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Patna : बिहार के संस्कृत विद्यालयों से मध्यमा यानी दसवीं की पढ़ाई पूरी करने के बाद हर साल हजारों छात्रों के मन में एक ही सवाल कौंधता था कि अब आगे क्या? पारंपरिक व्यवस्था में मैट्रिक के बराबर डिग्री तो मिल जाती थी, लेकिन आगे की राह इतनी आसान नहीं होती थी। कई छात्रों की पढ़ाई बीच में ही छूट जाती थी तो कइयों को दूसरे बोर्ड में दाखिले के लिए लंबी जद्दोजहद करनी पड़ती थी। अब इन छात्रों की इस पुरानी मुश्किल का पक्का समाधान निकलने जा रहा है। राज्य सरकार ने संस्कृत शिक्षा बोर्ड के जरिए ही प्लस टू स्तर की पढ़ाई कराने की दिशा में कदम बढ़ा दिए हैं। इसके लिए नियम और कानूनों में बदलाव की तैयारी पूरी तेजी से चल रही है।
जब अपने ही बोर्ड में मिलेगा 12वीं का मंच
शिक्षा विभाग की हालिया समीक्षा बैठक में इस पूरे मसले को लेकर एक अहम प्रस्ताव पर चर्चा हुई। पिछले साल के आंकड़े बताते हैं कि राज्य में करीब 24 हजार छात्र-छात्राओं ने मध्यमा की परीक्षा पास की थी। यह कोई छोटी संख्या नहीं है। इतने बड़े छात्र वर्ग को अगर आगे की पढ़ाई का सहज विकल्प न मिले तो उनकी प्रतिभा गांव और कस्बों में ही सिमट कर रह जाती है। इसी जमीनी हकीकत को समझते हुए शिक्षा मंत्री की मौजूदगी में यह तय किया गया कि संबंधित एक्ट में जरूरी कानूनी संशोधन किए जाएं। इस बदलाव का सीधा फायदा यह होगा कि छात्रों को अपनी पसंदीदा विधा में ही इंटरमीडिएट की डिग्री हासिल करने का कानूनी और मान्यता प्राप्त रास्ता मिल जाएगा।
कागजों पर चल रहे संस्थानों पर नकेल कसने की तैयारी
सिर्फ नई कक्षाएं शुरू करना ही सरकार का मकसद नहीं है, बल्कि उस पूरी व्यवस्था को दुरुस्त करना भी है जहां ये बच्चे पढ़ते हैं। इसी रणनीति के तहत शिक्षा विभाग ने राज्यभर के संस्कृत विद्यालयों और मदरसों की पड़ताल करने का सख्त फैसला लिया है। अक्सर यह शिकायतें आती रही हैं कि कई संस्थान केवल कागजों या फाइलों तक सीमित हैं। विभाग ने सभी जिम्मेदार अधिकारियों को जमीन पर उतरकर इन संस्थानों की स्थिति देखने का जिम्मा सौंपा है। अधिकारियों को एक महीने का वक्त दिया गया है ताकि वे जांच पूरी करके अपनी रिपोर्ट सौंपें। साफ है कि सरकार एक तरफ छात्रों का भविष्य संवारना चाहती है तो दूसरी तरफ व्यवस्था में छिपी खामियों पर भी पूरी सख्ती बरत रही है।
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