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Ramgarh (Dharmendra Pradhan) : बरसों से अपनी जमीन और रोजगार के लिए लड़ रहे भुरकुंडा के रैयत-विस्थापितों का गुस्सा अब सड़क पर आ गया है। शुक्रवार को सैकड़ों ग्रामीण तीर-धनुष और पारंपरिक हथियारों के साथ बीएलए आउटसोर्सिंग कंपनी के कार्यस्थल पर पहुंच गए। ग्रामीणों ने आउटसोर्सिंग कार्य के रास्ते में ही तंबू और पंडाल गाड़ दिया। इसके बाद अनिश्चितकालीन धरना शुरू कर दिया गया। आंदोलन के कारण बीएलए आउटसोर्सिंग का काम पूरी तरह ठप हो गया।
रैयत विस्थापित मोर्चा और झारखंडी बेरोजगार संघर्ष मोर्चा के बैनर तले शुरू हुए इस आंदोलन में बड़ी संख्या में महिला और पुरुष शामिल हुए। ग्रामीणों का कहना है कि वे अपनी मांगों को लेकर कई बार प्रबंधन के दरवाजे पर जा चुके हैं। बैठकें हुईं, बातचीत हुई और आश्वासन भी मिले, लेकिन जमीन पर कोई ठोस काम नहीं हुआ। अब ग्रामीणों ने साफ कर दिया है कि जब तक उनकी मांगों पर फैसला नहीं होता, आंदोलन जारी रहेगा।
बार-बार बैठक, हर बार आश्वासन… अब ग्रामीणों का धैर्य टूटा
रैयत विस्थापित मोर्चा के नेता रंजीत बेसरा ने कहा कि भुरकुंडा के रैयत और विस्थापितों की समस्याओं को लेकर प्रबंधन के साथ कई दौर की बातचीत हो चुकी है। हर बार ग्रामीणों को भरोसा दिया गया कि उनकी मांगों पर जल्द कार्रवाई होगी। लेकिन समय बीतता गया और समस्या जस की तस बनी रही।
उन्होंने कहा कि प्रबंधन बैठक पर बैठक कर मामले को टालता रहा। ग्रामीणों को लगा कि शायद इस बार उनकी बात सुनी जाएगी, लेकिन बार-बार आश्वासन मिलने के बाद भी कोई ठोस निर्णय नहीं हुआ। अब पानी सिर से ऊपर जा चुका है। ग्रामीण अब सिर्फ आश्वासन के भरोसे बैठने वाले नहीं हैं।
जमीन गई तो रोजगार भी चाहिए
आंदोलनकारियों की सबसे बड़ी मांग जमीन के बदले रोजगार की है। ग्रामीणों का कहना है कि कोलियरी और परियोजनाओं के विस्तार में स्थानीय लोगों की जमीन गई। कई परिवारों ने अपनी जमीन गंवाई, लेकिन रोजगार का लाभ उन्हें नहीं मिला।
ग्रामीणों का सवाल है कि अगर स्थानीय लोगों की जमीन पर परियोजना चल रही है तो रोजगार के लिए बाहर के लोगों को प्राथमिकता क्यों दी जा रही है। उनका कहना है कि जमीन गंवाने वाले परिवारों और स्थानीय बेरोजगार युवाओं को रोजगार मिलना चाहिए।
ट्रांसपोर्टिंग में भी स्थानीय लोगों को मिले प्राथमिकता
आंदोलनकारियों ने बीएलए आउटसोर्सिंग के ट्रांसपोर्टिंग कार्य में स्थानीय लोगों को प्राथमिकता देने की मांग की है। ग्रामीणों का कहना है कि ट्रांसपोर्टिंग से जुड़े काम में स्थानीय बेरोजगारों को अवसर मिल सकता है। इसके बावजूद उन्हें लगातार नजरअंदाज किया जा रहा है। ग्रामीणों ने कहा कि स्थानीय लोगों को रोजगार और काम का अवसर नहीं दिया गया तो आंदोलन और तेज किया जाएगा।
रोडसेल में भी विस्थापितों का हक मांगा
भुरकुंडा कोलियरी के रोडसेल में भी विस्थापितों को उनका अधिकार देने की मांग आंदोलनकारियों ने की है। ग्रामीणों का कहना है कि कोलियरी से जुड़े कामकाज में स्थानीय लोगों की भागीदारी सुनिश्चित होनी चाहिए। उनका कहना है कि वर्षों से विस्थापन का दंश झेल रहे लोगों को अब अपने ही क्षेत्र में रोजगार और कारोबार के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है। यही वजह है कि ग्रामीणों में लगातार नाराजगी बढ़ती जा रही है।
महिलाओं ने भी संभाला मोर्चा
आंदोलन में महिलाओं की भी अच्छी भागीदारी रही। बड़ी संख्या में महिलाएं और पुरुष धरनास्थल पर डटे रहे। ग्रामीणों ने तंबू लगाकर वहीं बैठने की तैयारी कर ली है। आंदोलनकारियों का कहना है कि जब तक उनकी मांगों पर लिखित और ठोस पहल नहीं होती, तब तक धरना समाप्त नहीं किया जाएगा।
धरने में बिरेन्द्र मांझी, सन्नी बेसरा, शंकर मांझी, ब्रह्मदेव मुर्मू, किशुन नायक, संजयनाथ करमाली, बिहारी मांझी, सुनील मुर्मू, सुखदेव उरांव, बैजनाथ बेदिया, ठुरका मांझी, धनीराम मांझी, राज मुर्मू, राकेश मुंडा, सूरज मुर्मू, रंजीत मांझी, बिक्रम हेम्ब्रम, राजेन्द्र करमाली, मिलन यादव, प्रिंस बेदिया, सुरेश बेदिया, शिवलाल मुर्मू, महेश सोरेन, मनोज मुर्मू और संदीप सोरेन समेत सैकड़ों महिला-पुरुष मौजूद रहे।
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