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Ranchi (Pawan Thakur) : रांची रेलवे स्टेशन का प्लेटफॉर्म नंबर 2/3… पटरियों से आती छुक-छुक की आवाजें, यात्रियों की जल्दबाजी और अनाउंसमेंट का शोर। इस तमाम गहमागहमी के बीच लोहे की एक ठंडी बेंच पर सिमटकर बैठी थी एक 15 साल की बच्ची। हाथों में कोई बड़ा सामान नहीं, बस आंखों में एक गहरा सन्नाटा और अनजाना सा खौफ। वह हर आने-जाने वाले को उम्मीद और डर से देख रही थी, मानो अपनी जिंदगी के सबसे बड़े फैसले के बोझ तले दब गई हो।
बात बीते 20 जुलाई की है। हर दिन की तरह RPF पोस्ट रांची और डिविजनल ‘नन्हे फरिश्ते’ की टीम गश्त पर थी। भीड़ को भांपने में माहिर जवानों की नजर जैसे ही इस अकेली और घबराई हुई बच्ची पर पड़ी, उनके कदम वहीं ठिठक गए। इतने बड़े स्टेशन पर एक मासूम का इस तरह अकेला होना किसी बड़ी अनहोनी की आहट दे रहा था।
“मां को नहीं पता कि मैं कहां हूं…”
टीम की महिला पुलिसकर्मी धीरे से बच्ची के पास बैठीं। पहले उसे पीने को पानी दिया, थोड़ा सहलाया और फिर जब बच्ची को लगा कि ये वर्दी वाले नुकसान पहुंचाने नहीं, बल्कि मदद करने आए हैं, तब उसकी आंखों से डर के आंसू छलक पड़े। फुसफुसाते हुए उसने अपना नाम बताया। उसकी उम्र करीब 15 साल थी। वह बोकारो के बेरमो इलाके के खुशरो गांव की रहने वाली है। पिता का देहांत हो चुका था। पिता के जाने के बाद घर की माली हालत बहुत बढ़िया नहीं थी। छोटी सी उम्र में जिम्मेदारियों का बोझ और कुछ बेहतर कर गुजरने की बेबसी उसे इस रास्ते पर ले आई। उसने रोते हुए बताया कि वह अपनी मां को बिना कुछ बताए चुपचाप घर से निकल आई थी। उसका मकसद हैदराबाद के पास चारलापल्ली पहुंचकर कोई छोटा-मोटा काम ढूंढना था, ताकि दो वक्त की रोटी का जरिया बन सके।
गलत हाथों में जाने से पहले मिली नई जिंदगी
मासूम को इस बात का जरा भी अंदाजा नहीं था कि जिस अनजान सफर पर वह निकल पड़ी थी, वहां कदम-कदम पर कितने खतरे मंडराते हैं। एक अकेली बच्ची का रेलवे स्टेशनों और अनजान शहरों में भटकना उसे किसी बड़े रैकेट या मुसीबत के जाल में फंसा सकता था। लेकिन ऑपरेशन ‘नन्हे फरिश्ते’ के तहत सुरक्षाकर्मियों ने एक ढाल की तरह उसे अपनी पनाह में ले लिया। RPF पोस्ट में पहले उसे पेट भरकर खाना खिलाया गया, फिर बहुत प्यार से समझाया गया कि बिना अपनों को बताए इस तरह जाना कितना खतरनाक हो सकता है। कागजी औपचारिकताएं पूरी करने के बाद बच्ची को चाइल्डलाइन रांची के हवाले कर दिया गया, ताकि उसे वापस उसकी मां की सुरक्षित आगोश में पहुंचाया जा सके।
इस संवेदनशील मिशन के नायक
इस पूरी घटना ने एक बार फिर साबित किया कि पुलिस की सख्त वर्दी के पीछे भी एक बेहद संवेदनशील दिल धड़कता है। इस रेस्क्यू को अंजाम देने में जिन अधिकारियों और जवानों ने अहम भूमिका निभाई, उनमें डिविजनल ‘नन्हे फरिश्ते’ टीम की महिला एसआई सुशीला बराइक, महिला सिपाही सोनाली शर्मा, सोनम कुमारी और आरपीएफ पोस्ट रांची के एएसआई मोहम्मद शौकत खान शामिल थे।
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