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Ramgarh (Dharmendra Pradhan) : सुबह के करीब सात बजे थे। शहर के मंदिरों और मोहल्लों में हलचल बढ़ने लगी थी। कहीं महिलाएं पूजा की थाली सजा रही थीं, तो कहीं घरों से निकलकर समूह में मंदिरों की ओर जा रही थीं। माथे पर सिंदूर, हाथों में चूड़ियां, नई साड़ियां और चेहरे पर एक अलग सी शांति। यह सिर्फ एक पूजा का दृश्य नहीं था, बल्कि रिश्तों, विश्वास और परंपरा से जुड़ी भावनाओं का जीवंत रूप था। शनिवार को रामगढ़ जिले में वट सावित्री व्रत पूरे श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाया गया। वट वृक्ष के नीचे जुटी महिलाओं की भीड़ में हर उम्र की महिलाएं नजर आईं। नई नवेली दुल्हनों से लेकर बुजुर्ग महिलाओं तक, हर किसी के लिए यह दिन खास था। कोई चुपचाप आंखें बंद कर प्रार्थना कर रही थी, तो कोई अपनी सहेलियों के साथ पूजा की तैयारी में लगी थी।

सिर्फ व्रत नहीं, रिश्तों को जीने का दिन
भारतीय परंपरा में वट सावित्री व्रत को पति की लंबी उम्र और अखंड सौभाग्य से जोड़कर देखा जाता है। लेकिन रामगढ़ में शनिवार को जो दृश्य दिखा, वह सिर्फ धार्मिक अनुष्ठान भर नहीं था। महिलाओं के लिए यह अपने रिश्तों को महसूस करने और परिवार की खुशहाली की कामना का दिन भी था। शहर के एक वट वृक्ष के पास पूजा करने पहुंचीं मंजू देवी ने मुस्कुराते हुए कहा, “पूरा साल घर-परिवार की जिम्मेदारियों में निकल जाता है। यह एक ऐसा दिन होता है, जब हम अपने पति और परिवार की सुख-शांति के लिए मन से पूजा करते हैं। इसमें आस्था भी है और अपनापन भी।” उनके पास बैठी बुजुर्ग महिला अपनी बहू को पूजा की विधि समझा रही थीं। बीच-बीच में वे सावित्री और सत्यवान की कथा का महत्व भी बता रही थीं। यह नजारा बता रहा था कि परंपराएं सिर्फ किताबों में नहीं, बल्कि पीढ़ियों के अनुभवों और रिश्तों में जिंदा रहती हैं।
मंदिरों और वट वृक्षों के पास सुबह से लगी रही भीड़
रामगढ़ शहर, भुरकुंडा, पतरातू और आसपास के इलाकों में सुबह से ही मंदिरों और वट वृक्षों के पास महिलाओं की भीड़ जुटनी शुरू हो गई थी। महिलाएं पूजा की थाली लेकर पहुंचीं और वट वृक्ष की परिक्रमा कर धागा बांधा। कई जगहों पर महिलाओं ने सामूहिक रूप से पूजा की। मंदिर परिसर में भजन और मंत्रोच्चार की आवाजें गूंजती रहीं। पूजा के दौरान वातावरण पूरी तरह भक्तिमय हो गया था। कुछ महिलाएं निर्जला व्रत में थीं। बावजूद इसके उनके चेहरे पर थकान नहीं, बल्कि संतोष दिखाई दे रहा था। पूजा के बाद महिलाएं एक-दूसरे को आशीर्वाद देतीं और प्रसाद बांटती नजर आईं।

सावित्री की कथा आज भी देती है विश्वास का संदेश
पूजा के दौरान पुरोहितों ने महिलाओं को सावित्री और सत्यवान की कथा सुनाई। कथा में बताया गया कि किस तरह सावित्री ने अपने अटूट प्रेम, साहस और दृढ़ संकल्प से यमराज से अपने पति सत्यवान के प्राण वापस ले लिए थे। धार्मिक मान्यता के साथ यह कथा आज भी रिश्तों में विश्वास और समर्पण की मिसाल मानी जाती है। शायद यही वजह है कि आधुनिक जीवनशैली और बदलते समय के बावजूद यह परंपरा आज भी उतनी ही मजबूती से निभाई जा रही है।
बाजारों में भी दिखी रौनक
वट सावित्री पूजा को लेकर बाजारों में भी खास चहल-पहल देखने को मिली। फूल, फल, सिंदूर, चूड़ियां और पूजा सामग्री की दुकानों पर सुबह से भीड़ रही। छोटे दुकानदारों के लिए भी यह दिन खास रहा। फूल बेचने वाले एक दुकानदार ने बताया कि सुबह से लगातार महिलाएं पूजा की सामग्री खरीदने पहुंच रही थीं। त्योहार के कारण बाजार में अच्छी रौनक रही।

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