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Home » झारखंड में खनिज का ‘कुबेर भंडार’, फिर भी खदानें बंद और जनता बेहाल… बाबूलाल का हमला
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झारखंड में खनिज का ‘कुबेर भंडार’, फिर भी खदानें बंद और जनता बेहाल… बाबूलाल का हमला

July 16, 2026No Comments5 Mins Read
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बाबूलाल
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Ranchi/Chaibasa : झारखंड की खनिज संपदा को लेकर नेता प्रतिपक्ष बाबूलाल मरांडी ने राज्य सरकार पर जोरदार हमला बोला है। उन्होंने कहा कि देश का सबसे खनिज संपन्न राज्य होने के बावजूद झारखंड अपनी ताकत का फायदा नहीं उठा पा रहा है। कई खदानें वर्षों से बंद पड़ी हैं, नई खदानों की नीलामी नहीं हो रही, उद्योग संकट में हैं और जिन इलाकों से करोड़ों रुपये का खनिज निकलता है, वहां रहने वाले लोग आज भी बुनियादी सुविधाओं के लिए तरस रहे हैं।

बाबूलाल मरांडी ने कहा कि झारखंड के पास देश के करीब 40 फीसदी खनिज संसाधन हैं, लेकिन इसके बावजूद उत्पादन, खनन राजस्व और रोजगार के मामले में राज्य लगातार पिछड़ता जा रहा है। उन्होंने इसके लिए सरकार की नीतियों, प्रशासनिक सुस्ती और पारदर्शिता की कमी को जिम्मेदार ठहराया।

सारंडा दौरे में सामने आई जमीनी सच्चाई

बाबूलाल मरांडी ने बताया कि हाल ही में उन्होंने पश्चिमी सिंहभूम के सारंडा क्षेत्र का दौरा किया। वहां कई ऐसी खदानें मिलीं जिनकी लीज खत्म हुए कई साल बीत चुके हैं, लेकिन न तो उनका नवीनीकरण हुआ और न ही दोबारा नीलामी कराई गई। नतीजा यह है कि खदानें बंद हैं और हजारों लोगों की रोजी-रोटी पर संकट खड़ा हो गया है।

उन्होंने कहा कि खदानें बंद होने का असर सिर्फ मजदूरों तक सीमित नहीं है। ट्रांसपोर्ट कारोबार, होटल, ढाबे, छोटी दुकानें और स्थानीय व्यापार भी इसकी मार झेल रहे हैं। रोजगार खत्म होने से बड़ी संख्या में युवा दूसरे राज्यों में काम की तलाश में पलायन कर रहे हैं।

कभी गुलजार रहने वाला जामदा बाजार अब सुस्त

बाबूलाल ने कहा कि एक समय जामदा बाजार पूरे इलाके की आर्थिक गतिविधियों का केंद्र हुआ करता था। आज वहां कारोबार ठप पड़ता जा रहा है। लोगों की आय घटी है, खरीदारी कम हुई है और छोटे व्यापारियों की हालत खराब हो गई है।

उन्होंने इसकी तुलना ओडिशा के बड़बिल से करते हुए कहा कि जामदा से महज 20 किलोमीटर दूर स्थित बड़बिल में समय पर खदानों की नीलामी हुई, उत्पादन बढ़ा और रोजगार के नए अवसर बने। दोनों इलाकों के बीच फर्क सिर्फ सरकार की कार्यशैली और प्रशासनिक इच्छाशक्ति का है।

देश में 434 ब्लॉकों की नीलामी, झारखंड में सिर्फ 3

नेता प्रतिपक्ष ने कहा कि वर्ष 2019-20 से अब तक पूरे देश में 434 खनिज ब्लॉकों की नीलामी हो चुकी है। इनमें ओडिशा में 45, छत्तीसगढ़ में 41 और झारखंड में केवल 3 ब्लॉकों की नीलामी हुई।

उन्होंने सवाल उठाया कि आखिर छह साल में सिर्फ तीन ब्लॉक ही क्यों नीलाम हुए। उनका कहना था कि इसका सीधा असर राज्य के उत्पादन, सरकारी राजस्व और रोजगार पर पड़ा है।

लौह अयस्क उत्पादन भी नहीं बढ़ा

मरांडी ने कहा कि वर्ष 2018-19 से 2024-25 के बीच ओडिशा का लौह अयस्क उत्पादन 120 मिलियन टन से बढ़कर 180 मिलियन टन पहुंच गया, जबकि झारखंड का उत्पादन करीब 23 मिलियन टन पर ही अटका रहा। उन्होंने कहा कि यह साफ दिखाता है कि राज्य की खनन नीति और प्रबंधन दोनों कमजोर साबित हुए हैं।

कम खनिज वाला ओडिशा, लेकिन दोगुना राजस्व

मरांडी ने कहा कि झारखंड के पास देश के करीब 40 फीसदी खनिज संपदा है, फिर भी वर्ष 2025-26 में राज्य को करीब 22 हजार करोड़ रुपये का खनन राजस्व मिला। दूसरी ओर सिर्फ 17 फीसदी खनिज संसाधन वाले ओडिशा ने 46 हजार करोड़ रुपये का राजस्व हासिल किया। उन्होंने कहा कि अगर संसाधनों का सही तरीके से उपयोग होता तो झारखंड की आर्थिक तस्वीर बिल्कुल अलग होती।

नोआमुंडी की ज्यादातर खदानें बंद, ACC प्लांट पर भी ताला

उन्होंने बताया कि चाईबासा जिले के नोआमुंडी क्षेत्र में 9 में से 7 पत्थर खदानें बंद हैं। वहीं झींकपानी में वर्ष 1946 से चल रहा ACC सीमेंट प्लांट भी 16 अगस्त से बंद होने जा रहा है। इससे करीब 1600 परिवारों की आजीविका प्रभावित होगी। मरांडी ने कहा कि सरकार समय रहते कदम नहीं उठाती है तो पूरे इलाके की अर्थव्यवस्था पर इसका गंभीर असर पड़ेगा।

DMFT के 3700 करोड़ रुपये कहां खर्च हुए

नेता प्रतिपक्ष ने जिला खनिज फाउंडेशन ट्रस्ट यानी DMFT फंड के इस्तेमाल पर भी सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि पश्चिमी सिंहभूम में वर्ष 2016 से 2026 के बीच करीब 3700 करोड़ रुपये जमा हुए, लेकिन आज तक न तो वार्षिक रिपोर्ट सार्वजनिक की गई और न ही बजट और परियोजनाओं का पूरा ब्योरा सामने आया। उन्होंने आरोप लगाया कि DMFT की वेबसाइट पर आखिरी अपडेट वर्ष 2018 का है। ऐसे में खनन प्रभावित गांवों के लोगों को यह तक पता नहीं कि उनके विकास के लिए मिलने वाला पैसा कहां खर्च हुआ।

जहां से खनिज निकलता है, वहीं सबसे ज्यादा बदहाली

मरांडी ने कहा कि सारंडा और पश्चिमी सिंहभूम का इलाका आयरन ओर से भरपूर है। यहां से निकलने वाले लौह अयस्क ने बोकारो स्टील सिटी, टाटा और दुर्गापुर जैसे बड़े औद्योगिक शहरों के विकास में अहम भूमिका निभाई, लेकिन जिस इलाके से यह खनिज निकलता है, वहां रहने वाले लोगों की जिंदगी आज भी नहीं बदली। उन्होंने कहा कि गांवों में सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा और दूसरी बुनियादी सुविधाओं की कमी अब भी बनी हुई है। यह सबसे बड़ी विडंबना है कि जिस धरती से राज्य और देश को सबसे ज्यादा संपदा मिलती है, वहीं के लोग विकास से सबसे ज्यादा दूर हैं।

सरकार से रखीं पांच बड़ी मांगें

मरांडी ने सरकार से बंद पड़ी खदानों और पत्थर खदानों की जल्द नीलामी कराने, खनन गतिविधियां दोबारा शुरू करने, उत्पादन बढ़ाने के लिए समयबद्ध योजना बनाने, स्थानीय युवाओं के लिए रोजगार के अवसर बढ़ाने और DMFT फंड का पूरा हिसाब सार्वजनिक करने की मांग की। उन्होंने कहा कि झारखंड की खनिज संपदा पर पहला हक यहां की जनता का है। सरकार को जवाब देना चाहिए कि प्राकृतिक संसाधनों से भरपूर होने के बावजूद राज्य के लोगों को रोजगार, विकास और बुनियादी सुविधाओं का लाभ आखिर क्यों नहीं मिल पा रहा है।

इस मौके पर भाजपा के प्रदेश मीडिया प्रभारी योगेंद्र प्रताप सिंह, प्रदेश प्रवक्ता संदीप वर्मा, शोभा यादव और मृत्युंजय शर्मा भी मौजूद रहे।

इसे भी पढ़ें : झारखंड में घुसपैठ पर बाबूलाल का हमला, बोले- वोट बैंक के लिए हो रहा खेल

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