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Ramgarh (Dharmendra Pradhan) : कहते हैं कि अगर हौसलों में उड़ान हो, तो पैरों को रफ्तार मिलते देर नहीं लगती। कुछ ऐसा ही नजारा मंगलवार को रामगढ़ के गांधी मेमोरियल मुख्यमंत्री उत्कृष्ट प्लस विद्यालय के मैदान पर देखने को मिला। मौका था झारखंड शिक्षा परियोजना की तरफ से आयोजित दो दिवसीय ‘द्वितीय जिला स्तरीय लिटिल चैंप फुटबॉल प्रतियोगिता’ का। खेल के पहले ही दिन अंडर-12 बालिका वर्ग के मुकाबलों में गोला प्रखंड की छोटी-छोटी बेटियों ने मैदान पर वो कमाल कर दिखाया, जिसने हर किसी को तालियां बजाने पर मजबूर कर दिया। इन नन्हीं पिचों ने अपनी रफ्तार और समझदारी से जिला चैंपियन का ताज अपने सिर सजा लिया।
जब मैदान पर उतरा नन्हा जोश
मंगलवार की सुबह रामगढ़ का यह मैदान आम दिनों से अलग था। चारों तरफ बच्चों का शोर, रंग-बिरंगी जर्सियां और आंखों में जीतने का सपना लिए बेटियां नजर आ रही थीं। इस आयोजन का मकसद सिर्फ हार-जीत तय करना नहीं था, बल्कि इन सरकारी स्कूलों के बच्चों के भीतर छिपी खेल प्रतिभा को एक बड़ा मंच देना था। साथ ही, खेल-खेल में उन्हें अनुशासन, लीडरशिप और एक-दूसरे का साथ देना सिखाना था।
मैच शुरू होने से पहले जिला शिक्षा अधीक्षक खुशबू कुमारी, अनूप एम. केरकेट्टा, कुमार राज, सुलोचना कुमारी और स्कूल के प्रिंसिपल संतोष कुमार अनल ने मैदान पर जाकर सभी नन्हे खिलाड़ियों से हाथ मिलाया और उनका परिचय लिया। अधिकारियों ने बच्चों की पीठ थपथपाते हुए कहा कि मैदान पर जीतना जितना जरूरी है, उससे कहीं ज्यादा जरूरी खेल को खेल की भावना और अनुशासन के साथ खेलना है।

दुलमी बनाम पतरातू : जब सांसें थाम देने वाला हुआ पहला मुकाबला
टूर्नामेंट में जिले के छह अलग-अलग प्रखंडों की टीमों ने अपनी दावेदारी पेश की थी। हर टीम की नजर चमचमाती ट्रॉफी पर थी। उद्घाटन मैच दुलमी और पतरातू के बीच खेला गया। मुकाबला इतना कांटे का था कि तय समय तक दोनों में से कोई भी टीम गोल नहीं कर सकी। मैदान के बाहर खड़े दर्शक हर सेकेंड के साथ अपनी सांसें थामे बैठे थे। आखिर में मैच का फैसला करने के लिए ‘पेनल्टी शूटआउट’ (ट्राई-ब्रेकर) का सहारा लिया गया, जिसमें दुलमी की बच्चियों ने बाजी मार ली और सीधे फाइनल का टिकट पक्का कर लिया।
फाइनल का रोमांच : गोला की बेटियों का ‘मास्टरस्ट्रोक’
अब बारी थी उस महामुकाबले की, जिसका सबको इंतजार था। फाइनल में आमने-सामने थीं गोला और दुलमी की टीमें। दोनों ही टीमें जीत के इरादे से मैदान पर उतरी थीं। सीटी बजते ही मैच शुरू हुआ। गोला की लड़कियों ने शुरुआत से ही एक खास रणनीति के तहत खेलना शुरू किया। मैदान पर उनका आपसी तालमेल देखने लायक था—एक खिलाड़ी पास देती, तो दूसरी गोल पोस्ट की तरफ तेजी से दौड़ पड़ती।
दुलमी की टीम ने भी रोकने की पूरी कोशिश की, लेकिन गोला की लड़कियों के आक्रामक खेल के आगे उनकी एक न चली। गोला की टीम ने शानदार खेल दिखाते हुए 1-0 की बढ़त बना ली और इसी स्कोर के साथ मैच जीतकर विजेता की ट्रॉफी अपने नाम कर ली। जैसे ही फाइनल की आखिरी सीटी बजी, गोला की बेटियां खुशी से झूम उठीं।
मेडल चमके, तो खिल उठे चेहरे
मैच खत्म होने के बाद जब पुरस्कार वितरण समारोह हुआ, तो पूरा मैदान तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा। विजेता गोला की टीम और उपविजेता दुलमी की टीम के खिलाड़ियों को जब मंच पर बुलाकर चमचमाती ट्रॉफी, मेडल और सर्टिफिकेट दिए गए, तो नन्हीं बच्चियों के चेहरे की खुशी देखने लायक थी। मेडल गले में लटकते ही इन बच्चियों का आत्मविश्वास सातवें आसमान पर था।
अधिकारी की सीख- “मैदान भी संभालो और क्लास भी”
इस मौके पर जिला शिक्षा अधीक्षक खुशबू कुमारी ने बच्चों को जीवन का एक बड़ा मंत्र दिया। उन्होंने कहा कि खेल सिर्फ मनोरंजन नहीं है, बल्कि यह बच्चों के शरीर, दिमाग और सोचने की क्षमता को मजबूत बनाता है। उन्होंने बेहद सरल शब्दों में बच्चों से कहा, “मैदान पर जितने मन से फुटबॉल को किक मारते हो, उतने ही ध्यान से क्लास में पढ़ाई भी करो। क्योंकि जीवन की रेस में आगे बढ़ने के लिए खेल और पढ़ाई, दोनों के पहिये मजबूत होने चाहिए।” उन्होंने यह भी बताया कि लड़कियों के इस शानदार मुकाबले के बाद, बुधवार को इसी मैदान पर लड़कों (अंडर-12 बालक वर्ग) के बीच जोरदार टक्कर देखने को मिलेगी।
पर्दे के पीछे के हीरो : गुरुजनों की मेहनत लाई रंग
इस पूरे दो दिवसीय आयोजन को सफल बनाने के पीछे स्कूल के शिक्षकों और स्टाफ की कड़ी मेहनत थी, जिन्होंने धूप और भागदौड़ के बीच व्यवस्था को चाक-चौबंद रखा। इनमें मिथलेश कुमार रविदास, शेखर कुमार, कुलदीप कुमार, तेजू मुंडा, दीपक सिंह, धर्मजीत सिंह चौहान, आदित्य कुमार, मो मुस्तकीम, रामप्रकाश महतो और धीरज पाठक जैसे शिक्षकों ने दिन-रात एक कर दिया।
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