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Ranchi : राजधानी के मोरहाबादी स्थित सिदो-कान्हू उद्यान सोमवार की सुबह एक बार फिर इतिहास की यादों से भर उठा। चारों ओर हूल दिवस की गूंज थी। मंच पर सीएम हेमंत सोरेन और विधायक कल्पना सोरेन मौजूद थे। सामने बड़ी संख्या में लोग अपने उन वीरों को याद करने पहुंचे थे, जिन्होंने अंग्रेजी हुकूमत और शोषण के खिलाफ सबसे पहले आवाज बुलंद की थी। सीएम हेमंत सोरेन ने जैसे ही बोलना शुरू किया, उन्होंने किसी राजनीतिक मुद्दे की नहीं, बल्कि उस संघर्ष की बात की जिसने झारखंड की पहचान बनाई। उन्होंने कहा कि क्रांति की चिंगारी कभी नहीं बुझती। उसे कोई बुझा भी नहीं सकता। हालात चाहे जैसे भी हों, जब अन्याय बढ़ता है तो कहीं न कहीं से प्रतिरोध की आवाज जरूर उठती है।
जब डर से बड़ी हो गई थी आजादी की चाह
सीएम हेमंत सोरेन ने कहा कि एक समय ऐसा था जब देश के लोगों को लगने लगा था कि शोषण से बाहर निकलने का कोई रास्ता नहीं है। अंग्रेजी हुकूमत का दबाव था और आम लोग बेबस थे। लेकिन उसी दौर में आदिवासी समाज के कुछ नौजवानों ने तय किया कि अब चुप नहीं बैठना है।उन्होंने कहा कि सिदो-कान्हू, चांद-भैरव और वीरांगना फूलो-झानो ने यह नहीं सोचा कि उनके सामने कितनी बड़ी ताकत है या उनका अंजाम क्या होगा। उन्होंने सिर्फ इतना सोचा कि अन्याय के खिलाफ आवाज उठानी जरूरी है। यही सोच आगे चलकर हूल विद्रोह बनी और इसने पूरे देश को संघर्ष का नया रास्ता दिखाया।
आज भी वहीं से शुरू होती है लड़ाई, जहां सबसे ज्यादा अन्याय होता है
सीएम हेमंत सोरेन ने कहा कि हूल विद्रोह की कहानी सिर्फ किताबों में पढ़ने की चीज नहीं है। यह आज भी उतनी ही प्रासंगिक है। उन्होंने कहा कि आज भी जहां गरीब, आदिवासी, दलित या कमजोर वर्ग के लोगों पर अत्याचार होता है, वहीं से बदलाव की शुरुआत होती है। संघर्ष हमेशा उन्हीं लोगों के बीच से निकलता है, जो अपने हक के लिए खड़े होने का साहस जुटाते हैं। उनका कहना था कि समाज बदलने का काम हमेशा वही लोग करते हैं, जो मुश्किल समय में भी हार नहीं मानते।
झारखंड की पहचान सिर्फ खनिज नहीं, उसके वीर भी हैं
सीएम हेमंत सोरेन ने कहा कि झारखंड को सिर्फ उसके प्राकृतिक संसाधनों से नहीं जाना जाता। इस राज्य की सबसे बड़ी पहचान यहां के वीर सपूत हैं। इस मिट्टी ने ऐसे कई महानायक दिए, जिन्होंने अपने समाज और देश के लिए सब कुछ कुर्बान कर दिया। उन्होंने कहा कि ऐसे अवसर हमें सिर्फ श्रद्धांजलि देने के लिए नहीं, बल्कि यह याद करने के लिए भी मिलते हैं कि हम उनके बताए रास्ते पर कितना चल पा रहे हैं। अगर समाज में बराबरी, सम्मान और न्याय की बात होगी, तभी इन शहीदों को सच्ची श्रद्धांजलि मिलेगी।
बलिदान की लौ हमेशा जलती रहती है
अपने संबोधन में मुख्यमंत्री ने कहा कि क्रांति की आग कभी ठंडी नहीं पड़ती। उन्होंने दिल्ली के राजघाट और इंडिया गेट का उदाहरण देते हुए कहा कि वहां लगातार जलने वाला दीप हमें यह याद दिलाता है कि देश के लिए जान देने वालों का सम्मान कभी खत्म नहीं होता। उन्होंने कहा कि झारखंड के वीरों का इतिहास भी ऐसा ही है। उनके बलिदान की रोशनी आने वाली पीढ़ियों को हमेशा रास्ता दिखाती रहेगी।
हूल दिवस सिर्फ एक तारीख नहीं, एक सोच है
कार्यक्रम के अंत में मुख्यमंत्री ने लोगों से अपील की कि हूल दिवस को सिर्फ एक सरकारी आयोजन या कैलेंडर की तारीख बनाकर न देखें। यह दिन हमें याद दिलाता है कि जब समाज में अन्याय बढ़े, तब चुप रहने के बजाय आवाज उठानी चाहिए। सिदो-कान्हू, चांद-भैरव और फूलो-झानो का जीवन इसी साहस और संघर्ष का प्रतीक है।
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