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Patna : शादी-ब्याह की सजावट हो या इलेक्ट्रॉनिक सामान की पैकिंग, काम खत्म होते ही जिस थर्मोकोल को लोग बेकार समझकर गलियों और नालों में फेंक देते हैं, उसी कचरे ने पटना के एक छोटे से गांव की किस्मत बदल दी है। खुशरूपुर प्रखंड की अलावलपुर पंचायत में लोहिया स्वच्छ बिहार अभियान और स्वच्छ भारत मिशन की मदद से थर्मोकोल के ढेर को न सिर्फ कायदे से ठिकाने लगाया जा रहा है, बल्कि मशीनों से इसे प्लास्टिक दानों में बदलकर हर महीने लाखों रुपये कमाए जा रहे हैं। एक छोटी सी पहल ने आज ऐसा रूप ले लिया है कि इसका कारोबार बिहार की सीमाओं को लांघकर उत्तर प्रदेश के बनारस और झारखंड के रांची तक पहुंच चुका है।
जब कबाड़ियों का सिरदर्द बना दीपक का नया जरिया
कुछ साल पहले तक गांवों के कचरा छंटाई केंद्रों पर तैनात कर्मचारियों के लिए थर्मोकोल सबसे बड़ी आफत हुआ करता था। वजन में हल्का होने के कारण हवा में उड़ता था, जगह इतनी घेरता था कि गोदाम भर जाते थे और कोई भी कबाड़ी इसे एक पैसे में खरीदने को राजी नहीं होता था। इस परेशानी का हल तलाशते हुए स्थानीय अफसरों ने गांव के ही एक कबाड़ कारोबारी दीपक कुमार से बात की और उन्हें इसका समाधान निकालने को कहा। दीपक ने 2017 में कचरा केंद्रों से बेकार थर्मोकोल उठाकर उसे भट्टी में गलाकर ठोस ढेले बनाना शुरू किया। शुरुआत धीमी रही, लेकिन दीपक रुके नहीं। साल 2023 में उन्होंने आधुनिक मशीनें लगाईं और ढेलों की जगह सीधे फैक्ट्रियों में बिकने वाला दाना तैयार करने की तकनीक सीख ली। आज आलम यह है कि पटना के 8 कबाड़ियों के अलावा बनारस और रांची से भी गाड़ियां भरकर थर्मोकोल दीपक के कारखाने में पहुंच रहा है।
कचरे को संपदा में बदलने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है बिहार : मंत्री श्रवण कुमार
ग्रामीण विकास विभाग और सूचना एवं जन सम्पर्क विभाग के मंत्री श्रवण कुमार ने कहा कि लोहिया स्वच्छ बिहार अभियान के तहत प्लास्टिक कचरा प्रबंधन में कई बड़े काम हो रहे हैं। हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सीतामढ़ी में सिंगल यूज़ प्लास्टिक से बनी बेंच की तारीफ की थी। राज्य में प्लास्टिक कचरे से पेवर ब्लॉक, गमले, खिलौने और सड़कें बनाने के साथ ही अब थर्मोकोल से दाना बनाकर रीसाइक्लिंग को बढ़ावा दिया जा रहा है। सरकार और स्थानीय उद्यमियों के मिले-जुले प्रयासों से बिहार अब कचरे को कमाई और उपयोगी संसाधन में बदलने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है।
कबाड़ से दाना बनने तक का सफर और गांव के 12 युवाओं को मिला काम
कारखाने के अंदर कदम रखते ही मशीनों की गड़गड़ाहट और काम में जुटे ग्रामीण युवाओं की व्यस्तता दिखती है। कचरे से दाना बनाने का तरीका भी बड़ा दिलचस्प है। सबसे पहले कबाड़ से आए थर्मोकोल को छांटकर छोटे टुकड़ों में तोड़ा जाता है। फिर इसे खास तापमान पर पिघलाकर सख्त गांठों में ढाला जाता है। इसके बाद ग्राइंडिंग मशीन इन गांठों को पीसकर बारीक पाउडर बना देती है।
पाउडर में तय मात्रा में केमिकल मिलाकर एक्सट्रूडर मशीन में डाला जाता है, जहां से प्लास्टिक की लंबी रस्सियां बाहर निकलती हैं। कटर मशीन इन रस्सियों को सेकंडों में छोटे-छोटे बराबर दानों में काट देती है। इन तैयार दानों को बोरियों में भरकर उन फैक्ट्रियों को भेजा जाता है, जो दोबारा नई थर्मोकोल शीट बनाती हैं। इस पूरे काम में गांव के 12 स्थानीय लड़कों को पक्का रोजगार मिला हुआ है, जो कभी काम की तलाश में परदेस जाने की सोचते थे।
18 लाख का मासिक टर्नओवर और सरकारी कोशिशों का बड़ा असर
अलावलपुर की इस छोटी सी यूनिट में हर महीने करीब 40 से 50 टन दाने का उत्पादन हो रहा है। बाजार में यह दाना औसतन 35 हजार रुपये प्रति टन के भाव से हाथों-हाथ बिक जाता है। इस हिसाब से देखें तो एक छोटे से गांव में हर महीने 17 से 18 लाख रुपये का कारोबार केवल उस कचरे से हो रहा है जिसे लोग पैरों से ठोकर मार देते थे। अलावलपुर का यह सफल प्रयोग साबित करता है कि अगर काम करने की नीयत, सरकारी प्रोत्साहन और सही बाजार का साथ मिले, तो गांव की माटी पर भी बेकार कबाड़ से मजबूत आजीविका खड़ी की जा सकती है।


