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Pawan Thakur
बिहार के राजनीतिक और प्रशासनिक इतिहास में व्यवस्था बदलने की बातें अक्सर कागजों तक सीमित रह जाती थीं। योजनाएं सचिवालय की फाइलों में सालों-साल घूमती थीं और जनता तक पहुंचते-पहुंचते उनकी लागत दोगुनी और समय सीमा खत्म हो जाती थी। लेकिन 2024 में उपमुख्यमंत्री और पथ निर्माण विभाग संभालने के बाद से लेकर अब तक सम्राट चौधरी ने इस ढर्रे को सीधे चुनौती दी है। उन्होंने साफ कर दिया कि जनता के टैक्स के पैसों से बनने वाले इन्फ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स किसी ठेकेदार या अधिकारी की सुस्ती की भेंट नहीं चढ़ेंगे। उनका यह तेवर केवल बयानों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि सचिवालय की बैठकों से लेकर ग्राउंड जीरो पर औचक छापों तक एक कड़क प्रशासनिक मॉडल के रूप में सामने आया है। आज बिहार के विकास का जो खाका खींचा जा रहा है, उसके केंद्र में सख्त प्रशासनिक निगरानी, थर्ड पार्टी ऑडिट और तय समय सीमा पर डिलीवरी की जिद साफ दिखाई दे रही है।
अफसरों को दो टूक- दफ्तर छोड़िए और जमीन पर जाइए
प्रशासनिक बागडोर संभालते ही उन्होंने सबसे पहले पथ निर्माण और ग्रामीण कार्य विभाग के आला अधिकारियों के साथ बैठक कर यह स्पष्ट कर दिया था कि अब केवल एसी कमरों में बैठकर पॉवरपॉइंट प्रेजेंटेशन देखने का दौर खत्म हो चुका है। उन्होंने स्पष्ट निर्देश जारी किया कि जिस प्रोजेक्ट की फाइल टेबल पर आएगी, उसकी हकीकत जानने के लिए चीफ इंजीनियर से लेकर जिले के कार्यपालक अभियंताओं को खुद निर्माण स्थल पर मौजूद रहना होगा।
लापरवाही बरतने वाले संवेदकों पर पेनाल्टी लगाने और घटिया काम पर ब्लैकलिस्ट करने की कार्रवाई ने पूरे सिस्टम में हलचल पैदा कर दी। बरसों से अटकी फाइलों को आगे बढ़ाने के लिए सिंगल-विंडो क्लीयरेंस और प्रोजेक्ट मॉनिटरिंग सिस्टम को एक्टिव किया गया। इसका सीधा असर यह हुआ कि निर्माण एजेंसियों की वह पुरानी आदत छूटने लगी, जिसमें वे हर छह महीने पर प्रोजेक्ट का एस्टीमेट और डेडलाइन बढ़वाने का बहाना बनाते थे। अब राज्य के सभी प्रमुख प्रोजेक्ट्स की मॉनिटरिंग सीधे डैशबोर्ड के जरिए की जा रही है।
साढ़े ग्यारह हजार करोड़ की सौगात, भाषण नहीं सीधा एक्शन
सरकार में आने के बाद सम्राट चौधरी ने लोक-लुभावन घोषणाओं के बजाय सीधे फंड रिलीज करने और काम शुरू कराने की रणनीति अपनाई। ग्रामीण और शहरी कनेक्टिविटी को मजबूत करने के लिए 11,464 करोड़ रुपये की लागत वाली लगभग 2,476 छोटी-बड़ी विकास योजनाओं का खाका धरातल पर उतारा गया। इस भारी-भरकम पैकेज में केवल राजधानी पटना ही नहीं, बल्कि राज्य के सुदूर सीमांचल, मिथिलांचल और मगध के ग्रामीण इलाकों को प्राथमिकता दी गई।
इस योजना के तहत 1000 से अधिक ग्रामीण सड़कों को दुरुस्त और चौड़ा करने का काम शुरू हुआ। गांव-देहात की ऐसी सड़कें जो हर साल बरसात के दिनों में कीचड़ में तब्दील होकर कट जाती थीं, उन्हें बारहमासी पक्की सड़कों में बदला जा रहा है। इसके साथ ही, जिला मुख्यालयों और अनुमंडल स्तर पर ट्रैफिक जाम की पुरानी समस्या को खत्म करने के लिए नए बाईपास और जल निकासी की योजनाओं के लिए राशि सीधे संबंधित एजेंसियों को ट्रांसफर की गई। इस कदम ने जनता के बीच यह भरोसा पैदा किया कि सरकार केवल भाषणबाजी नहीं, बल्कि डिलीवरी पर फोकस कर रही है।
गंगा के दोनों किनारों को साधने की मुहिम, हर पखवाड़े खुद पहुंच रहे निर्माण स्थल
उत्तर और दक्षिण बिहार के बीच की भौगोलिक दूरी को पाटना राज्य की अर्थव्यवस्था के लिए सबसे बड़ी चुनौती रही है। सम्राट चौधरी ने इसे केवल कागजी फाइलों तक सीमित नहीं रहने दिया, बल्कि खुद फील्ड में उतरकर कमान संभाली। पटना से वैशाली को जोड़ने वाले कच्ची दरगाह से बिदुपुर के बीच 4,988 करोड़ रुपये की लागत से बन रहे 6-लेन के विशाल पुल का काम हो या जेपी गंगा पथ का दीदारगंज तक विस्तार, वे बिना किसी पूर्व सूचना के सीधे निर्माण स्थल पर पहुंच जाते हैं।
गंगा नदी पर पुलों के नेटवर्क को मजबूत करने के लिए 3,758 करोड़ रुपये के विशेष ब्रिज पैकेज को जिस तेजी से आगे बढ़ाया गया, उसने सालों से लटके गतिरोध को तोड़ दिया। इस पैकेज के तहत बाढ़ प्रभावित दियारा और कोसी क्षेत्र में दर्जनों उच्चस्तरीय आरसीसी पुलों का निर्माण कराया जा रहा है ताकि मानसून के चार महीने इन इलाकों का संपर्क बाकी दुनिया से न कटे। अफसरों और निर्माण एजेंसियों को साफ संदेश दे दिया गया है कि डेडलाइन मिस होने पर सीधे शीर्ष अधिकारियों की जवाबदेही तय की जाएगी।
एक्सप्रेसवे और कनेक्टिविटी का महाजाल, बदल रही सूबे की पहचान
बिहार को अब तक केवल टूटी सड़कों और धीमे ट्रैफिक के लिए जाना जाता था, लेकिन मौजूदा सरकार ने इस नैरेटिव को हाई-स्पीड इकोनॉमिक कॉरिडोर के जरिए पूरी तरह पलट दिया है। राज्य के पहले एक्सेस कंट्रोल्ड एक्सप्रेसवे, आमस से दरभंगा तक बन रहे 189 किलोमीटर लंबे मार्ग (NH-119D) पर काम अब अपने अंतिम चरण में है। 6,927 करोड़ रुपये की लागत से बन रहे इस 4-लेन एक्सप्रेसवे के लिए जमीन अधिग्रहण की तमाम कानूनी और स्थानीय अड़चनों को जिलाधिकारियों की सीधी मॉनिटरिंग के जरिए सुलझाया गया।
वहीं नेपाल सीमा से लेकर बंगाल की खाड़ी तक सीधा रास्ता देने वाले 39,600 करोड़ रुपये के रक्सौल-हल्दिया पोर्ट 8-लेन एक्सप्रेसवे और लगभग 18,000 करोड़ रुपये की लागत से बनने वाले पटना-कोलकाता ग्रीनफील्ड एक्सप्रेसवे के लिए भू-अधिग्रहण की प्रक्रिया में अभूतपूर्व तेजी आई है। इसके अलावा, जीटी रोड पर 4,500 करोड़ रुपये की लागत से वाराणसी से औरंगाबाद के बीच 6-लेन सड़क चौड़ीकरण का 90 फीसदी से ज्यादा काम पूरा करा लिया गया है। इन प्रोजेक्ट्स से बिहार केवल एक राज्य नहीं, बल्कि पूर्वी भारत का बड़ा लॉजिस्टिक हब बनने की ओर बढ़ रहा है।
मेट्रो से लेकर टेक पार्क तक, युवाओं के पलायन पर सीधा प्रहार
राजधानी पटना के ढांचे को आधुनिक महानगर की तर्ज पर खड़ा करने के लिए 13,365 करोड़ रुपये की लागत वाली पटना मेट्रो रेल परियोजना पर दिन-रात काम चल रहा है। 32 किलोमीटर लंबे इस नेटवर्क के अंतर्गत राजेंद्र नगर, गांधी मैदान, पीएमसीएच और मीठापुर के इलाकों में भूमिगत टनलिंग का काम तेजी से निपटाया जा रहा है, जबकि प्रायोरिटी एलिवेटेड कॉरिडोर पर ट्रैक बिछाने और इलेक्ट्रिकल सिस्टम के काम को अंतिम रूप दिया जा रहा है।
इसके साथ ही, राज्य के पढ़े-लिखे युवाओं को घर पर ही आईटी सेक्टर में रोजगार देने के मकसद से पटना में राज्य के पहले मेगा टेक पार्क की नींव रखी गई है। नेशनल बिल्डिंग्स कंस्ट्रक्शन कॉरपोरेशन (NBCC) के साथ समन्वय कर तैयार किए जा रहे इस हाई-टेक कैंपस में बड़े डेटा सेंटर, सॉफ्टवेयर कंपनियों के ऑफिस और स्थानीय स्टार्टअप्स के लिए वर्ल्ड-क्लास स्पेस विकसित किया जा रहा है। इसका मकसद साफ है कि बिहार के युवाओं को रोजगार की तलाश में बेंगलुरु, नोएडा या पुणे के भरोसे न रहना पड़े।
बाढ़ और सिंचाई का स्थायी हल, कोसी-मेची परियोजना को मिली रफ्तार
उत्तर बिहार के लिए बाढ़ हर साल तबाही लेकर आती है, जिससे अरबों रुपये का बुनियादी ढांचा बह जाता है। इस समस्या के स्थायी समाधान के लिए 6,282 करोड़ रुपये की लागत वाली कोसी-मेची नदी जोड़ो (रिवर इंटरलिंकिंग) परियोजना को सर्वोच्च प्राथमिकता पर रखा गया है। इस योजना के तहत कोसी नदी के अतिरिक्त अधिशेष जल को नहरों के नेटवर्क के जरिए मेची बेसिन में डायवर्ट किया जा रहा है। इससे न केवल हर साल आने वाले विनाशकारी सैलाब से लाखों लोगों के घर और खेत बचेंगे, बल्कि सीमांचल के चार प्रमुख जिलों अररिया, किशनगंज, पूर्णिया और कटिहार में 2 लाख 14 हजार हेक्टेयर से अधिक कृषि भूमि को बारहमासी सिंचाई का पानी मिलेगा। जल संसाधन विभाग के इंजीनियरों को कड़ा निर्देश दिया गया है कि तटबंधों की जियो-टैगिंग और सुरक्षा का काम तय समय में पूरा किया जाए।
जनता में उम्मीद के साथ कसौटी पर खरी उतरने की चुनौती
ग्राउंड जीरो पर जब आम लोगों से बात की जाती है, तो व्यवस्था में आए इस बदलाव की गवाही साफ मिलती है। पटना से जहानाबाद और गया जाने वाले यात्रियों का कहना है कि जहां पहले चार से पांच घंटे धूल और गड्ढों में बीतते थे, वहीं अब चौड़े फोर-लेन पर गाड़ी 80 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से दौड़ रही है और सफर दो घंटे में सिमट गया है।
हालांकि, जमीनी स्तर पर कुछ चुनौतियां अब भी बाकी हैं। पटना आउटर रिंग रोड, बिहटा एलिवेटेड कॉरिडोर और प्रमुख हाईवे के किनारे बसे गांवों के लोगों की शिकायत है कि सर्विस लेन और एप्रोच रोड्स के काम में मुख्य सड़कों जितनी तेजी नहीं दिखाई जा रही है। सर्विस लेन न होने से स्थानीय किसानों को अपने ही खेतों तक पहुंचने के लिए लंबा चक्कर काटना पड़ता है। इसके अलावा, राज्य में पुलों की मजबूती को लेकर पहले उठे सवालों के बाद अब जनता निर्माण सामग्री की गुणवत्ता को लेकर बहुत सतर्क है।
मुख्यमंत्री सचिवालय ने इस पर सख्त रुख अपनाते हुए आदेश जारी किया है कि बिना थर्ड पार्टी क्वालिटी ऑडिट रिपोर्ट के किसी भी ठेकेदार का फाइनल बिल क्लियर नहीं होगा। सम्राट चौधरी ने अपने सख्त रुख से यह साफ कर दिया है कि बिहार अब पुराने ढर्रे और समझौतों की राजनीति से बाहर निकल चुका है, जहां काम का पैमाना घोषणाएं नहीं, बल्कि जमीन पर पूरे हो चुके प्रोजेक्ट्स हैं।
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