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Home » भाषा के रंग, दोस्ती की खुशबू : डीपीएस पाकुड़ ने याद दिला दिया बीता वक्त
झारखंड

भाषा के रंग, दोस्ती की खुशबू : डीपीएस पाकुड़ ने याद दिला दिया बीता वक्त

December 9, 2025No Comments3 Mins Read
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डीपीएस
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अपनी मनपसंद भाषा में पढ़ें :

Pakur (Jaydev Kumar) : डीपीएस पाकुड़ का माहौल सुबह से कुछ अलग ही था। गलियारों में बच्चों की धीमी आवाजें, क्लासरूम में फैलता उत्साह और मेजों पर बिखरी रंग-बिरंगी स्टेशनरी उस पुराने दौर की तस्वीर बना रही थीं, जब चिट्ठियां ही सबसे सच्चा संवाद थीं। भाषा उत्सव 2025 के पांचवें दिन स्कूल में बंधु पत्र दिवस और विभिन्न भाषाओं में कहानी श्रृंखला दिवस मनाया गया, और दोनों गतिविधियों ने बच्चों को एक साथ कई भावनाओं से जोड़ दिया।

जब बच्चों ने पहली बार महसूस की चिट्ठी लिखने की खुशी

आज की डिजिटल दुनिया में बच्चों के हाथ में पेन पकड़कर पत्र लिखना अपने-आप में एक खास अनुभव था। कक्षा छह से ग्यारह के छात्र अपनी भाषा चुनते, शब्द ढूंढते और फिर धीरे-धीरे अपने मित्र के नाम पत्र लिखते नजर आए। किसी ने अपनी मातृभाषा ली, किसी ने वह भाषा चुनी जो उसने घर के किसी बड़े से सुनी थी। एक छात्रा ने मुस्कुराते हुए कहा, “मैम, मैंने पहली बार अपने दोस्त को पत्र लिखा। ऐसा लगा जैसे मैं अपनी बातें किसी के दिल तक पहुंचा रही हूं, सिर्फ स्क्रीन पर टाइप नहीं कर रही।” उनकी यह मासूम खुशी देखकर शिक्षक भी खुद को उन दिनों में पाते रहे जब वे खुद दोस्तों को लंबी चिट्ठियां लिखते थे।

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अलग-अलग भाषाओं में एक ही भावना

दूसरी गतिविधि और भी रोचक थी। बच्चों ने “जहां भाषा है वहां संस्कृति है” विषय पर कहानी आगे बढ़ाई। कोई हिंदी में शुरू करता, दूसरा बंगाली में जोड़ता, फिर कोई मराठी में आगे बढ़ाता। अलग-अलग शब्दों वाला यह सफर एक ही भाव में मिलकर चलता रहा। क्लास में जब “चतुर गौरैया” की कहानी सभी भाषाओं में सुनाई गई, तो बच्चों की आंखों में आश्चर्य था। वे समझ रहे थे कि चाहे नाम बदल जाए, लहजा बदल जाए, कहानी और उसके संस्कार एक ही रहते हैं। चतुर गौरैया को हर भारतीय भाषा में बोला गया।

  1. अंग्रेजी में : द क्लेवर स्परो
  2. बंगाली : चालक चोरबिया
  3. गुजराती : होशियार चिड़ी
  4. पंजाबी : होशियार चिरी
  5. तमिल : कल्लाना कुईल
  6. तेलुगु  तीशी मांडू गोररेपक्षी
  7. कन्नड़ : ताँतारी गुब्बाची
  8. मराठी : चतुर चिमनी
  9. मलयालम : थलावनाया कुरुविक
  10. ओड़िया : चालाकी गुबुकुड़ी
  11. असमिया : हुशियार सोराई
  12. उर्दू : ज़ाहिन चिड़िया

भाषा सिर्फ सीखने का नहीं, जोड़ने का पुल : निदेशक

स्कूल के निदेशक अरुणेंद्र कुमार बच्चों को देखकर भावुक हो उठे। उन्होंने कहा कि भाषा उत्सव सिर्फ गतिविधि नहीं, बच्चों के दिल और सोच को जोड़ने का माध्यम है। उन्होंने बताया कि मंत्रालय और सीबीएसई की यह पहल बच्चों को रटने वाली पढ़ाई से निकालकर असली सीख की ओर ले जाती है। उनके शब्दों में, “यह उत्सव बच्चों में सांस्कृतिक समझ बढ़ाएगा। जब बच्चा किसी भाषा को सीखता है, तो वह उस भाषा के लोगों को भी समझने लगता है। यही एक भारत श्रेष्ठ भारत की भावना है।”

प्रधानाचार्य ने समझाया सीख का असली अर्थ

प्रधानाचार्य जी.के. शर्मा ने कहा कि भाषा सीखना सिर्फ व्याकरण तक सीमित नहीं, बल्कि नजरिया बदलने वाला अनुभव है। उन्होंने बताया कि ऐसे आयोजनों से बच्चों में शब्द बढ़ते हैं, अभिव्यक्ति मजबूत होती है और ज्ञान वास्तविक बनता है।

वो दिन जिसने बच्चों को एहसास कराया कि भाषा दिलों को जोड़ती है

दिन के अंत में, जब बच्चे अपने पत्रों को मोड़कर लिफाफे में भर रहे थे, तो उनके चेहरों पर एक अलग ही आत्मीयता थी। कहानी श्रृंखला की गतिविधि ने उन्हें यह भी सिखाया कि भारत का असली सौंदर्य उसकी भाषाओं में बसता है।

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