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Home » झारखंड में मौ’त उगलती सुरंगें, फलता-फूलता माफिया नेटवर्क और लुटता खजाना… जानें
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झारखंड में मौ’त उगलती सुरंगें, फलता-फूलता माफिया नेटवर्क और लुटता खजाना… जानें

June 22, 2026No Comments7 Mins Read
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माफिया
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Ranchi/Hazaribagh : कोयले की एक बोरी निकालने के लिए कुछ मजदूर रोज उस सुरंग में उतरते हैं, जहां से वापस लौटने की कोई गारंटी नहीं होती। कोई चाल धंसने से मरता है, कोई जहरीली गैस का शिकार होता है और कोई पानी में समा जाता है। इसके बावजूद झारखंड के कोयलांचल में अवैध खनन का सिलसिला नहीं रुकता। वजह साफ है। इस कारोबार में गरीब की मजबूरी है, माफिया का मुनाफा है और सिस्टम की नाकामी पर उठते लगातार सवाल हैं।

अब बीते रविवार की ही घटना ले लीजिये। भोर में हजारीबाग के बड़कागांव इलाके में सब कुछ ठीक-ठाक दिख रहा था। गांव के कुछ लोग रोज की तरह काम पर निकले थे। लेकिन कुछ ही घंटों बाद खबर फैली कि राउतपारा के पास एक अवैध कोयला खदान में चाल धंस गई है। मलबे के नीचे दबकर एक मजदूर की मौत हो गई और दो अन्य घायल हो गए। घटना के बाद इलाके में खलबली मच गई। लोग जुटे, चर्चा शुरू हुई और फिर वही सवाल सामने आया जो पिछले कई वर्षों से हर बड़े हादसे के बाद पूछा जाता रहा है। आखिर झारखंड में अवैध कोयला खनन का यह सिलसिला कब रुकेगा?

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कोयले की चमक के पीछे छिपी है अंधेरे की एक दुनिया

यहां याद दिला दें कि झारखंड देश के सबसे बड़े कोयला उत्पादक राज्यों में गिना जाता है। यहां की खदानों से निकलने वाला कोयला देश के बिजलीघरों, इस्पात संयंत्रों और उद्योगों तक पहुंचता है। लेकिन कोयले की इसी दौलत के समानांतर एक दूसरी दुनिया भी खड़ी हो चुकी है। यह दुनिया है अवैध खनन, तस्करी और माफिया नेटवर्क की। हजारीबाग, रामगढ़, बोकारो और उत्तरी छोटानागपुर के कई इलाकों में ऐसी अनगिनत जगहें हैं जहां रात के अंधेरे में या जंगलों के भीतर चुपचाप सुरंगें खोदी जाती हैं। वहां न कोई सुरक्षा इंतजाम होता है, न कोई तकनीकी निगरानी और न ही मजदूरों की जान की कोई कीमत। चंद रुपये की मजदूरी के लिए लोग कई-कई फीट नीचे उतर जाते हैं। उन्हें पता होता है कि सुरंग कभी भी धंस सकती है, जहरीली गैस जान ले सकती है या अचानक पानी भर सकता है। फिर भी वे जाते हैं क्योंकि उनके सामने दूसरा विकल्प नहीं होता।

मौत की खबरें आती हैं, लेकिन कारोबार पर ब्रेक नहीं लगता

बड़कागांव की ताजा घटना से पहले रामगढ़ जिले के अरगड्डा क्षेत्र में चार युवकों की मौत ने पूरे राज्य को झकझोर दिया था। बंद पड़ी खदान के पास बनी एक अवैध सुरंग में उतरने के बाद वे बाहर नहीं लौट सके। ऑक्सीजन की कमी और जहरीली गैस ने उनकी जान ले ली। उससे पहले हजारीबाग के बरियातू-खावा इलाके में अवैध खदान में नदी का पानी घुस गया था। तीन लोगों की मौत हुई थी। ऐसी घटनाओं की लिस्ट लगातार लंबी होती जा रही है। कभी चाल धंसती है, कभी सुरंग टूटती है, कभी गैस भर जाती है और कभी पानी मौत बनकर खदान में उतर आता है। लेकिन हर हादसे के बाद कुछ दिन चर्चा होती है, प्रशासनिक हलचल बढ़ती है और फिर सब कुछ पहले जैसा हो जाता है।

हजारीबाग क्यों बन गया अवैध कोयला कारोबार का हॉटस्पॉट

अगर पिछले कुछ वर्षों के रिकॉर्ड देखें तो हजारीबाग जिला अवैध कोयला खनन के मामलों में लगातार सुर्खियों में रहा है। बड़कागांव, गोंदलपुरा, बादम, मोहनपुर, चनारो, बुच्चाडीह, चुरचू, आंगो और केरेडारी जैसे इलाके बार-बार कार्रवाई और बरामदगी की खबरों में आते रहे हैं।

  • वर्ष 2021 में बड़कागांव क्षेत्र की 10 अवैध खदानों को डोजरिंग कर बंद किया गया था।
  • 2022 में पुलिस ने कई जंगल क्षेत्रों में सर्च अभियान चलाया।
  • वर्ष 2024 में वन विभाग ने राउतपारा जंगल से 34 टन अवैध कोयला जब्त किया।
  • वर्ष 2025 में गोंदलपुरा क्षेत्र से 65 टन कोयला बरामद किया गया।
  • एक वर्ष पहले 32 अवैध खदानों के मुहानों को बंद किया गया था।
  • पुलिस रिकॉर्ड बताते हैं कि केवल छह महीनों के भीतर अवैध खनन से जुड़े 50 से अधिक मामले दर्ज किए गए थे।

इतनी कार्रवाई के बावजूद कारोबार का जारी रहना अपने आप में कई सवाल खड़े करता है।

आखिर कहां से मिलती है इस कारोबार को ताकत

स्थानीय लोग खुलकर भले न बोलें, लेकिन कोयलांचल के गांवों में यह चर्चा आम है कि अवैध खनन अब सिर्फ कुछ लोगों का काम नहीं रह गया है। इसके पीछे एक पूरा नेटवर्क काम करता है। सुरंग खोदने वाले अलग होते हैं, कोयला निकालने वाले अलग, उसे जमा करने वाले अलग और बाजार तक पहुंचाने वाले अलग। यही वजह है कि किसी एक जगह कार्रवाई होने पर भी कारोबार पूरी तरह बंद नहीं होता। कुछ दिन बाद दूसरे इलाके में फिर उत्खनन शुरू हो जाता है। खनन जानकारों का कहना है कि कोयले की लगातार मांग इस कारोबार को जिंदा रखती है। ईंट भट्ठों, छोटे उद्योगों और स्थानीय बाजारों में सस्ता कोयला आसानी से खप जाता है। जब मांग बनी रहती है तो आपूर्ति का रास्ता भी निकल ही आता है।

गरीबी और बेरोजगारी भी बड़ी वजह

अवैध खनन की कहानी सिर्फ माफिया और तस्करी की कहानी नहीं है। इसके पीछे गरीबी और बेरोजगारी की भी एक कड़वी सच्चाई है। कोयलांचल के कई गांवों में रोजगार के अवसर सीमित हैं। खेती से परिवार का गुजारा मुश्किल होता है। ऐसे में कई युवा और मजदूर अवैध खनन की ओर खिंच जाते हैं। उन्हें मालूम होता है कि खतरा है। उन्हें यह भी पता होता है कि कई लोग इसी काम में जान गंवा चुके हैं। लेकिन घर चलाने की मजबूरी उन्हें फिर उसी सुरंग की तरफ ले जाती है। एक स्थानीय सामाजिक कार्यकर्ता कहते हैं कि कई बार मजदूरों के सामने विकल्प यह होता है कि या तो जोखिम उठाकर कमाई करें या फिर परिवार को भूखा रखें। ऐसे में वे खतरे के बावजूद खदान में उतर जाते हैं।

सरकारी खजाने को भी लग रही भारी चोट

अवैध खनन से सिर्फ मजदूरों की जान नहीं जा रही, बल्कि सरकार को भी भारी आर्थिक नुकसान हो रहा है। वैध खनन परियोजनाओं से सरकार को रॉयल्टी, डीएमएफटी, जीएसटी और कई तरह के कर मिलते हैं। यही पैसा विकास योजनाओं, सड़क, शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं पर खर्च होता है। लेकिन अवैध खनन से निकला कोयला बिना किसी कर और रॉयल्टी के बाजार में पहुंच जाता है। नतीजा यह होता है कि राज्य को मिलने वाला राजस्व गायब हो जाता है और अवैध कारोबारियों की जेब भरती जाती है।

जंगलों के भीतर भी चल रहा खेला

अवैध खनन का असर सिर्फ जमीन के नीचे तक सीमित नहीं है। कई मामलों में जंगलों के भीतर सुरंगें बनाकर कोयला निकाला जाता है। इससे वन क्षेत्र को नुकसान पहुंचता है। मिट्टी का कटाव बढ़ता है, भू-स्खलन का खतरा पैदा होता है और भूजल स्तर प्रभावित होता है। पर्यावरण विशेषज्ञों का कहना है कि अगर यह सिलसिला इसी तरह जारी रहा तो आने वाले वर्षों में कई इलाकों का पारिस्थितिक संतुलन गंभीर रूप से प्रभावित हो सकता है।

कार्रवाई होती है, लेकिन क्या वह काफी है?

यह नहीं कहा जा सकता कि प्रशासन ने कोई कार्रवाई नहीं की। पुलिस, वन विभाग और जिला प्रशासन समय-समय पर छापेमारी करते रहे हैं। कोयला जब्त होता है, खदानें बंद की जाती हैं और मामले दर्ज होते हैं। लेकिन जमीन पर नतीजे उतने प्रभावी दिखाई नहीं देते। यही कारण है कि हर कार्रवाई के बाद भी अवैध खनन किसी न किसी रूप में फिर शुरू हो जाता है। जानकारों का मानना है कि जब तक उत्खनन से लेकर परिवहन, भंडारण और बिक्री तक की पूरी श्रृंखला पर एक साथ चोट नहीं की जाएगी, तब तक समस्या जड़ से खत्म नहीं होगी।

सबसे बड़ा सवाल अब भी बाकी

बड़कागांव की ताजा घटना सिर्फ एक दुर्घटना नहीं है। यह उस बड़ी समस्या का संकेत है जो वर्षों से झारखंड के कोयलांचल में जड़ें जमाए बैठी है। हर हादसे के बाद कुछ परिवार अपने कमाने वाले सदस्य को खो देते हैं। सरकार के खजाने पर चोट अलग पड़ती है। जंगल प्रभावित होते हैं। लेकिन अवैध कारोबार का पहिया चलता रहता है। ऐसे में सवाल सिर्फ यह नहीं है कि अगला हादसा कहां होगा। असली सवाल यह है कि क्या झारखंड अवैध कोयला खनन की इस काली अर्थव्यवस्था को रोकने के लिए कोई स्थायी और निर्णायक कदम उठा पाएगा, या फिर आने वाले दिनों में किसी और सुरंग से फिर मौत की खबर बाहर आएगी।

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