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Home » जंगलों में घिरे, रसद रुकी तो घुटने टेके : 10 लाख का नक्सली कमांडर महिला साथियों के साथ नतमस्तक
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जंगलों में घिरे, रसद रुकी तो घुटने टेके : 10 लाख का नक्सली कमांडर महिला साथियों के साथ नतमस्तक

August 11, 2026No Comments5 Mins Read
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नक्सली
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Chaibasa : चाईबासा के दुर्गम पहाड़ों और घने जंगलों की ओट में तीन दशकों से जो नक्सली गोलियां बरसा रहे थे, उनके हौसले अब पस्त हो चुके हैं। मंगलवार को चाईबासा स्थित कोल्हान पुलिस मुख्यालय एक ऐतिहासिक मोड़ का गवाह बना। भाकपा माओवादी संगठन के रीढ़ माने जाने वाले 10 लाख रुपए के इनामी जोनल कमांडर सालुका कयाम उर्फ भुवनेश्वर समेत चार कट्टर नक्सलियों ने पुलिस और सीआरपीएफ के आला अधिकारियों के सामने घुटने टेक दिए। ऑपरेशन ‘नवजीवन-III’ के तहत हुए इस के बात यह साफ हो गया कि झारखंड के जंगलों में अब नक्सलियों की सामानांतर सत्ता का दौर खत्म होने की कगार पर है।

सुरक्षा बलों के सामने हथियार डालने वालों में केवल सालुका ही नहीं, बल्कि उसके तीन बेहद वफादार साथी भी शामिल हैं। इनमें एक लाख की इनामी दस्ता सदस्य कोदोमुनी कोड़ा, पिंकी पूर्ती उर्फ सुकांती और अनिता तामसोय शामिल हैं। सालुका, कोदोमुनी और पिंकी ने चाईबासा पुलिस के समक्ष आत्मसमर्पण किया, जबकि अनिता ने सरायकेला पुलिस की कमान के आगे अपने कदम पीछे खींचे। सरेंडर की मेज पर रखे घातक हथियार एक एके-47, एक इंसास राइफल, एक अन्य राइफल, दो मैगजीन, वायरलेस सेट और 843 जिंदा गोलियां इस बात की गवाही दे रहे थे कि सुरक्षा बलों ने संगठन के बारूदी जखीरे को किस कदर खाली कर दिया है।

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96 मामलों का संगीन इतिहास और बगावत का बैकग्राउंड

सालुका कयाम कोई मामूली कैडर नहीं था। पोराहाट, सारंडा और कोल्हान के त्रिकोण में सुरक्षा बलों के लिए वह सालों से सिरदर्द बना हुआ था। पुलिस फाइलों को पलटें तो उस पर चाईबासा में 90 और सरायकेला में 6 यानी कुल 96 संगीन मामले दर्ज हैं। वह संगठन की जोनल कमेटी में बैठकर खूनी साजिशों का ताना-बाना बुनता था।

लेकिन आखिर ऐसा क्या हुआ कि 96 मुकदमों का आरोपी अचानक बंदूक छोड़कर पुलिस कैंप पहुंच गया? इसके पीछे की सबसे बड़ी वजह संगठन के भीतर पनप रही अंदरूनी कलह, शोषण और जवानों की आक्रामक घेराबंदी है। अब वह दौर नहीं रहा जब नक्सली जंगलों में बेखौफ घूमते थे। सुरक्षा बलों ने नक्सलियों के कोर इलाकों में नए फॉरवर्ड ऑपरेटिंग बेस यानी पुलिस कैंप स्थापित कर दिए हैं। इन कैंपों के बनने से नक्सलियों का न केवल रसद यानी राशन-पानी का नेटवर्क ठप हो गया, बल्कि एक इलाके से दूसरे इलाके में भागने के तमाम सुरक्षित रास्ते भी बंद हो चुके हैं। जंगल में रसद खत्म हो रही थी, बाहर पुलिस का शिकंजा कस रहा था और भीतर शीर्ष नेताओं की प्रताड़ना बढ़ रही थी। ऐसे में सरेंडर के अलावा कोई रास्ता शेष नहीं बचा था।

तीन दशकों का खूनी दौर और पुलिस की ‘मुस्कान नीति’

कोल्हान का यह इलाका करीब 30 सालों से नक्सली हिंसा का दंश झेलता रहा है। इन जंगलों की दुर्गम भौगोलिक बनावट का फायदा उठाकर लाल लड़ाके ग्रामीणों को ढाल बनाते थे। विकास की सड़कें रोक दी जाती थीं, स्कूल उड़ा दिए जाते थे और ग्रामीणों को मुखबिरी के नाम पर मौत के घाट उतार दिया जाता था। इस लड़ाई में दर्जनों बेगुनाह ग्रामीणों और सुरक्षा बलों के वीर जवानों ने अपनी शहादत दी है।

लेकिन बीते चार वर्षों में पुलिस की रणनीति में बहुत बड़ा बदलाव आया है। अब जंगलों में सिर्फ बंदूक की भाषा नहीं बोली जा रही, बल्कि ‘दिल जीतने की नीति’ पर काम हो रहा है। खुफिया तंत्र को नए सिरे से पुनर्गठित किया गया और ग्रामीणों के साथ सीधे संवाद की कड़ियां जोड़ी गईं। चक्रधरपुर के एसडीपीओ डॉ. सैयद मुस्तफा हाशमी जैसी पहल ने जमीनी हकीकत बदल दी। दूर-दराज के नक्सल प्रभावित गांवों में मुफ्त मेडिकल कैंप लगाए गए, दवाइयां बांटी गईं और ग्रामीणों को यह एहसास कराया गया कि पुलिस उनकी दुश्मन नहीं, बल्कि रक्षक है। नतीजतन, ग्रामीणों का भरोसा जब पुलिस पर बढ़ा तो नक्सलियों के लिए जनसमर्थन और पनाहगाह दोनों हमेशा के लिए खत्म हो गए। पिछले चार साल में केवल इसी इलाके से 75 नक्सली हथियार डाल चुके हैं, जो संगठन के घटते जनाधार की सबसे ठोस मिसाल है।

डीआईजी का दो टूक संदेश : असीम मंडल का दस्ता भी अब मुख्यधारा में आए

आत्मसमर्पण के इस भव्य कार्यक्रम में कोल्हान रेंज के डीआईजी अनुरंजन किस्टोपा, चाईबासा एसपी अमित रेणु, सरायकेला एसपी मनोज स्वर्गियारी और सीआरपीएफ के कई वरिष्ठ अधिकारी मौजूद थे। डीआईजी ने इसे राज्य की कानून व्यवस्था की एक बड़ी जीत करार देते हुए शहीद जवानों को नमन किया।

उन्होंने स्पष्ट शब्दों में संदेश दिया कि अब माओवादी विचारधारा पूरी तरह अप्रासंगिक हो चुकी है। जंगलों में जो थोड़े-बहुत नक्सली बचे हैं, उनके पास केवल दो ही रास्ते हैं… या तो वे सरकार की पुनर्वास नीति का लाभ उठाकर समाज की मुख्यधारा में लौट आएं या फिर सुरक्षा बलों की गोलियों का सामना करने के लिए तैयार रहें। उन्होंने खासतौर पर इस इलाके में सक्रिय बचे असीम मंडल के दस्ते का जिक्र करते हुए उनके सदस्यों से भी अविलंब हथियार डालने की अपील की।

इसे भी पढ़ें : झारखंड विस में छात्र आंदोलन पर संग्राम , विधायक वेल में आमने-सामने; कार्यवाही स्थगित

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