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Ayodhya : अयोध्या के राम मंदिर में चढ़ावा चोरी मामले की जांच जैसे-जैसे आगे बढ़ रही है, नए और हैरान करने वाले खुलासे हो रहे हैं। इस पूरे मामले में अब स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (SBI) की एक बड़ी चेतावनी और उस पर ट्रस्ट के बड़े पदाधिकारियों की मेहरबानी की बात सामने आई है। अगर बैंक की बात मान ली गई होती, तो शायद इतने बड़े पैमाने पर दान के पैसों की चोरी को बहुत पहले ही रोका जा सकता था। आइए जानते हैं कि इस पूरे खेल में कब और कहां लापरवाही बरती गई।
बैंक ने दी थी चेतावनी, पर आड़े आ गए रसूखदार
करीब तीन महीने पहले एसबीआई बैंक के एक अधिकारी को चढ़ावे की गिनती में कुछ गड़बड़ी का अंदेशा हुआ था। बैंक अधिकारी ने सतर्कता दिखाते हुए दान गिनने वाले कर्मचारियों (गणनाकर्मियों) को बदलने की सिफारिश की थी। बैंक का तर्क था कि ये लोग बहुत लंबे समय से नोटों की गिनती के काम में लगे हैं, इसलिए नियमों के मुताबिक इन्हें बदलना जरूरी है। जिस आउटसोर्सिंग कंपनी के जरिए इन कर्मचारियों को रखा गया था, वह इन्हें हटाने की प्रक्रिया शुरू भी करने वाली थी। लेकिन तभी राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के बड़े पदाधिकारी इन संदिग्ध कर्मचारियों के लिए ढाल बनकर खड़े हो गए। इन रसूखदार पदाधिकारियों के दबाव के आगे बेबस होकर बैंक अधिकारियों को अपने कदम पीछे खींचने पड़े और कर्मचारियों को नहीं हटाया जा सका।
सैलरी बैंक की, वफादारी ट्रस्ट के करीबियों की
चोरी के इस मामले में जो सबसे बड़ा पेंच फंसा, वो यह था कि पैसे गिनने वाले ये कर्मचारी भले ही बैंक की आउटसोर्सिंग कंपनी के थे, लेकिन इनका सीधा कनेक्शन ट्रस्ट के बड़े लोगों से था। चोरी के खेल में शामिल अनुकल्प मिश्रा, लवकुश मिश्रा, मनीष कुमार यादव, रमाशंकर मिश्रा, अवनीश और करुणेश शुक्ला जैसे कर्मचारियों की भर्ती भले ही कंपनी के जरिए हुई थी, लेकिन ये सभी लोग ट्रस्ट के पदाधिकारियों के रिश्तेदार या बेहद करीबी थे। आसान शब्दों में कहें तो इन कर्मचारियों को सैलरी तो बैंक दे रहा था, लेकिन ये काम ट्रस्ट के बड़े लोगों के इशारे पर कर रहे थे।
कार्रवाई रुकने से बढ़ा चोरों का हौसला
जब इन कर्मचारियों को हटाने की कोशिश नाकाम हो गई, तो उनके हौसले सातवें आसमान पर पहुंच गए। उन्हें इस बात का पूरा भरोसा हो गया कि जब ट्रस्ट के इतने बड़े नाम उनके साथ खड़े हैं, तो उनका कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता। इसी बेफिक्री का नतीजा यह हुआ कि उन्होंने पहले से भी ज्यादा रकम गायब करना और उसे ठिकाने लगाना शुरू कर दिया।
इस्तीफे पर फैसला टला, उठ रहे कई सवाल
चढ़ावा चोरी का मामला सामने आने के बाद ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय और सदस्य अनिल मिश्रा लगातार सवालों के घेरे में रहे। बताया जा रहा है कि दोनों ने अपने इस्तीफे सौंप दिए हैं, लेकिन ट्रस्ट का कहना है कि इस पर अंतिम फैसला ट्रस्ट की बैठक में ही लिया जाएगा। यहीं से नए सवाल भी उठ रहे हैं। इतना गंभीर मामला सामने आने के बावजूद तत्काल निर्णय क्यों नहीं लिया गया। क्या बैठक का इंतजार सिर्फ औपचारिकता है या फिर मामले को शांत होने का समय दिया जा रहा है। इन सवालों पर ट्रस्ट की ओर से अभी तक कोई स्पष्ट जवाब सामने नहीं आया है।
बीस दिन तक चलता रहा विवाद, दबाव बढ़ने पर दिया इस्तीफा
सूत्रों के मुताबिक, चढ़ावा चोरी का मामला सामने आने के बाद करीब बीस दिनों तक पूरे घटनाक्रम को लेकर विवाद बना रहा। इस दौरान ट्रस्ट के दोनों पदाधिकारियों से इस्तीफा देने की मांग की जाती रही, लेकिन शुरुआत में वे इसके लिए तैयार नहीं हुए। बाद में जब दबाव लगातार बढ़ता गया, तब दोनों ने अपने इस्तीफे सौंप दिए। अब सभी की नजर ट्रस्ट की अगली बैठक पर है, जहां यह तय होगा कि इन इस्तीफों को स्वीकार किया जाएगा या नहीं।
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