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Ranchi : मोरहाबादी मैदान की हवा में इस बार सिर्फ ठंडक और बारिश की नमी नहीं थी, बल्कि उसमें मिट्टी की सोंधी खुशबू, दीयों की गर्माहट और अपने पैरों पर खड़ी होती महिलाओं का अटूट हौसला घुला हुआ था। आसमान में बादल छाए रहे, फुहारें पड़ीं और मौसम ने कई बार आंखें तरेरीं, लेकिन जब बात उम्मीदों के बाजार की हो तो मौसम की बंदिशें बेअसर साबित होती हैं। जेसोवा दीपावली मेले के छह दिनों का सफर सिर्फ एक कारोबारी आयोजन नहीं रहा, बल्कि यह बदलते झारखंड की उस तस्वीर का गवाह बना जहां गांव की पगडंडियों से निकला हुनर सीधे शहर के दिल में दस्तक दे रहा था। इस पूरे ताने-बाने को एक धागे में पिरोने वालीं जेसोवा अध्यक्ष प्रीति कुमार के चेहरे पर समापन के दिन वही सुकून और चमक साफ देखी जा सकती थी, जो किसी बड़े सामाजिक मिशन के पूरा होने पर दिखती है।
प्रीति कुमार का विजन- महिलाओं को ताकतवर बनाना है
समापन की शाम जब मेले के मंच से बात निकली, तो प्रीति कुमार ने बेहद सीधे और दिल को छू लेने वाले अंदाज में इस पूरे आयोजन का फलसफा सामने रख दिया। उन्होंने कहा कि अक्सर लोग इसे सिर्फ एक मेला मान लेते हैं, जहां आइए, घूमिए और खरीदारी कर घर लौट जाइए। लेकिन हमारे लिए यह बाजार नहीं, बदलाव की एक नई शुरुआत है। समाज के उस कोने तक पहुंचना हमारी प्राथमिकता है, जहां हुनर तो भरपूर है लेकिन उसे तराशने और दुनिया के सामने लाने वाला कोई मंच नहीं मिलता।
प्रीति कुमार ने इस बात पर जोर दिया कि जब तक हमारी महिलाएं आर्थिक रूप से अपने फैसले खुद लेने लायक नहीं बनेंगी, तब तक समाज के सशक्त होने की बात अधूरी रहेगी। गांव की किसी दीदी का हाथ से बनाया सामान जब शहर का कोई परिवार बड़े चाव से अपने ड्राइंग रूम में सजाता है, तो वह सिर्फ एक सामान की बिक्री नहीं होती, बल्कि उस महिला के स्वाभिमान की जीत होती है। छह दिनों तक खुद मैदान में डटकर एक-एक स्टॉल और व्यवस्थाओं पर नजर रखने वालीं प्रीति कुमार ने अपनी पूरी टीम और रांची के लोगों का दिल खोलकर शुक्रिया अदा किया, जिन्होंने खराब मौसम के बीच भी इन मेहनतकश हाथों का साथ नहीं छोड़ा।
कश्मीर की पश्मीना से लेकर JSLPS की दीदियों के हुनर की चमक
मेले के गलियारों में घूमते हुए साफ नजर आ रहा था कि देश की विविधता कैसे एक मैदान में सिमट आई थी। एक तरफ कश्मीर से आए बुनकर अपनी गर्म पश्मीना शॉल और फेरन की गर्माहट लिए बैठे थे, तो दूसरी तरफ उत्तराखंड की पारंपरिक जड़ी-बूटियां और हस्तशिल्प लोगों को अपनी ओर खींच रहे थे। लेकिन मेले का असली दिल धड़का जेएसएलपीएस की स्वयं सहायता समूह की दीदियों के स्टॉल्स पर। उनके हाथों से बने शुद्ध मसाले, देसी आचार, बांस की टोकरियां और मिट्टी के खूबसूरत दीये देखते ही देखते बिक गए। कई महिलाओं के लिए यह पहला मौका था जब वे सीधे ग्राहकों से मोलभाव कर रही थीं और अपने मुनाफे का हिसाब अपनी डायरी में दर्ज कर रही थीं। वहीं जेरेडा जैसी संस्थाओं ने सरकारी योजनाओं की जानकारी देकर लोगों को जागरूक किया, तो स्कूली बच्चों की टोलियों ने यहां आकर जाना कि देश की माटी में कितना हुनर बसा है।
2600 दीपों की जगमगाहट, महिला बैंड की धुन और 26 साल का भरोसा
मेले का आखिरी दिन किसी त्योहार से कम नहीं था। जैसे ही शाम ढली, मोरहाबादी के विशाल परिसर में एक साथ 2,600 दीये रोशन कर दिए गए। दीपों की कतारों से निकली सुनहरी रोशनी ने पूरे मैदान को उजाले से भर दिया, मानो यह संदेश दे रही हो कि हर घर में उम्मीद का एक चिराग जरूर जलना चाहिए। इसके फौरन बाद जब महिला रॉक बैंड ‘अद्वितीय’ की कलाकारों ने मंच संभाला, तो उनकी गिटार की धुनों और ड्रम की थाप ने युवाओं से लेकर बुजुर्गों तक को झूमने पर मजबूर कर दिया।
यह आयोजन जेसोवा के 26 साल पूरे होने का भी गवाह बना। इस ऐतिहासिक पड़ाव और मेले की शानदार कामयाबी की खुशी में प्रीति कुमार और उनकी पूरी टीम ने मंच पर केक काटकर एक-दूसरे का मुंह मीठा कराया। छह दिनों की थकान पलों में काफूर हो चुकी थी और हर चेहरे पर बस एक ही बात तैर रही थी कि जब समाज मिलकर किसी हुनरमंद हाथ को थाम लेता है, तो रोशनी का दायरा अपने आप बढ़ जाता है।
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