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Home » जंगल की खामोशी में टूटा एक पेड़, और दफन हो गया एक जांबाज का सपना
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जंगल की खामोशी में टूटा एक पेड़, और दफन हो गया एक जांबाज का सपना

April 8, 2026No Comments5 Mins Read
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Chaibasa : झारखंड के चाईबासा जिले का बाबुडेरा इलाका। चारों तरफ घना जंगल, ऊंचे पेड़ और हर कदम पर खतरे का अहसास। यहां जब भी सुरक्षा बलों की टुकड़ी निकलती है, तो उनके साथ सिर्फ हथियार नहीं होते, बल्कि सुरक्षा की जिम्मेदारी भी होती है। इसी जिम्मेदारी को निभाते हुए सीआरपीएफ की 210 कोबरा बटालियन के जवान राकेश कुमार अब इस दुनिया में नहीं रहे। एक ऐसी घटना में, जो किसी भी जवान के लिए कल्पना से बाहर होती है, अचानक एक पेड़ गिरा और उसी हादसे में राकेश कुमार गंभीर रूप से घायल हो गए। इलाज के लिए उन्हें रांची के अस्पताल ले जाया गया, लेकिन डॉक्टर उन्हें बचा नहीं सके। देश ने एक और जवान खो दिया, परिवार ने अपना बेटा, और किसी ने अपना सहारा।

अभियान पर निकले थे, लेकिन लौटकर नहीं आए

कांस्टेबल (जीडी) राकेश कुमार, बल संख्या 135370141, पश्चिम सिंहभूम के बाबुडेरा इलाके में चल रहे अभियान में तैनात थे। कोबरा बटालियन को नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में सबसे कठिन ऑपरेशन के लिए जाना जाता है। जहां हर कदम पर खतरा होता है, वहां जवानों को हमेशा सतर्क रहना पड़ता है। लेकिन उस दिन खतरा किसी गोली या बारूदी सुरंग से नहीं आया। वह खतरा आया एक पेड़ के गिरने से। जंगल में अचानक पेड़ गिरा और उसकी चपेट में आने से राकेश कुमार बुरी तरह घायल हो गए। साथ मौजूद जवानों ने तुरंत उन्हें संभाला। जंगल की जमीन पर, जहां वक्त भी रुकता नहीं, वहां साथियों ने बिना देर किए प्राथमिक उपचार दिया और तुरंत उन्हें अस्पताल पहुंचाने की कोशिश शुरू कर दी।

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रांची के अस्पताल में आखिरी सांस

घायल जवान को बेहतर इलाज के लिए रांची के राज अस्पताल में भर्ती कराया गया। अस्पताल के बाहर उनके साथी जवानों की आंखों में उम्मीद थी। हर किसी को लग रहा था कि शायद इलाज से राकेश कुमार बच जाएंगे। लेकिन किस्मत को कुछ और मंजूर था। इलाज के दौरान डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया। खबर जैसे ही बल तक पहुंची, पूरा कैंप गमगीन हो गया। जिस जवान के साथ सुबह तक अभियान की योजना बनाई जा रही थी, शाम तक उसकी फाइल पर “शहीद” लिखा जा चुका था।

बिहार के औरंगाबाद से निकला था देश का सिपाही

राकेश कुमार का घर बिहार के औरंगाबाद जिले के ग्राम धमनी में है। थाना हसपुरा क्षेत्र का यह गांव सामान्य सा है, लेकिन इसी गांव से निकला एक बेटा देश की सबसे कठिन ड्यूटी निभा रहा था। उनका जन्म 06 अगस्त 1993 को हुआ था। उम्र लगभग 33 वर्ष। गांव की गलियों में खेलते हुए जिस बच्चे ने कभी सपना देखा होगा कि वह वर्दी पहनेगा, वह सपना सच भी हुआ। लेकिन यह सच अब एक परिवार के लिए सबसे बड़ा दर्द बन गया।

2013 में CRPF जॉइन किया, फिर देश सेवा ही जीवन बन गई

राकेश कुमार ने 08 मार्च 2013 को केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल में भर्ती होकर अपनी नौकरी की शुरुआत की थी। यह वही समय होता है जब एक जवान का जीवन पूरी तरह बदल जाता है। घर की जिम्मेदारी, परिवार की उम्मीदें और देश के लिए समर्पण, सब कुछ एक साथ शुरू हो जाता है। करीब 12 वर्षों तक राकेश कुमार ने अपनी ड्यूटी निभाई। धूप, बारिश, जंगल, पहाड़, नक्सल इलाका, सब कुछ देखा। लेकिन उन्होंने कभी पीछे हटना नहीं सीखा।

अधिकारियों ने जताया गहरा शोक

इस दुखद घटना के बाद डीजीपी तदाशा मिश्र, सीआरपीएफ के डीजी और अन्य आला अधिकारियों ने गहरा शोक व्यक्त किया। अधिकारियों ने दिवंगत जवान के परिजनों के प्रति संवेदना जताई और कहा कि बल इस दुख की घड़ी में परिवार के साथ खड़ा है।

अंतिम यात्रा की तैयारी, गांव में इंतजार

बल के वरिष्ठ अधिकारियों द्वारा पार्थिव शरीर को उनके गृह स्थान औरंगाबाद भेजने की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है। गांव में अब हर कोई बस यही खबर सुन रहा है कि “राकेश का शव आ रहा है।” गांव के लोगों के लिए यह खबर किसी तूफान से कम नहीं। जिस बेटे को उन्होंने वर्दी में देखा था, अब वही बेटा तिरंगे में लिपटकर वापस लौटेगा।

शहीद की अंतिम सलामी, लेकिन परिवार का दर्द हमेशा रहेगा

सरकारी प्रक्रिया पूरी होने के बाद जवान को अंतिम सलामी दी जाएगी। बंदूकें हवा में उठेंगी, राष्ट्रध्वज झुकेगा, और एक बार फिर देश कहेगा, “हमने अपना सपूत खो दिया।” लेकिन यह सलामी उस मां के आंसू नहीं रोक सकती, जिसने बेटे को बड़े अरमानों से पाला था। यह सलामी उस पिता की चुप्पी नहीं तोड़ सकती, जो बेटे के लौटने का इंतजार करता रहा। यह सलामी उस घर की खाली चौखट नहीं भर सकती, जहां अब सिर्फ यादें बचेंगी।

जंगल ने एक और नाम अपने सन्नाटे में लिख लिया

राकेश कुमार की मौत यह बताती है कि जवान सिर्फ गोलियों से नहीं मरते। कई बार प्रकृति भी युद्ध बन जाती है। जंगल में ड्यूटी का मतलब सिर्फ नक्सलियों से मुकाबला नहीं, बल्कि हर उस खतरे से लड़ना है जो अचानक सामने आ जाए। आज बाबुडेरा का वही जंगल फिर शांत है। लेकिन उस खामोशी में एक दर्द छिपा है। एक जवान का दर्द, एक परिवार की टूटती उम्मीद, और एक देश का खोया हुआ सिपाही।

देश ने खोया एक बहादुर बेटा

कांस्टेबल राकेश कुमार अब हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनका फर्ज, उनका संघर्ष और उनकी सेवा हमेशा याद रखी जाएगी। उनकी शहादत सिर्फ एक खबर नहीं है। यह उस कीमत की कहानी है, जो हर दिन देश की सुरक्षा के लिए चुकाई जाती है।

इसे भी पढ़ें : रात के अंधेरे में DSP की रेड, गंदे धंधे का बड़ा नेटवर्क ध्वस्त

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