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Ranchi : दरभंगा हाउस परिसर का बड़ा सा हॉल। कुर्सियों पर बैठे बुजुर्ग चेहरे, जिनमें से किसी के हाथ पर सालों से स्टेथोस्कोप थामने की लकीरें थीं, तो किसी की हथेलियों पर अस्पताल के वार्ड और गाड़ियों के स्टीयरिंग की मेहनत दर्ज थी। मौका था सीसीएल यानी सेंट्रल कोलफील्ड्स लिमिटेड से विदाई का। अगस्त के आखिरी दिन जब मुख्यालय से 6 और अलग-अलग कोलियरी क्षेत्रों से 126 यानी कुल 132 कर्मचारियों की विदाई की घड़ी आई, तो माहौल में एक अजीब सा ठहराव था। चेहरे पर काम से मुक्ति का सुकून भी था और बरसों के आशियाने जैसे दफ्तर को छोड़ने की टीस भी।
स्क्रीन पर जब चली पुरानी जिंदगी की रील
समारोह के बीच जब बत्तियां मद्धिम हुईं और स्क्रीन पर एक छोटी सी फिल्म चली, तो पूरा हॉल खामोश हो गया। पर्दे पर वही चेहरे थे, जो कभी भरी जवानी में सीसीएल के दफ्तरों, डिस्पेंसरी और खदानों में दाखिल हुए थे। उन्होंने कैमरे के सामने जब अपनी पुरानी बातें, साथियों के साथ हंसी-मजाक और मुश्किल दिनों की यादें बांटीं, तो हॉल में बैठे कई साथियों के रुमाल आंखों तक पहुंच गए। बगल में बैठे परिवार वाले अपने पिता, मां या जीवनसाथी के उस अनदेखे रूप को देख रहे थे, जिसने घर चलाने के लिए अपनी पूरी उम्र इस संस्थान को सौंप दी थी।
हर पद का अपना पसीना, सबका एक जैसा मान
मंच पर जब मुख्यालय के छह साथियों को बुलाया गया, तो पद का फासला कहीं गायब हो गया। वेलफेयर विभाग के महाप्रबंधक राजेश मोहन और दरभंगा हाउस डिस्पेंसरी के सीएमओ डॉ. राजीव कुमार जायसवाल जिस आदर से खड़े थे, उसी गरिमा के साथ गांधी नगर अस्पताल की मैट्रन सुनीता रवि और वार्ड परिचारक तुलसी केरकेट्टा भी मंच पर थीं। उत्खनन विभाग की गाड़ियों को सालों तक रफ्तार देने वाले ड्राइवर अबनिधर मुखर्जी और वित्त विभाग के फाइलों के बीच काम करने वाले गोवर्धन राम के चेहरे पर भी वही संतोष था। यह दृश्य बता रहा था कि कंपनी के पहिए को घुमाने में बड़े अफसर की कलम और वार्ड में दौड़ती परिचारिका का समर्पण दोनों बराबर थे।
रिटायरमेंट अंत नहीं, खुद को जीने का नया दौर
विदाई की इस भावुक बेला में निदेशक (मानव संसाधन) हर्ष नाथ मिश्र ने जब बोलना शुरू किया, तो उन्होंने दिल की बात कही। उन्होंने कहा कि आज आप काम से अलग जरूर हो रहे हैं, लेकिन यह किसी चीज का अंत नहीं है। अब वक्त है अपने परिवार, अपने शौक और अपने स्वास्थ्य को पूरा समय देने का। वहीं मुख्य सतर्कता अधिकारी पंकज कुमार ने कहा कि इन कर्मचारियों ने सिर्फ अपनी ड्यूटी पूरी नहीं की, बल्कि कंपनी की रीढ़ बनकर खड़े रहे। उनका यह लंबा अनुभव सीसीएल की दीवारों में हमेशा दर्ज रहेगा।
फूलों के गुलदस्ते और गले मिलकर दी गई विदाई
कार्यक्रम के अंत में जब शॉल ओढ़ाकर और स्मृति चिह्न देकर सभी को मंच से उतारा गया, तो साथी कर्मचारियों की कतार लग गई। किसी ने पैर छुए, तो किसी ने गले लगाकर कहा कि सर, कल से आपकी कमी बहुत खलेगी। परिवार के सदस्य अपने बुजुर्गों का हाथ थामे गर्व से मुस्कुरा रहे थे। एक लंबी, निष्ठावान और बेदाग पारी खेलकर जब ये 132 साथी अपने घरों की ओर लौटे, तो उनके हाथों में सिर्फ विदाई का तोहफा नहीं, बल्कि जिंदगी भर की अनमोल पूंजी और साथियों का बेपनाह प्यार था।
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