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Lucknow (Pawan Kumar) : गांव की मिट्टी में सिर्फ पसीना नहीं मिलता, पीढ़ियों की यादें और जीने का सहारा भी जुड़ा होता है। जब वही सहारा कोई रसूख और जालसाजी के दम पर छीन ले, तो एक गरीब परिवार की जिंदगी कचहरी के चक्कर काटते-काटते कट जाती है। लखनऊ के सैरपुर इलाके के भौरमऊ गांव से आई यह कहानी सिर्फ जमीन के एक टुकड़े का विवाद नहीं है, बल्कि एक कमजोर दलित परिवार के उस दर्द और संघर्ष की दास्तान है, जिसने अपने नाना की जमीन बचाने के लिए आधी सदी तक लड़ाई लड़ी। आज जब चकबंदी अदालत ने उनके हक पर मुहर लगा दी है, तब भी उनके घर में सुकून नहीं, बल्कि जान जाने का खौफ पसरा हुआ है।
एक छोटी सी चूक और 45 साल का दर्द
इस कहानी की शुरुआत करीब 49 साल पहले, 1977 में हुई थी। भौरमऊ के रहने वाले बुजुर्ग साधू की जब मौत हुई, तो परिवार पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा। साधू की दो बेटियां थीं, चंद्रावती और रूपाना। दोनों बेटियों के नाम वरासत में पिता की एक जमीन तो दर्ज हो गई, लेकिन अधिकारियों की एक छोटी सी चूक से दूसरा खाता (संख्या 335) छूट गया। यह जमीन साढ़े तीन बीघे से भी ज्यादा थी।
परिवार अपनी सादगी और गरीबी में जीता रहा और उन्हें भनक भी नहीं लगी कि छूटे हुए उस कागज पर गांव के रसूखदारों की नजर पड़ चुकी थी। 1981 में गांव की एक रसूखदार महिला पुष्पा देवी और उनके परिवार ने इस बेबसी का फायदा उठाया। तब उनके घर में प्रधानी थी और गांव में दबदबा भी। एक सादे कागज पर साधू के नाम की जाली वसीयत गढ़ी गई और महिला खुद को साधू की फर्जी भांजी बताकर चकबंदी दफ्तर जा पहुंची। कागज का खेल ऐसा चला कि असली वारिस अपनी ही जमीन से बेदखल हो गए।
जूते घिस गए, पाई-पाई जोड़ी और अदालत में लड़ी हक की जंग
सालों बाद जब साधू के नाती पुत्ती लाल और उनके साथी सतीश को इस बात का पता चला, तो उनके पैरों तले जमीन खिसक गई। एक तरफ गांव का मजबूत परिवार था, दूसरी तरफ मजदूरी और तंगहाली से जूझता यह दलित कुनबा। लेकिन पुत्ती लाल ने अपने बुजुर्गों की निशानी को ऐसे ही लुटने नहीं दिया। घर के खर्च काटकर, एक-एक रुपया जोड़कर उन्होंने लखनऊ की चकबंदी अदालतों के दरवाजे खटखटाए।
तारीखों पर तारीखें पड़ीं, वकील बदले, कचहरी की सीढ़ियां नापते-नापते चप्पलें घिस गईं। आखिरकार दिसंबर 2024 में बंदोबस्त अधिकारी चकबंदी ने माना कि सामान्य वर्ग की महिला ने दलित परिवार की जमीन हड़पने के लिए जाली वसीयत बनाई थी। कोर्ट ने पुष्पा देवी का नाम काटकर पुत्ती लाल और उनके साथियों का नाम दर्ज करने का आदेश दिया। इसके बाद फरवरी 2026 में उप संचालक चकबंदी ने भी साफ शब्दों में लिखा कि जमीन पर कब्जे के लिए सुनियोजित फ्रॉड किया गया था।
जीत के बाद भी घर में अंधेरा, अब जान बचाने की गुहार
कागजों में तो पुत्ती लाल जीत गए, लेकिन जमीन की असली हकीकत आज भी डरावनी है। अदालत से मुकदमा हारने के बाद रसूखदार पक्ष समझौते के मूड में नहीं, बल्कि बदले की आग में है। पुत्ती लाल का भरा हुआ गला इस बात की गवाही देता है कि वह आज भी किस दहशत में जी रहे हैं। उनका कहना है कि विरोधी पक्ष अब अपनी दबंगई के बल पर उन्हें रास्ते में रोककर गालियां देता है, फर्जी मुकदमों में जेल भिजवाने की धमकी देता है और कहता है कि जमीन पर कदम रखा तो जान से हाथ धोना पड़ेगा।
थाने के कई चक्कर काटने और पुलिस कमिश्नर दफ्तर में गुहार लगाने के बाद अब जाकर सैरपुर थाने में पुष्पा देवी, उनके पति किशोरी लाल, बेटे अनूप और दो गवाहों पर जालसाजी व जान से मारने की धमकी की धाराओं में मुकदमा दर्ज हुआ है। पुलिस जांच कर रही है, लेकिन पुत्ती लाल के मन में एक ही सवाल कौंध रहा है कि क्या इस मुल्क में एक गरीब और कमजोर इंसान को सिर्फ इंसाफ के कागजात मिलेंगे या अपनी ही जमीन पर बेखौफ खड़े होने की आजादी भी मिलेगी।
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