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Home » बच्चा हारकर बोले ‘मुझे कुछ नहीं आता’, तो न डांटें, ऐसे बढ़ाएं उसका हौसला
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बच्चा हारकर बोले ‘मुझे कुछ नहीं आता’, तो न डांटें, ऐसे बढ़ाएं उसका हौसला

August 8, 2026No Comments4 Mins Read
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अपनी मनपसंद भाषा में पढ़ें :

News Samvad : बच्चों का मन बहुत कोमल होता है। छोटी सी बात भी कई बार उनके लिए बड़ी बन जाती है। स्कूल में ड्रॉइंग कॉम्पिटिशन हो या खेल का मुकाबला, बच्चा पूरी मेहनत से हिस्सा लेता है। उसे उम्मीद होती है कि उसका नाम विजेताओं में जरूर आएगा। लेकिन जब ऐसा नहीं होता तो वह मायूस हो सकता है। कई बच्चे तो घर आकर यह तक कह देते हैं, ‘मुझे तो कुछ आता ही नहीं।’ ऐसे में माता-पिता का भी मन दुखी हो जाता है। लेकिन यही वह समय है जब बच्चे को संभालने के साथ उसे जिंदगी की एक जरूरी सीख दी जा सकती है। उसे समझाया जा सकता है कि हर बार जीतना जरूरी नहीं है। कभी सफलता मिलती है तो कभी असफलता। असफलता से निराश होने के बजाय उससे सीख लेकर आगे बढ़ना ही असली बात है। माता-पिता का प्यार, धैर्य और सही व्यवहार बच्चे को धीरे-धीरे मुश्किल हालात से निपटना सिखा सकता है।

हर जिद तुरंत पूरी करने की आदत न डालें

कई माता-पिता बच्चे की हर मांग तुरंत पूरी कर देते हैं। इससे बच्चे को हर चीज तुरंत पाने की आदत हो सकती है। इसलिए छोटी उम्र से ही उसे इंतजार करना सिखाना जरूरी है। मसलन, बच्चा कोई खिलौना मांग रहा है तो उसे तुरंत खरीदने के बजाय कह सकते हैं कि इसे अपनी बर्थडे विशलिस्ट में लिख लो। इससे बच्चा समझेगा कि हर चीज तुरंत नहीं मिलती और कुछ चीजों के लिए इंतजार भी करना पड़ता है। इसी तरह प्रतियोगिता में हारने पर बच्चे को यह न कहें कि ‘तुमसे तो कुछ होता ही नहीं।’ इसके बजाय उससे पूछें कि उसने प्रतियोगिता के लिए कितनी मेहनत की और अगली बार वह क्या बेहतर कर सकता है। उसे बताएं कि हार जाना उसकी क्षमता का प्रमाण नहीं है। एक प्रतियोगिता का परिणाम यह तय नहीं करता कि बच्चा कितना अच्छा या कितना प्रतिभाशाली है। बच्चे की मेहनत पर ध्यान देना भी बहुत जरूरी है। अगर वह किसी विषय में पहले से थोड़ा बेहतर कर रहा है या उसने किसी काम को पूरा करने के लिए मेहनत की है तो उसकी तारीफ करें। इससे उसे समझ आएगा कि केवल नतीजा ही महत्वपूर्ण नहीं है, कोशिश भी मायने रखती है।

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समस्या आए तो तुरंत समाधान न बताएं

जब बच्चा किसी परेशानी में हो तो माता-पिता अक्सर तुरंत उसकी मदद करने लगते हैं। यह स्वाभाविक है, लेकिन हर छोटी समस्या का हल खुद बता देना बच्चे को आत्मनिर्भर बनने से रोक सकता है। अगर वह कहता है कि स्कूल का कोई काम बहुत मुश्किल है तो तुरंत उसका जवाब बताने के बजाय उससे पूछें, ‘तुम्हें क्या लगता है, इसे कैसे आसान किया जा सकता है?’ इस तरह बच्चा खुद सोचने और रास्ता निकालने की कोशिश करेगा। शुरुआत में वह गलती कर सकता है, लेकिन धीरे-धीरे उसमें अपनी समस्याओं को सुलझाने का भरोसा आएगा। माता-पिता जरूरत पड़ने पर उसका मार्गदर्शन जरूर करें, लेकिन हर कदम पर उसके लिए फैसला न लें। बच्चे को अपनी भावनाओं को समझना भी सिखाएं। हारने के बाद गुस्सा आना, रोना या दुखी होना गलत नहीं है। उससे कहें कि वह अपनी बात खुलकर बता सकता है। उसे यह समझने में मदद करें कि वह गुस्सा, दुख या निराशा क्यों महसूस कर रहा है और इन भावनाओं को सही तरीके से कैसे व्यक्त किया जा सकता है।

दूसरे बच्चों से तुलना करने से बचें

माता-पिता को बच्चे की तुलना उसके भाई-बहन, दोस्त या क्लास के किसी दूसरे बच्चे से नहीं करनी चाहिए। ‘देखो, वह कितने अच्छे नंबर लाता है’ या ‘तुम उससे क्यों नहीं सीखते’ जैसी बातें बच्चे के मन में हीन भावना पैदा कर सकती हैं। हर बच्चे की अपनी क्षमता और अपनी गति होती है। इसलिए उसकी कमियों के बजाय उसकी खूबियों पर ध्यान देना ज्यादा जरूरी है। बच्चे को मजबूत बनाने के लिए माता-पिता को खुद भी उदाहरण बनना होगा। बच्चे सिर्फ वही नहीं सीखते जो उन्हें बताया जाता है, बल्कि वह भी सीखते हैं जो वे घर में होते हुए देखते हैं। अगर माता-पिता किसी मुश्किल परिस्थिति में धैर्य रखते हैं, गलती होने पर खुद को संभालते हैं और समस्या का समाधान ढूंढते हैं, तो बच्चा भी धीरे-धीरे यही व्यवहार सीखता है। बच्चे को तनाव और निराशा से निपटना सिखाना एक दिन का काम नहीं है। इसमें समय लगता है। कभी वह तुरंत समझेगा और कभी बार-बार वही गलती करेगा। ऐसे में डांटने के बजाय प्यार से समझाना ज्यादा असरदार होता है। माता-पिता अगर बच्चे को यह भरोसा देते रहें कि हार या गलती के बाद भी वे उसके साथ हैं, तो बच्चा मुश्किल परिस्थितियों से घबराने के बजाय उनका सामना करना सीखता है। यही आत्मविश्वास आगे चलकर उसे जिंदगी के बड़े उतार-चढ़ाव से निपटने में मदद करता है।

इसे भी पढ़ें : नौकरीपेशा माता-पिता को बड़ी राहत, बच्चों की देखभाल की जिम्मेदारी अब कंपनी की भी

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