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Patna : जब आंगन में कमर तक पानी हिलोरे मारने लगे, छप्पर का कोना डूबने की कगार पर हो और चूल्हा पानी में तैर रहा हो, तो पेट की भूख और भविष्य की चिंता इंसान को बेबस कर देती है। इस वक्त बिहार के 11 जिलों में गंगा, कोसी और गंडक का मिजाज कुछ ऐसा ही डराने वाला है। लेकिन इस अथाह जलप्रलय के बीच एक उम्मीद भी तैर रही है। जिन घरों में पिछले दो दिनों से आग नहीं सुलगी थी, वहां अब सरकारी सामुदायिक रसोइयों से गर्म भात और दाल की खुशबू पहुंच रही है। आपदा प्रबंधन विभाग के आंकड़ों की मानें तो अब तक 1.21 लाख से अधिक बाढ़ पीड़ितों को गर्म भोजन कराया जा चुका है, जो इस आपदा के बीच जिंदगी को थामे रखने की सबसे बड़ी कड़ी बना हुआ है।
पानी से घिरी 10 लाख की आबादी और 38 रसोइयों का पहरा
पटना के दियारा इलाके से लेकर भागलपुर और कटिहार के निचले गांवों तक, नजारा सिर्फ पानी और पानी का ही नजर आता है। 11 जिलों के 50 प्रखंडों की करीब 201 पंचायतें इस वक्त सैलाब की चपेट में हैं। लगभग 10.26 लाख लोग अपने ही घरों में बंधक बनकर रह गए हैं या फिर ऊंचे बांधों पर तिरपाल तानकर गुजारा कर रहे हैं। ऐसे माहौल में खाली पेट रात न काटनी पड़े, इसके लिए अलग-अलग जिलों में 38 सामुदायिक रसोइयां दिन-रात काम कर रही हैं। सुबह का नाश्ता हो या शाम का खाना, बड़े-बड़े देगचों में पकता खाना उन लोगों तक पहुंच रहा है जिनके राशन का डिब्बा पानी में बह चुका है। वैशाली जिले में बने एक राहत शिविर में 326 लोग शरण लिए हुए हैं, जहां सोने से लेकर दवा और भोजन का पूरा जिम्मा प्रशासन संभाल रहा है। इसके साथ ही खुले आसमान के नीचे रात बिता रहे परिवारों के बीच 12 हजार से ज्यादा पॉलीथिन शीट और 2300 सूखे राशन के पैकेट बांटे गए हैं ताकि वे अपने सिर को छुपा सकें।
जब नाव बनी जिंदगी की डोर और बोट पर दौड़ी एंबुलेंस
गांवों की पगडंडियां और सड़कें अब कई फीट पानी में गुम हो चुकी हैं। ऐसे में 858 नावें इन दिनों इन इलाकों की लाइफलाइन बन गई हैं। किसी को सुरक्षित किनारे पहुंचाना हो, बीमार बुजुर्ग को अस्पताल ले जाना हो या गर्भवती महिला को वक्त पर मदद देनी हो, नाविकों के हाथ तेजी से पतवार चला रहे हैं।
नदी के बीच फंसे लोगों की सेहत की निगरानी के लिए 19 बोट एंबुलेंस दिन-रात चक्कर काट रही हैं और 50 मेडिकल कैंपों में डॉक्टरों की टीम तैनात है ताकि गंदे पानी से फैलने वाली बीमारियों को समय रहते रोका जा सके। इंसान तो अपनी तकलीफ कह लेते हैं, लेकिन बाढ़ में सबसे ज्यादा बेबसी उन मवेशियों की आंखों में दिखती है जो खूंटे से बंधे रह गए या किसी ऊंचे टीले पर भूखे-प्यासे खड़े हैं। इन बेजुबानों की देखरेख के लिए 36 पशु चिकित्सा शिविर काम कर रहे हैं, जहां उनके चारे और इलाज की व्यवस्था की जा रही है।
टूटे तटबंध से जूझते जवान और पटना को डूबने से बचाने की जंग
खतरे की घंटी सिर्फ गांवों में ही नहीं, बल्कि शहरों के मुहाने पर भी बज रही है। सारण के त्रिलोकचक में जब माही नदी का बांध 20 मीटर तक कटा, तो अफरा-तफरी मच गई। हालात को काबू में करने के लिए आनन-फानन में एसडीआरएफ की टीम मौके पर उतारी गई। पूरे राज्य में इस समय एनडीआरएफ की 7 और एसडीआरएफ की 27 टीमें जान जोखिम में डालकर लोगों को सुरक्षित निकालने में पसीना बहा रही हैं।
राजधानी पटना के गांधीघाट, बंका घाट और पंडारक में गंगा अपने रिकॉर्ड जलस्तर को पार कर चुकी है। उधर वाल्मीकिनगर से गंडक, बीरपुर से कोसी और इंद्रपुरी से सोन नदी का लाखों क्यूसेक पानी लगातार आगे बढ़ रहा है। मौसम विभाग ने अगले दो दिनों में और तेज बारिश की चेतावनी दी है, जिसके चलते पटना को डूबने से बचाने के लिए 56 ड्रेनेज पंपिंग स्टेशन और नगर निगम के 94 भारी पंप दिन-रात पानी उलीच रहे हैं। गंगा का पानी शहर में उल्टे रास्ते न घुसे, इसलिए 13 बड़े नालों के लोहे के फाटक बंद कर दिए गए हैं।
इस मुश्किल घड़ी में किसी भी आपात स्थिति से निपटने के लिए आपदा प्रबंधन विभाग ने कंट्रोल रूम का नंबर 1070 लगातार चालू रखा है, जहां से हर पल बदलते हालात पर नजर रखी जा रही है। संकट बड़ा है, लेकिन जब तक राहत की थाली और बचाने वाली नाव हर दरवाजे तक पहुंच रही है, तब तक उम्मीद का दीया भी पानी के बीच जल रहा है।
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