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Hazaribagh : बड़कागांव के सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में शुक्रवार की सुबह सामान्य दिनों जैसी नहीं थी। अस्पताल के बरामदे में बैठे लोग एक-दूसरे से धीमी आवाज में बात कर रहे थे। कोई अपने किट की थैली को कसकर पकड़े था, तो कोई डॉक्टर की कही बातों को मन ही मन दोहरा रहा था। यह भीड़ किसी इलाज के लिए नहीं आई थी, बल्कि उम्मीद लेकर पहुंची थी। उम्मीद कि शायद आज से उनका रास्ता थोड़ा आसान हो जाए।
इनके बीच करीब 32 साल की एक महिला ऐसी थी, जिसके पति गुजरे दो सालों से टीबी से जूझ रहे हैं और अभी भी दवा पर हैं। घर में कमाने वाला अब बीमार है, तो खर्च और मुश्किलें दोनों बढ़ गईं। सरिता की आंखों में लगातार चिंता झलकती है, लेकिन आज उनके चेहरे पर थोड़ा सुकून था। हाथ में पकड़ी पोषण किट को देख वह बोलीं, “दवा तो चल ही रहा है, पर खाना अच्छी तरह देना मुश्किल हो जाता था। ये किट मिल गई, तो अब थोड़ा सहारा होगा।”
यही कहानी पास में बैठे करीब 38 साल के एक शख्स की भी है। मजदूरी कर परिवार चलाने वाले रमेश पिछले छह महीने से टीबी की दवा ले रहे हैं। कमजोरी इतनी बढ़ गई कि काम पर जाना भी मुश्किल हो गया। रमेश ने किट उठाते हुए कहा, “पहले लगता था ठीक होने में बहुत समय लगेगा। डॉक्टर बोले हैं कि खाना ठीक मिलेगा तो जल्दी असर होगा। बस अब दवा और इस किट की मदद से ठीक हो जाऊं, यही सोच रहा हूं।”
डॉक्टर इंदरजीत ने किया मार्गदर्शन
यह सिर्फ दो लोगों की बात नहीं, बल्कि उन 80 मरीजों की राहत की तस्वीर है जिन्हें अदाणी फाउंडेशन ने पोषण किट दी। गोंदुलपारा परियोजना के तहत चल रहे इस कार्यक्रम में हर मरीज को खाद्य सामग्री से भरी टोकरी दी गई। इसमें दाल, चावल, पोहा, तेल और अन्य ऐसे सामान शामिल हैं जो शरीर को ताकत देने में मदद करते हैं। शिविर का माहौल एक तरह से परिवार जैसा था। डॉक्टर इंदरजीत बार-बार समझा रहे थे, “दवा समय पर लीजिए, भोजन ठीक रखिए और जांच नहीं छोड़िए। टीबी ठीक होती है, बस हिम्मत नहीं छोड़नी चाहिए।” उनके शब्द मरीजों के लिए सलाह से ज्यादा भरोसा थे।
अदाणी फाउंडेशन के अधिकारी बोले…
कार्यक्रम में आए कई लोगों ने कहा कि बीमारी जितनी शारीरिक लड़ाई है, उससे बड़ी आर्थिक लड़ाई भी है। खासकर उन परिवारों के लिए जो रोज कमाते और रोज खाते हैं। ऐसे में पोषण किट सिर्फ सामान का पैकेट नहीं, बल्कि बीमारी से जूझ रहे लोगों के लिए राहत की सांस है। अदाणी फाउंडेशन के अधिकारी बताते हैं कि यह सिर्फ एक दिन की मदद नहीं, बल्कि एक लगातार चल रहा प्रयास है। इलाके में स्वास्थ्य शिविर, पोषण सहायता, स्वच्छता और शिक्षा पर भी काम हो रहा है ताकि गांव का हर परिवार बेहतर जिंदगी जी सके।
शिविर खत्म होने के बाद जब लोग अपने घरों को लौट रहे थे, उनके कदम पहले से हल्के दिख रहे थे। बीमारी अभी भी है, संघर्ष भी है, लेकिन आज उन्हें एक छोटी ही सही, लेकिन जरूरी मदद मिली है। और कई बार, ठीक होने की शुरुआत इसी भरोसे से होती है कि कोई हमारे साथ खड़ा है।
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