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Patna : कुछ साल पहले तक मानसून की दस्तक के साथ ही बिहार के लोगों के मन में एक अनजाना डर बैठ जाता था। डर… अस्पतालों के चक्कर काटने का, डर… अस्पतालों में बेड की कमी का और डर… अपनों को खोने का। डेंगू और चिकनगुनिया जैसी बीमारियों ने राज्य में कई परिवारों को गहरे जख्म दिए थे। लेकिन साल 2026 के जुलाई महीने से जो आंकड़े और तस्वीरें निकलकर आ रही हैं, वे राहत देने वाली भी हैं और यह भरोसा भी जगाती हैं कि अगर सही समय पर सही कदम उठाए जाएं, तो बड़ी से बड़ी चुनौती को मात दी जा सकती है। इस साल 6 जुलाई तक की रिपोर्ट बताती है कि बिहार में इस सीजन में डेंगू से एक भी जान नहीं गई है। इतना ही नहीं, कभी लोगों को जोड़ों के दर्द से बेहाल कर देने वाले चिकनगुनिया का तो इस साल राज्य में एक भी मामला सामने नहीं आया है। इस बड़ी कामयाबी के पीछे स्वास्थ्य विभाग की बदली हुई रणनीति, अधिकारियों की मुस्तैदी और आम लोगों की भागीदारी की एक लंबी कहानी है।
जब आंकड़े खुद बयां करने लगे बदलाव की कहानी
स्वास्थ्य विभाग के गलियारों में जब मंगलवार को स्वास्थ्य मंत्री निशांत कुमार ने एक हाई लेवल बैठक बुलाई, तो मेज पर रखे आंकड़ों ने हर किसी के चेहरे पर थोड़ी राहत और थोड़ा संतोष ला दिया। यह संतोष पिछले तीन सालों की कड़ी मेहनत का नतीजा था। अगर हम पीछे मुड़कर देखें, तो साल 2023 बिहार के लिए बेहद डरावना था। उस साल राज्य में डेंगू के 20,224 मामले आए थे और 74 लोगों की मौत हो गई थी। हर तरफ हाहाकार था। लेकिन इसके बाद स्वास्थ्य विभाग ने अपनी रणनीति बदली। साल 2024 में मामले घटकर 10,155 रह गए और मौतों की संख्या 16 पर आ गई। साल 2025 तक आते-आते यह लड़ाई और मजबूत हुई, जब सिर्फ 3,902 मरीज मिले और केवल 2 मौतें दर्ज हुईं।
अब बात करते हैं मौजूदा साल यानी 2026 की। इस साल 6 जुलाई तक पूरे बिहार में डेंगू के महज 176 मामले दर्ज किए गए हैं और मौत का आंकड़ा शून्य है। यही हाल चिकनगुनिया का भी है। साल 2024 में जहां इसके 520 मरीज थे, वहीं 2025 में सिर्फ 45 रह गए और इस साल अब तक राज्य में चिकनगुनिया का खाता तक नहीं खुला है।
राजधानी पटना कभी बन गई थी ‘हॉटस्पॉट’
जब भी डेंगू का नाम आता था, पटना के लोगों के कान खड़े हो जाते थे। जलजमाव और घनी आबादी के कारण पटना इस बीमारी का गढ़ बनता जा रहा था। साल 2023 में अकेले पटना में 8,600 मामले आए थे। लेकिन शहर की नगर सरकार और स्वास्थ्य अमले ने इस बार कमर कस ली। नतीजा यह हुआ कि साल 2024 में पटना में मामले घटकर 5,033 और 2025 में 1,817 रह गए। इस साल जुलाई के पहले हफ्ते तक पटना में डेंगू के सिर्फ 47 मामले सामने आए हैं। शहर के अस्पतालों के विशेष डेंगू वार्ड इस बार खाली पड़े हैं, जो प्रशासन की एक बड़ी जीत है।
कागजों पर नहीं, जमीन पर दौड़ रही हैं फॉगिंग मशीनें
अक्सर देखा जाता था कि जब बीमारी फैल जाती थी, तब फॉगिंग मशीनें गलियों में घूमती थीं। लेकिन इस बार स्वास्थ्य विभाग ने मौसम बदलने से पहले ही मोर्चा संभाल लिया। इस समय पूरे राज्य में 318 फॉगिंग मशीनें लगातार काम कर रही हैं। विभाग ने उन इलाकों की पहचान पहले ही कर ली थी जहां पिछले सालों में ज्यादा मरीज मिले थे। पटना, भागलपुर, दरभंगा, नालंदा, पश्चिमी चंपारण और पूर्वी चंपारण जैसे संवेदनशील जिलों में अतिरिक्त फॉगिंग मशीनें तैनात की गईं। मच्छरों को पनपने से रोकने वाले जरूरी कीटनाशक (टेक्निकल मैलाथियान) का इतना स्टॉक पहले ही जमा कर लिया गया कि कभी इसकी कमी महसूस ही नहीं हुई।
जांच की किट तैयार, डॉक्टरों को पहले ही मिली ट्रेनिंग
इस बार की रणनीति की सबसे बड़ी खूबी यह रही कि विभाग ने सिर्फ इलाज पर ध्यान नहीं दिया, बल्कि समय पर बीमारी की पहचान को अपनी प्राथमिकता बनाया। सभी जिला अस्पतालों और मेडिकल कॉलेजों में मुफ्त जांच के लिए ‘एनएस-1 एलाइजा’ और ‘आईजीएम एलाइजा’ किट पर्याप्त मात्रा में पहुंचा दी गई हैं। राज्य के मेन स्टोर में जिला अस्पतालों के लिए 62 किट का बफर स्टॉक हमेशा तैयार रहता है। किसी भी आपात स्थिति से निपटने के लिए 200 और किट का ऑर्डर पहले ही दिया जा चुका है।
तैयारी सिर्फ दवाओं तक सीमित नहीं थी। इसी साल फरवरी के महीने में, जब ठंड विदा हो रही थी, तभी पटना नगर निगम और स्वास्थ्य कर्मियों को डेंगू नियंत्रण की विशेष ट्रेनिंग दे दी गई थी। जून में सभी अस्पतालों को नई गाइडलाइन सौंप दी गई, ताकि डॉक्टर और स्टाफ को पता हो कि मरीज के आते ही क्या कदम उठाने हैं।
‘एंटी-डेंगू माह’… जनता बनी इस लड़ाई का चेहरा
कोई भी सरकारी अभियान तब तक सफल नहीं हो सकता, जब तक आम लोग उसमें हाथ न बंटाएं। स्वास्थ्य विभाग ने इस बात को समझा। यही वजह है कि जून महीने में ‘एंटी-डेंगू दिवस’ पर रैलियां निकाली गईं और अब जुलाई के पूरे महीने को ‘एंटी-डेंगू माह’ के रूप में मनाया जा रहा है। सोशल मीडिया से लेकर अखबारों और रेडियो के जरिए लोगों को लगातार एक ही बात समझाई जा रही है… “अपने घर के कूलर, गमलों और कबाड़ में पानी जमा न होने दें।” लोग अब जागरूक हो रहे हैं। वे समझ रहे हैं कि पूरी आस्तीन के कपड़े पहनना और घर के आसपास सफाई रखना ही इस बीमारी का सबसे बड़ा इलाज है।
समीक्षा बैठक के बाद स्वास्थ्य मंत्री निशांत कुमार ने स्वास्थ्य सचिव कुमार रवि और राज्य स्वास्थ्य समिति के कार्यपालक निदेशक अमित पांडेय सहित सभी अधिकारियों की तारीफ की। साथ ही उन्होंने जनता से अपील भी की कि वे ढिलाई न बरतें। बुखार होने पर झाड़-फूंक या खुद से दवा लेने के बजाय सीधे सरकारी अस्पताल जाएं, जहां जांच से लेकर इलाज तक सब कुछ मुफ्त और मुस्तैद है।
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