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Home » लकड़मंदा नरसंहार के बाद उग्रवाद की दुनिया में खूंखार नाम बना था ब्रजेश, 10 लड़ाकों को मार कायम किया था दबदबा
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लकड़मंदा नरसंहार के बाद उग्रवाद की दुनिया में खूंखार नाम बना था ब्रजेश, 10 लड़ाकों को मार कायम किया था दबदबा

September 20, 2026No Comments4 Mins Read
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Pawan Thakur, Ranchi

चतरा जिले के लावालौंग स्थित लकड़मंदा जंगल में हुए खूनी नरसंहार ने बृजेश गंझू को उग्रवाद की दुनिया में एक ऐसा नाम बना दिया, जिससे पूरा इलाका कांप उठता था। मार्च 2013 में हुए इस खूनी संघर्ष से पहले बृजेश को केवल एक सामान्य बगावती कमांडर माना जाता था। उस दिन बृजेश के दस्ते ने भाकपा माओवादी के बड़े लड़ाकों को चारों तरफ से घेरकर मौत के घाट उतार दिया था। इस एक ही मुठभेड़ में 10 बड़े माओवादी मारे गए थे। इसी नरसंहार के बाद झारखंड और बिहार के जंगलों में बृजेश गंझू का सिक्का चलने लगा और उसने लाल गलियारे के समानांतर अपनी अलग हुकूमत खड़ी कर दी। इस खूनी वारदात ने उसे सुरक्षा एजेंसियों की टॉप हिटलिस्ट में ला खड़ा किया था।

जंगल में बगावत और लाल आतंक के खिलाफ जंग

मूल रूप से लावालौंग के लुटू सोहावन गांव निवासी स्वर्गीय पच्चु गंझू का बेटा बृजेश शुरुआत में भाकपा माओवादी का ही कैडर था। संगठन के भीतर वर्चस्व और आंतरिक मतभेदों के चलते उसने साल 2004 में बगावत का बिगुल फूंक दिया। उसने अपने साथियों को एकजुट करके तृतीय सम्मेलन प्रस्तुति कमेटी यानी टीएसपीसी की नींव रखी। संगठन बनाते ही बृजेश का सीधा टकराव अपने पुराने साथियों से शुरू हो गया। देखते ही देखते चतरा, लातेहार, पलामू, हजारीबाग, रांची, रामगढ़ और बिहार के सीमावर्ती इलाकों में वर्चस्व की जंग छिड़ गई। लकड़मंदा का नरसंहार इसी खूनी संघर्ष का सबसे भयावह मोड़ साबित हुआ। इस वारदात के बाद माओवादी बैकफुट पर आ गए और इलाके में टीएसपीसी का दबदबा बढ़ता चला गया।

10 माओवादियों को मारकर खौफ का दूसरा नाम बना TSPC सुप्रीमो बृजेश गंझू वाराणसी में UP ATS मुठभेड़ में ढेर। 30 लाख का था इनामी।#VaranasiEncounter #UPATS #BrijeshGanjhu #TSPC #TodayNews #LatestNews #NewsSamvad #TrendingNews #JharkhandNews #BreakingNews pic.twitter.com/1B5VWOqxG9

— News Samvad (@newssamvaad) September 20, 2026

मुखिया की कुर्सी और कोल बेल्ट में लेवी का साम्राज्य

लकड़मंदा की वारदात से उपजे खौफ का फायदा बृजेश ने अपने प्रभाव और आर्थिक नेटवर्क को मजबूत करने में उठाया। साल 2010 में वह लावालौंग पंचायत से निर्विरोध मुखिया चुना गया, क्योंकि उसके डर से किसी ने नामांकन तक दाखिल नहीं किया। एक तरफ वह पंचायत का प्रतिनिधि बना रहा और दूसरी तरफ भूमिगत रहकर समानांतर व्यवस्था चलाता रहा। बृजेश के नेतृत्व में संगठन ने टंडवा और पिपरवार के कोयला खनन क्षेत्रों से लेकर सड़क, पुल और रेल लाइन निर्माण में लगे ठेकेदारों से भारी लेवी वसूलना शुरू कर दिया। जो कोई भी लेवी देने से मना करता, उसके वाहनों को आग के हवाले कर दिया जाता और कर्मियों को निशाना बनाया जाता था। इसी उगाही के दम पर संगठन ने आधुनिक हथियारों का बड़ा जखीरा जमा कर लिया था।

एनआईए और पुलिस का 30 लाख का इनाम, 100 से अधिक केस

लगातार बढ़ती हिंसक गतिविधियों और टेरर फंडिंग के कारण बृजेश गंझू सुरक्षा एजेंसियों के निशाने पर आ गया। उसके खिलाफ चतरा, लातेहार, रांची और हजारीबाग समेत कई जिलों में हत्या, रंगदारी, आगजनी और यूएपीए के 100 से अधिक मामले दर्ज थे। केंद्रीय जांच एजेंसी एनआईए ने टंडवा कोल लेवी और टेरर फंडिंग केस में उसे मुख्य आरोपी बनाते हुए 5 लाख रुपये का इनाम घोषित किया था। वहीं झारखंड सरकार ने उसकी गिरफ्तारी पर 25 लाख रुपये का इनाम रखा था। कुल 30 लाख रुपये का इनामी यह उग्रवादी गोपाल सिंह भोक्ता, सरदार, रंजन, दुलारचंद और फुलचंद जैसे कई फर्जी नामों से पुलिस को चकमा देकर छिपता फिर रहा था।

वाराणसी में भोरे-भोर घेराबंदी और एनकाउंटर में खात्मा

झारखंड में शिकंजा कसने के बाद वह उत्तर प्रदेश में अपनी सुरक्षित पनाहगाह तलाश रहा था। यूपी एटीएस के डिप्टी एसपी विपिन राय को सूचना मिली कि बृजेश वाराणसी के रामनगर थाना क्षेत्र में लंका मैदान के पास टेंगरा मोड़ से होकर मुगलसराय की ओर जाने वाला है। रविवार तड़के करीब पांच बजे एटीएस ने इलाके की घेराबंदी की। जब मोटरसाइकिल से आ रहे बृजेश को रुकने का इशारा किया गया, तो उसने पुलिस टीम पर स्वचालित हथियार से गोलियां बरसानी शुरू कर दीं। बुलेटप्रूफ जैकेट की वजह से डिप्टी एसपी विपिन राय और हेड कांस्टेबल नितेंद्र कृष्ण बाल-बाल बच गए। पुलिस की जवाबी कार्रवाई में बृजेश को गोलियां लगीं और अस्पताल में डॉक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया। इसके साथ ही करीब दो दशक से चल रहे आतंक के एक बड़े अध्याय का अंत हो गया।

इसे भी पढ़ें : TSPC के ‘सरदार’ का चैप्टर क्लोज, यूपी ATS ने भोरे-भोर किया एनकाउंटर

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