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Home » पत्रकार से जनसेवक बनने की राह पर सीमा कच्छप, वार्ड 53 से भरा पर्चा
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पत्रकार से जनसेवक बनने की राह पर सीमा कच्छप, वार्ड 53 से भरा पर्चा

February 5, 2026No Comments4 Mins Read
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Ranchi (Om Prakash) : सालों तक हाथ में माइक और कैमरा लेकर लोगों के दुख-दर्द को दुनिया तक पहुंचाने वाली सीमा कच्छप आज एक नई भूमिका में सामने हैं। वार्ड संख्या 53 से नामांकन दाखिल करते वक्त उनके चेहरे पर आत्मविश्वास था, लेकिन आंखों में अब भी वही संवेदनशीलता झलक रही थी, जो एक पत्रकार की पहचान होती है। यह सिर्फ एक नामांकन नहीं था। यह उस संघर्ष की शुरुआत थी, जो उन्होंने वर्षों तक दूसरों की आवाज बनकर जिया है।

जब खबरें बनती रहीं, लेकिन हालात नहीं बदले

सीमा कच्छप ने अपने पत्रकारिता जीवन में सैकड़ों खबरें कीं। कहीं सड़क टूटी थी, कहीं पानी नहीं था, कहीं बुजुर्ग पेंशन के लिए भटक रहे थे, तो कहीं बच्चे अंधेरे में पढ़ाई कर रहे थे। वह बताती हैं, “हम खबर तो दिखाते थे, अधिकारी बयान दे देते थे, लेकिन कुछ दिन बाद सब वैसा ही रह जाता था।” हर अधूरी समस्या उन्हें भीतर तक परेशान करती थी। उन्हें लगता था कि कहीं न कहीं व्यवस्था में कुछ कमी है, जिसकी वजह से आम आदमी की आवाज दब जाती है।

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बांस के खंभों पर टिकी उम्मीदें

वार्ड 53 के कई इलाकों में आज भी लोग बांस के सहारे बिजली की तार खींचे हुए हैं। बारिश हो या तेज हवा, हर वक्त हादसे का डर बना रहता है। सीमा याद करती हैं, “एक मां ने मुझसे कहा था, दीदी, रात में डर लगता है कि कहीं करंट न लग जाए। बच्चों को मोमबत्ती में पढ़ाना पड़ता है।” वह दृश्य आज भी उनके मन में ताजा है। शायद वही पल उनके भीतर बदलाव का बीज बो गया।

बसारगढ़ : जो चुनाव में शामिल, सुविधा में बाहर

बसारगढ़ इलाका वर्षों से उपेक्षा का शिकार रहा है। वोट के समय यह नगर निगम क्षेत्र बन जाता है, लेकिन विकास के समय इसे बाहर कर दिया जाता है। यह दोहरापन वहां के लोगों को सबसे ज्यादा चुभता है। एक बुजुर्ग कहते हैं, “हम वोट भी देते हैं, टैक्स भी देते हैं, फिर भी हमें कहा जाता है कि आप सीमा में नहीं आते।” सीमा ने इस दर्द को नजदीक से महसूस किया है।

जब पत्रकार का दिल राजनीति से टकराया

सीमा कहती हैं, “मैं हमेशा सोचती थी कि मेरा काम सवाल पूछना है, जवाब देना नहीं। लेकिन एक दिन लगा कि सिर्फ सवाल से पेट नहीं भरता, न सड़क बनती है, न नल से पानी आता है।” यहीं से उनके मन में एक नया विचार जन्मा। अगर व्यवस्था नहीं सुन रही, तो क्यों न उसी व्यवस्था का हिस्सा बनकर बदलाव लाया जाए। यह फैसला आसान नहीं था। पत्रकारिता छोड़कर राजनीति में आना जोखिम भरा था। आलोचना होगी, शक होंगे, सवाल उठेंगे। लेकिन उन्होंने डर से ज्यादा भरोसा चुना।

जनता के बीच से निकली, जनता के लिए लड़ी

नामांकन के दिन उनके साथ कोई बड़ा काफिला नहीं था। न ढोल, न शोर। बस कुछ समर्थक और बहुत सारी उम्मीदें। महिलाएं, बुजुर्ग, युवा सभी उन्हें देखने आए थे। कोई कह रहा था, “कम से कम हमारी बात सुनने वाली तो आएगी।” यही विश्वास उनकी सबसे बड़ी पूंजी है।

अब खबर नहीं, बदलाव लिखना चाहती हैं सीमा

सीमा कच्छप आज खुद को नेता नहीं, सेवक मानती हैं। वह कहती हैं,
“मैं अब खबर नहीं लिखना चाहती, मैं बदलाव लिखना चाहती हूं, लोगों की जिंदगी में।” उनका सपना है कि वार्ड 53 में हर घर तक बिजली पहुंचे, हर गली पक्की हो, हर बच्चे को बेहतर माहौल मिले।

एक नई उम्मीद का नाम : सीमा कच्छप

सीमा की कहानी सिर्फ चुनाव लड़ने की नहीं है। यह उस आम लड़की की कहानी है, जिसने माइक से शुरुआत की और अब जिम्मेदारी तक पहुंचने का साहस किया। शायद यही लोकतंत्र की असली ताकत है।
जहां सवाल पूछने वाली खुद जवाब बन जाए। जहां रिपोर्टर जनप्रतिनिधि बनकर जनता की तकदीर लिखने निकले। वार्ड 53 की गलियों में आज एक नई उम्मीद घूम रही है। नाम है… सीमा कच्छप।

इसे भी पढ़ें : दूसरी शादी की चाह में बीवी को दे दी खौफनाक मौत… जानें

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