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Home » नेमरा में भीगी आंखें, सीने में वही मशाल… जब बेटे हेमंत ने प्रतिमा में निहारा अपने ‘दिशोम गुरु’ का अक्स
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नेमरा में भीगी आंखें, सीने में वही मशाल… जब बेटे हेमंत ने प्रतिमा में निहारा अपने ‘दिशोम गुरु’ का अक्स

August 4, 2026No Comments8 Mins Read
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हेमंत
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Pawan Thakur

रामगढ़ जिले के छोटे से गांव नेमरा से सटे लुकैयाटांड़ मैदान में सुबह से ही लोगों की आवाजाही शुरू हो चुकी थी। क्योंकि आज का दिन था अपनी माटी के उस बेटे को याद करने का, जिसने जीवन भर झारखंड के जंगलों, पहाड़ों और आदिवासियों के अधिकारों के लिए लड़ाई लड़ी। दिशोम गुरु स्व. शिबू सोरेन की पहली पुण्यतिथि पर पूरा इलाका अपने प्रिय नेता को श्रद्धांजलि देने उमड़ पड़ा था। मैदान में पसरे सन्नाटे और लोगों की भीगी आंखों के बीच जैसे ही सीएम हेमंत सोरेन ने अपनी मां रूपी सोरेन और पत्नी कल्पना सोरेन के साथ मंच की ओर कदम बढ़ाए, माहौल पूरी तरह भावुक हो उठा।

सोना सोबरन प्लस टू उच्च विद्यालय परिसर में जब दिशोम गुरु की आदमकद प्रतिमा से पर्दा हटा, तो एक पल के लिए वहां मौजूद हर शख्स की आंखें थम गईं। कांसे की उस मूरत में वही चिर-परिचित सादगी, वही सौम्य मुस्कान और वही आंखों का तेज नजर आ रहा था, जिसे देखकर कभी लाखों लोग आंदोलनों में कूद पड़ते थे। सीएम हेमंत सोरेन ने जब हाथ जोड़कर प्रतिमा के चरणों में फूल चढ़ाए, तो एक मुख्यमंत्री का आभामंडल पीछे छूट गया और केवल एक बेटे का दर्द छलक उठा। अपनी मां रूपी सोरेन के कंधों पर हाथ रखे खड़े हेमंत सोरेन की नजरें काफी देर तक अपने पिता की प्रतिमा पर ही टिकी रहीं।

आंसुओं से भीगी यादें और एक बेटे का दर्द

समारोह को संबोधित करने जब हेमंत सोरेन माइक के पास पहुंचे, तो उनकी आवाज में एक अजीब सा भारीपन था। उन्होंने सीधे दिल से बात शुरू करते हुए कहा कि आज का दिन उनके और उनके पूरे परिवार के लिए बहुत ही भावुक और भारी है। यह दुख केवल उनके घर-परिवार की चारदीवारी तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरे झारखंड के साथ-साथ देश के हर उस आदिवासी, दलित, गरीब और पिछड़े इंसान का दुख है, जिसने गुरुजी को अपने अभिभावक के रूप में देखा था।

सीएम हेमंत सोरेन ने भावुक होते हुए कहा कि पिछले साल आज ही के दिन आदरणीय बाबा हम सभी को छोड़कर पंचतत्व में विलीन हो गए थे। इस दुनिया और प्रकृति का यही शाश्वत नियम है कि जिसने इस धरती पर जन्म लिया है, उसे एक न एक दिन कालचक्र के विधान के अनुसार विदा होना ही पड़ता है। गुरुजी ने भी उसी जीवन चक्र को पूरा किया। कभी-कभी समय का पहिया ऐसा घूमता है कि हमारे सबसे प्रिय लोग हमसे दूर हो जाते हैं। लुकैयाटांड़ में गुरुजी की यह भव्य प्रतिमा केवल पत्थर या धातु का ढांचा नहीं है, बल्कि यह इस बात की प्रतीक है कि हमारी आने वाली पीढ़ियां अपनी जड़ों, अपने इतिहास और अपने पुरखों के त्याग को कभी न भूलें।

दादा के बलिदान की वो काली रात और अधूरा दर्द

अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए हेमंत सोरेन अतीत के पन्नों में लौट गए। उन्होंने अपने दादा अमर शहीद स्व. सोबरन मांझी के बलिदान को याद किया, जिसकी कहानियां सुनकर वे बड़े हुए थे। उन्होंने बताया कि उस जमाने में जब रामगढ़ अलग जिला नहीं हुआ करता था और हजारीबाग का ही हिस्सा था, तब उनके दादाजी ने एक छोटे से स्कूल में शिक्षक बनकर बच्चों को पढ़ाना और समाज को जगाना शुरू किया था। वे लोगों को शोषण के खिलाफ जागरूक कर रहे थे, लेकिन समाज के कुछ असामाजिक तत्वों को यह बात रास नहीं आई।

एक रात के अंधेरे में बड़ी ही बेरहमी से सोबरन मांझी की हत्या कर दी गई। हेमंत सोरेन ने कहा कि वह घटना उनके जन्म से पहले की है, लेकिन आज भी जब उस काले अध्याय का जिक्र होता है या उसकी याद आती है, तो कलेजा कांप उठता है और मन बहुत व्यथित हो जाता है। सबसे बड़ी चिंता की बात यह है कि वही असामाजिक तत्व आज भी मरे नहीं हैं। वे नए-नए चेहरों और नए-नए रूपों में हमारे बीच घूम रहे हैं। एक तरफ जहां देश चांद पर पहुंचने की बातें कर रहा है, वहीं दूसरी तरफ दूर-दराज़ के गांवों में ऐसे लोग भोले-भाले ग्रामीणों, महिलाओं और नौजवानों को गुमराह करने में लगे हैं। इस बुराई से लड़ने का एक ही रास्ता है कि हम आपस में अटूट एकजुटता बनाए रखें और एक-दूसरे का सम्मान करें।

साधारण इंसान से ‘दिशोम गुरु’ बनने का वो महान सफर

नेमरा की इस पावन मिट्टी में गुरुजी के बचपन की यादें बसी हैं। इसी गांव की पगडंडियों पर नंगे पांव चलने वाला एक साधारण सा बालक शिबू कैसे पूरे राज्य का ‘दिशोम गुरु’ यानी देश का गुरु बन गया, यह कहानी आज भी हर गांव-कस्बे में सुनाई जाती है। महाजनों के जुल्म, जल-जंगल-जमीन की लूट और आदिवासियों के साथ होते अन्याय के खिलाफ जब शिबू सोरेन ने आवाज उठाई, तो पूरा झारखंड उनके पीछे हो लिया था।

सीएम हेमंत सोरेन ने कहा कि गुरुजी के विचार और उनके आदर्श किसी एक गांव, पंचायत या राजनीतिक पार्टी तक सीमित नहीं रहे। वे राजनीति की पारंपरिक सीमाओं से बहुत आगे निकल चुके थे। एक ऐसा व्यक्तित्व जिसके सामने पद, मंत्री, विधायक या मुख्यमंत्री की हैसियत बहुत छोटी पड़ जाती है। उन्होंने दलगत राजनीति से ऊपर उठकर झारखंड आंदोलन की ऐसी अलख जगाई कि अंततः अलग राज्य का सपना साकार होकर रहा। बारिश का मौसम होने के बावजूद आज राज्य के कोने-कोने से जिस तरह लोग स्वतःस्फूर्त अपने नेता को याद करने पहुंचे हैं, वह साबित करता है कि गुरुजी आज भी लोगों के दिलों में जिंदा हैं।

विरासत को संभालने का संकल्प और 105 करोड़ की सौगात

पिता की पुण्यतिथि के इस मंच से हेमंत सोरेन ने केवल अतीत को याद नहीं किया, बल्कि भविष्य की जिम्मेदारियों का भी अहसास कराया। उन्होंने कहा कि दिशोम गुरु जैसे वीर सपूतों ने अपने खून-पसीने से सींचकर हमें यह अलग झारखंड राज्य बनाकर दिया है। लेकिन अब इस राज्य को सजाने, संवारने और आगे ले जाने की एक बहुत बड़ी जिम्मेदारी हम सभी के कंधों पर है।

एक जिम्मेदार सरकार का नेतृत्व करने के नाते उनका यही प्रयास है कि झारखंड के अंतिम छोर पर बैठे व्यक्ति तक सरकार की आवाज और सरकारी योजनाओं का लाभ पहुंचे। सरकार लोगों के द्वार तक जाए और उनकी समस्याओं को सुनकर उनका समाधान करे। इसी सोच को आगे बढ़ाते हुए मुख्यमंत्री ने इस अवसर पर रामगढ़ और आसपास के क्षेत्र के लिए 105.2 करोड़ रुपये की विभिन्न विकास योजनाओं का उद्घाटन और शिलान्यास किया। उन्होंने कहा कि विकास की यह बयार ही गुरुजी के सपनों के झारखंड का असली आधार बनेगी।

युवाओं को भटकने से बचाने की अपील

आज के आधुनिक दौर और बदलती युवा पीढ़ी पर बोलते हुए मुख्यमंत्री ने कहा कि आज की नई पीढ़ी के पास अपार ऊर्जा और ताकत है। यह ऊर्जा राज्य को नई ऊंचाइयों पर ले जा सकती है, लेकिन इसके साथ ही भटकने का खतरा भी उतना ही बड़ा है। आज हमारी सबसे बड़ी जिम्मेदारी यह है कि हम अपने बच्चों और नौजवानों को सही रास्ता दिखाएं। अगर हमारी युवा पीढ़ी सही दिशा में आगे बढ़ेगी, तो कोई भी असामाजिक ताकत हमारे समाज को तोड़ नहीं पाएगी।

उन्होंने कहा कि झारखंड केवल एक भौगोलिक क्षेत्र नहीं है, यह तो वीरों की तपोभूमि है। इस मिट्टी पर भगवान बिरसा मुंडा, सिदो-कान्हू, चांद-भैरव, निर्मल महतो और विनोद बिहारी महतो जैसे अनगिनत वीरों ने जन्म लिया है। हम सब उन्हीं महान आत्माओं के वंशज हैं। हमारी रगो में वीरों का खून दौड़ रहा है। इसलिए हमारी लड़ाई आपस में एक-दूसरे से नहीं, बल्कि गरीबी, अशिक्षा, पिछड़ेपन और हमारे समाज को बांटने वाली ताकतों के खिलाफ होनी चाहिए।

जनसैलाब ने किया नम आंखों से जोहार

कार्यक्रम के अंतिम पड़ाव में जब मुख्यमंत्री ने अपने गांव और इस क्षेत्र के लोगों के प्रति आभार जताया, तो पूरा मैदान तालियों की गड़गड़ाहट और ‘शिबू सोरेन अमर रहें’ के नारों से गूंज उठा। हेमंत सोरेन ने कहा कि आज का दिन कोई औपचारिक भाषण देने का नहीं है, बल्कि गुरुजी की सीख और उनके संघर्ष को अपने दिल में उतारने का दिन है। भले ही वे शारीरिक रूप से हमारे बीच न हों, लेकिन उनका दिखाया हुआ रास्ता हमेशा हमारा मार्गदर्शन करता रहेगा।

इस ऐतिहासिक और भावुक क्षण के साक्षी बनने के लिए राज्य सरकार के कई वरिष्ठ मंत्री, सांसद, विधायक, मुख्य सचिव अविनाश कुमार सहित शासन-प्रशासन के बड़े अधिकारी मौजूद थे। मंच पर मंत्री राधा कृष्ण किशोर, संजय प्रसाद यादव, दीपिका पांडेय सिंह, योगेंद्र प्रसाद, शिल्पी नेहा तिर्की, राज्यसभा सांसद महुआ माजी, विधायक उमाकांत रजक, कुमार जयमंगल सिंह, अमित महतो, ममता देवी और पूर्व मंत्री बेबी देवी भी अपने नेता को श्रद्धांजलि देने पहुंचे थे। शाम ढलते-ढलते जब लोग अपने-अपने घरों की ओर लौटने लगे, तो हर किसी की जुबान पर गुरुजी के संघर्षों की कहानियां थी और आंखों में अपने दिशोम गुरु को खो देने का कभी न भरने वाला गम।

इसे भी पढ़ें : शिबू सोरेन : ‘जल, जंगल, जमीन’ का वो सिपाही, जिसने भारत के नक्शे पर उकेरा एक नया राज्य

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