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Ranchi : अक्सर यह माना जाता है कि अदालतें, वकील और कानून की धाराएं सिर्फ शहर के बड़े कमरों और फाइलों तक ही सीमित रहती हैं। किसी दूर-दराज के गांव में बैठा मजदूर या खेत में पसीना बहाता किसान कचहरी के नाम से ही घबरा जाता है। लेकिन रांची के महुआजारी पंचायत और बांसजाड़ी गांव की गलियों में नजारा कुछ अलग था। यहां कानून की पोथियां लेकर लोग कचहरी नहीं बुला रहे थे, बल्कि कानून खुद चलकर ग्रामीणों के मिट्टी के आंगनों और चौखटों तक पहुंचा था।
झारखंड हाई कोर्ट के जस्टिस सुजीत नारायण प्रसाद के निर्देश और झालसा की सदस्य सचिव कुमारी रंजना अस्थाना तथा रांची के न्यायायुक्त अनिल कुमार मिश्रा के मार्गदर्शन में 60 दिनों का यह विशेष अभियान चलाया जा रहा है। डालसा की इस टीम का मकसद सिर्फ भाषण देना नहीं था, बल्कि समाज के उस अंतिम व्यक्ति से आंख मिलाकर बात करना था, जिसे यह भी नहीं पता कि उसके बुनियादी हक क्या हैं।

चौपाल पर खुली कानून की किताब, पेसा से समझी अपनी ताकत
बांसजाड़ी की एक चौपाल में सहायक एलएडीसी सौरभ पांडे जब ग्रामीणों के बीच बैठे, तो उन्होंने किताबी भाषा छोड़कर ठेठ बोलचाल में बात शुरू की। उन्होंने ग्रामीणों को पेसा कानून का असली मतलब समझाया। उन्होंने बताया कि इस इलाके के जल, जंगल और जमीन पर सबसे पहला अधिकार यहां की ग्राम सभा का है। यह कानून सिर्फ कागज का पन्ना नहीं, बल्कि ग्रामीणों की ढाल है।
उन्होंने लोगों के मन से कानूनी पचड़ों का डर निकालते हुए एक आसान रास्ता बताया कि अगर कभी भी कोई कानूनी अड़चन आए, तो घबराने के बजाय नालसा के टोल फ्री नंबर 15100 पर सीधे फोन मिलाएं। वहां मुफ्त कानूनी सलाह और मदद देने के लिए लोग हमेशा तैयार बैठे हैं।
पगडंडियों से दहलीज तक, मौके पर ही भरे गए योजनाओं के फॉर्म
इस पूरे अभियान का सबसे जीवंत पहलू रहा घर-घर जाकर सीधा संवाद करना। टीम के सदस्य सिर्फ पंचायत भवन में बैठकर कागजी खानापूर्ति नहीं कर रहे थे। वे एक-एक घर के दरवाजे पर गए, बुजुर्गों से उनकी तबीयत पूछी, महिलाओं से चूल्हे-चौके और बच्चों की पढ़ाई की बात की।
इसी बातचीत के बीच जब पता चला कि कई बुजुर्गों की पेंशन रुकी है, किसी के पास पक्का घर नहीं है, तो किसी को राशन कार्ड या खेत के लिए सिंचाई मशीन की दरकार है, तो मौके पर ही उनके आवेदन भरवाए गए। प्रधानमंत्री आवास, पीएम किसान सम्मान निधि, पशुपालन शेड और लेबर कार्ड के ढेरों फॉर्म ग्रामीणों के हाथों से लेकर जमा किए गए। करीब 1100 ग्रामीणों को पहली बार यह अहसास हुआ कि सरकारी योजनाएं और कानून उनके हक की चीज हैं, कोई खैरात नहीं।

लोक अदालत की चौखट और कुप्रथाओं पर सीधा वार
बातचीत का दायरा सिर्फ सरकारी योजनाओं तक सीमित नहीं रहा। डालसा के पीएलवी भुप्रताप महतो ने रोजमर्रा के आपसी झगड़ों पर बात की। उन्होंने ग्रामीणों को समझाया कि कोर्ट-कचहरी में सालों साल पैसे और समय बर्बाद करने से अच्छा है कि आपस में बैठकर सुलह कर ली जाए। उन्होंने आने वाली 12 सितंबर को लगने वाली राष्ट्रीय लोक अदालत का जिक्र करते हुए कहा कि वहां बिना एक रुपया खर्च किए पुराने मामले हमेशा के लिए खत्म किए जा सकते हैं।
इसके साथ ही गांव की जड़ों में बैठी कुप्रथाओं पर भी खुलकर बात हुई। बाल विवाह के नुकसान, बाल मजदूरी का दर्द, दहेज की मांग और सबसे बढ़कर झारखंड के ग्रामीण इलाकों में नासूर बनी डायन-बिसाही जैसी कुप्रथा पर चोट की गई। टीम ने साफ कहा कि किसी लाचार महिला पर अंधविश्वास का ठप्पा लगाना न सिर्फ जुर्म है बल्कि इंसानियत के खिलाफ है। बच्चों के भविष्य को संवारने के लिए सरकार की स्पॉन्सरशिप योजना के बारे में भी बताया गया ताकि गरीबी की वजह से किसी बच्चे की पढ़ाई न छूटे।
धूप ढलने तक चली इस जमीनी मुहिम में सहायक एलएडीसी सौरभ पांडे के साथ पीएलवी कालिन्दर गोप, संजीत उरांव, सुनीता देवी, भुप्रताप महतो, अमित बड़ाईक, बंधु उरांव, सुमति कुमारी, मंगल तिर्की, रेनू देवी, संगीता सिंह, सोनू सिंह, नीलश्याम कुमार कश्यप और चालक राजा वर्मा ग्रामीणों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर जुटे रहे। बांसजाड़ी के लोगों के चेहरों पर दिख रही राहत इस बात का सबूत थी कि जब व्यवस्था खुद चलकर जनता की चौखट तक आती है, तो भरोसे की नई शुरुआत होती है।
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