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Ranchi : रांची के कांटाटोली की शांत दोपहर में होटल जेनेस्टी-इन का हॉल आज अलग ही ऊर्जा से भरा था। मंच पर बैठे अधिकारी और सामाजिक कार्यकर्ता तो थे ही, लेकिन असल बात उन आवाजों की थी जो गांव की लड़कियों की अनकही कहानियों को सामने ला रही थीं। इन्हीं कहानियों को बदलने की कोशिश में रांची जिला विधिक सेवा प्राधिकरण और स्पार्क एनजीओ ने मिलकर बाल विवाह रोकथाम पर एक खास कार्यक्रम आयोजित किया।
बाल विवाह निगल जाता है भविष्य
डिप्टी एलएडीसी राजेश कुमार सिन्हा ने जब बोलना शुरू किया, तो उनका फोकस किसी किताब के पन्नों पर नहीं, बल्कि उन बच्चियों पर था जो समय से पहले शादी के बोझ तले अपने सपने खो देती हैं। उन्होंने कहा कि बाल विवाह सिर्फ एक परंपरा नहीं, एक ऐसा चक्र है जो बच्चों का बचपन, उनका स्वास्थ्य और उनका भविष्य निगल लेता है। सिन्हा ने 11-12 साल की उम्र में स्कूल छोड़ने पर मजबूर हुई कई बच्चियों की वास्तविक कहानियों का जिक्र किया, जो शादी के बाद न तो पढ़ाई जारी रख सकीं, न ही अपनी इच्छाओं को आवाज दे सकीं।
ग्रामीण इलाकों में अब भी जागरूकता की कमी
कार्यक्रम में मौजूद पीएलवी और एनजीओ प्रतिनिधि बताते हैं कि ग्रामीण इलाकों में जागरूकता की कमी अब भी सबसे बड़ी समस्या है। कई परिवार अभी भी इसे ‘परंपरा’ मानते हैं, जबकि बच्चों की जिंदगी पर इसका असर उन्हें समझ नहीं आता। इसी वजह से डालसा नुक्कड़ नाटक, गांव-गांव बैठकों और पंचायत स्तर पर कानूनी जानकारी के जरिए लोगों तक पहुंच बनाने की कोशिश कर रहा है।
राजेश सिन्हा ने बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम 2006 के प्रावधानों की जानकारी देते हुए कहा कि कानून सिर्फ सजा देने का माध्यम नहीं, बल्कि एक सुरक्षा कवच है, जो हर बच्चे को अपनी जिंदगी का फैसला खुद करने का अधिकार देता है। उन्होंने झारखंड कंपलसरी रजिस्ट्रेशन ऑफ मैरिज एक्ट 2017 का भी जिक्र किया और साफ कहा कि शादी चाहे आज हो या कई साल पहले, उसका पंजीकरण कराना बेहद जरूरी है। इससे न सिर्फ कानूनी लाभ मिलते हैं, बल्कि आने वाले समय में विवादों और शोषण की आशंकाएं भी कम होती हैं।
स्पेशल मैरिज एक्ट और हिंदू मैरिज एक्ट के प्रावधान, कोर्ट मैरिज और रजिस्ट्रेशन मैरिज की पूरी प्रक्रिया भी समझाई गई, ताकि लोग जानकारी के अभाव में गलत कदम न उठाएं। नालसा की योजना ‘आशा’ का जिक्र करते हुए सिन्हा ने कहा कि यह योजना बाल विवाह से जुड़ी हर चुनौती पर काम करने के लिए बनाई गई है।
स्पार्क एनजीओ के कोऑर्डिनेटर मो. शमशाद ने पंचायत स्तर पर विवाह पंजीकरण की आवश्यकता पर जोर दिया। उनका कहना था कि जब तक रजिस्ट्रेशन गांव-गांव की प्रक्रिया नहीं बनती, तब तक बाल विवाह को पूरी तरह रोक पाना मुश्किल है।
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