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Ranchi (Sunil Poddar) : रांची के हरमू की वह दोपहर आम दिनों से जुदा थी। सभागार में महर्षि वाल्मीकि की सौम्य तस्वीर रखी थी और चारों ओर गूंज रही थी उनके विचारों की चर्चा। अखिल भारतीय वाल्मीकि महासभा झारखंड प्रदेश की ओर से आयोजित जयंती समारोह महज औपचारिकता निभाने का मौका नहीं था, बल्कि यह एक ऐसा जमघट बना जहां राजनीति, समाज और आम जिंदगी के लोग सारे फासले भुलाकर साथ बैठे थे। गर्मजोशी ऐसी थी कि मंच पर आने वाले हर मेहमान को जब शॉल ओढ़ाई गई और महर्षि की तस्वीर सौंपी गई, तो तालियों की गूंज ने पूरे माहौल को आत्मीय बना दिया।
एक ही छत के नीचे शहर के कई जाने-पहचाने चेहरे
कार्यक्रम का रंग उस वक्त और गहरा गया जब अलग-अलग क्षेत्रों से जुड़ी हस्तियां एक-एक कर जुटने लगीं। रांची के डिप्टी मेयर नीरज कुमार पहुंचे तो वहीं भाजपा नेता दीपक प्रकाश और प्रदेश महामंत्री अमर कुमार बावरी ने भी अपनी मौजूदगी दर्ज कराई। इंद्रजीत यादव, आशुतोष द्विवेदी, राजकुमार पोद्दार, राजू साहू और पूर्व पार्षद अरुण झा के साथ मिस फेमिना प्रियांशु चौधरी की उपस्थिति ने आयोजन को खास बनाया। महासभा के प्रदेश अध्यक्ष भरत वाल्मीकि और मीडिया प्रभारी गोविंदा वाल्मीकि पूरी तन्मयता से हर किसी की आगवानी में लगे रहे। राजनीतिक दलों की लकीरों से परे हटकर सबका इस तरह जुटना यह बता रहा था कि महापुरुषों के विचार पूरे समाज की साझा धरोहर होते हैं।
पन्नों से निकलकर आज के जीवन में उतरती रामायण
मंच से जब बातें शुरू हुईं, तो केंद्र में आदिकवि महर्षि वाल्मीकि का जीवन और उनकी कलम थी। वक्ताओं ने याद दिलाया कि वाल्मीकि ने रामायण लिखकर सिर्फ एक महाकाव्य नहीं रचा, बल्कि जीने का सलीका सिखाया। उन्होंने बताया कि धर्म, कर्तव्य, करुणा और न्याय की बात उस दौर में जितनी प्रासंगिक थी, आज की आपाधापी में उसकी जरूरत और बढ़ गई है। चर्चा इस बात पर भी हुई कि कैसे एक व्यक्ति अपने भीतर के अंधकार को मिटाकर ज्ञान का ऐसा दीप जला सकता है, जो सदियों तक रोशनी देता रहे।
भाषणों से आगे बढ़कर शिक्षा और बराबरी का संकल्प
समारोह जैसे-जैसे आगे बढ़ा, बात सिर्फ अतीत के गौरव तक सीमित नहीं रही, बल्कि आज की हकीकत और कल की उम्मीदों पर भी खुली चर्चा हुई। वहां मौजूद लोगों ने एक सुर में माना कि समाज को आगे ले जाना है तो बच्चों के हाथों में किताबें थमानी होंगी और आपस के हर किस्म के भेदभाव को खत्म करना होगा। महासभा के सदस्यों का कहना था कि महापुरुषों की जयंती तभी सार्थक होती है जब उनके दिखाए समानता और भाईचारे के रास्ते पर जमीन पर काम किया जाए। हरमू में बीती यह दोपहर केवल एक आयोजन भर नहीं थी, बल्कि अपने भीतर झांकने और साथ मिलकर एक बेहतर कल गढ़ने का साझा वादा बनकर उभरी।
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