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Pakur (Jaydev Kumar) : नगर परिषद अध्यक्ष को सरकारी गाड़ी मिलना अब कानूनी पचड़े में फंसता नजर आ रहा है। पाकुड़ सिविल कोर्ट के अधिवक्ता विश्वजीत मिश्रा ने अध्यक्ष को मिली इस सुविधा पर सीधे सवाल खड़े कर दिए हैं। उन्होंने कार्यपालक पदाधिकारी (Executive Officer) को आरटीआई (RTI) डालकर पूछा है कि आखिर किस नियम और बजट के तहत अध्यक्ष महोदया को सरकारी गाड़ी आवंटित की गई है? वकील के इस कदम के बाद से नगर परिषद महकमे में खलबली मच गई है।
2009 का वो नियम, जिसने बढ़ाईं मुश्किलें
अधिवक्ता विश्वजीत मिश्रा ने अपनी आरटीआई अर्जी में झारखंड सरकार के नगर विकास विभाग के एक पुराने आदेश का हवाला दिया है। उन्होंने बताया कि 23 अक्टूबर 2009 को विभाग ने एक संकल्प पत्र (लेटर नंबर- 2647) जारी किया था। इसके तहत शहरी स्थानीय निकायों के निर्वाचित जनप्रतिनिधियों (जैसे अध्यक्ष और उपाध्यक्ष) का मासिक मानदेय (Honorarium) तय किया गया था। इस नियम में साफ लिखा है कि तय मानदेय के अलावा जनप्रतिनिधियों को किसी भी प्रकार की अन्य सरकारी सुविधा या भत्ता नहीं दिया जाएगा।
RTI में पूछे गए 10 तीखे सवाल, प्रशासन से मांगा जवाब
अधिवक्ता ने सूचना के अधिकार के तहत प्रशासन के सामने सवालों की झड़ी लगा दी है। उन्होंने मुख्य रूप से इन बिंदुओं पर प्रमाणित कॉपियां मांगी हैं:
गाड़ी देने का लीगल आधार क्या है? किस अधिनियम, नियम, शासनादेश या वैधानिक प्रावधान के तहत पाकुड़ नगर परिषद अध्यक्ष को सरकारी वाहन दिया गया है? अगर कोई नियम नहीं है, तो इसका विधिक आधार (Legal Basis) स्पष्ट करें।
मंजूरी देने वाले अफसर कौन? इस गाड़ी को आवंटित करने का आदेश या स्वीकृति पत्र किसने जारी किया? उस सक्षम प्राधिकारी का नाम, पद और फाइल संख्या क्या है?
गाड़ी का पूरा ब्यौरा: आवंटित की गई गाड़ी का रजिस्ट्रेशन नंबर, मेक-मॉडल और अलॉटमेंट की तारीख क्या है?
खर्चे का बजट हेड क्या है? गाड़ी के रख-रखाव, पेट्रोल-डीजल, मरम्मत, इंश्योरेंस और ड्राइवर के वेतन का भुगतान किस बजट मद से किया जा रहा है?
लॉगबुक और कुल खर्च का हिसाब: पिछले 6 महीनों की गाड़ी की लॉगबुक (मूवमेंट रजिस्टर) की प्रमाणित कॉपी दी जाए। साथ ही चालू वित्तीय वर्ष में अब तक इस गाड़ी पर कुल कितना सरकारी पैसा खर्च हुआ है, उसकी जानकारी दी जाए।
13 जुलाई को रिसीव हुआ पत्र, जवाब का इंतजार
अधिवक्ता विश्वजीत मिश्रा ने निर्धारित फीस के साथ यह आरटीआई आवेदन नगर परिषद कार्यालय में जमा करा दिया है, जो 13 जुलाई को रिसीव भी हो चुका है। उन्होंने साफ कहा है कि सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 के तहत तय समय सीमा के भीतर उन्हें इन सभी बिंदुओं पर बिंदुवार और प्रमाणित जानकारी उपलब्ध कराई जाए। अब गेंद प्रशासन के पाले में है कि वह इस गाड़ी आवंटन को लेकर क्या कानूनी दलील पेश करता है।
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