे न छूट जाए ‘जीवन’

कार्यक्रम में एक्सएलआरआई की फैकल्टी और शिक्षाविद डॉ. निधि मिश्रा ने बहुत सरल शब्दों में एक बड़ी बात कही। उन्होंने कहा कि आजकल शिक्षा का मतलब अक्सर अच्छे नंबर और शानदार रिजल्ट तक सीमित हो गया है। लेकिन असली सवाल यह है कि क्या बच्चे फेल होने का दुख, रिश्तों की उलझन, मानसिक तनाव या जीवन की मुश्किल परिस्थितियों का सामना करना सीख रहे हैं?

डॉ. मिश्रा ने कहा कि “अकादमिक एक्सीलेंस को लेकर हम बहुत गंभीर हैं, लेकिन जीवन कौशल को लेकर हमारी सोच अभी भी सीमित है। अगर बच्चों को आत्मविश्वास, निर्णय लेने की क्षमता और मुश्किल हालात में संतुलन बनाना नहीं सिखाया गया, तो शिक्षा अधूरी रह जाएगी।” उनकी बातों ने सभागार में बैठे कई शिक्षकों और अभिभावकों को सोचने पर मजबूर कर दिया।

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गांव के बच्चों तक भी पहुंचे जीवन कौशल की रोशनी

सेमिनार में शामिल कोल्हान विश्वविद्यालय की पूर्व कुलपति डॉ. शुक्ला मोहंती ने शिक्षा के एक ऐसे पहलू की ओर ध्यान दिलाया, जो अक्सर चर्चा में नहीं आता। उन्होंने कहा कि शहरों के कुछ स्कूलों में तो जीवन कौशल को लेकर पहल हो रही है, लेकिन ग्रामीण और सरकारी स्कूलों में अभी भी इस दिशा में बहुत काम बाकी है।

उनके मुताबिक “ग्रामीण इलाकों के बच्चों को भी यह समझना जरूरी है कि जीवन में सिर्फ पढ़ाई ही सब कुछ नहीं है। उन्हें संवाद करना, समस्या सुलझाना, टीम में काम करना और आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़ना भी सीखना होगा।”

“जीवन को जीने का कौशल हो तो आप सच में कुशल हैं”

सेमिनार में मौजूद पीएमश्री प्लस-2 हाई स्कूल सिमुलडांगा के शिक्षक उमा नाथ सिंह ने अपने अनुभव साझा करते हुए एक सरल लेकिन गहरी बात कही। उन्होंने कहाb“अगर किसी इंसान को जीवन जीने का कौशल आ गया, तो वह हर परिस्थिति में खुद को संभाल सकता है। असली शिक्षा वही है जो इंसान को बेहतर इंसान बनाए।” उनकी यह बात वहां मौजूद विद्यार्थियों के चेहरे पर भी उत्साह और जिज्ञासा दोनों ले आई।

जब छात्र, शिक्षक और अभिभावक एक मंच पर आए

इस सेमिनार की खास बात यह रही कि इसमें सिर्फ शिक्षाविद ही नहीं, बल्कि सीड्स संस्था की महिला लीडर्स, बीईओ, हेडमास्टर्स, शिक्षक, पंचायत प्रतिनिधि, स्कूल मैनेजमेंट कमेटी (SMC) के सदस्य और अभिभावक भी शामिल हुए। इसके अलावा डीबीएमएस, चिन्मया विद्यालय सहित 13 स्कूलों के विद्यार्थी भी इस चर्चा का हिस्सा बने। जब विद्यार्थियों ने जीवन कौशल से जुड़े सवाल पूछे, तो माहौल और भी जीवंत हो गया। प्रश्नोत्तर सत्र में कई बच्चों ने खुलकर अपनी जिज्ञासाएं रखीं और विशेषज्ञों से जवाब भी मिले।

शिक्षा का असली मकसद क्या है?

इस पूरे सेमिनार की चर्चा के बीच एक बात बार-बार सामने आई – शिक्षा का असली उद्देश्य क्या है? क्या शिक्षा सिर्फ डिग्री और नौकरी तक सीमित है, या फिर उसका मकसद ऐसे नागरिक तैयार करना है जो संवेदनशील, आत्मनिर्भर और सामाजिक रूप से जिम्मेदार हों? शायद यही वजह है कि अब नई शिक्षा नीति में जीवन कौशल को खास महत्व दिया जा रहा है।

धन्यवाद के साथ खत्म हुआ संवाद, लेकिन सवाल बाकी 

कार्यक्रम के अंत में सीड्स संस्था के प्रोग्राम संयोजक महानंद झा ने सभी अतिथियों और प्रतिभागियों का धन्यवाद किया। लेकिन इस सेमिनार ने एक ऐसा सवाल जरूर छोड़ दिया… क्या हमारी शिक्षा व्यवस्था बच्चों को सिर्फ पढ़ाई सिखा रही है, या उन्हें जिंदगी जीना भी सिखा रही है?

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