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Home » ‘लाल आतंक’ की रीढ़ टूटी, एक करोड़ के इनामी सहित 17 खूंखार नतमस्तक
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‘लाल आतंक’ की रीढ़ टूटी, एक करोड़ के इनामी सहित 17 खूंखार नतमस्तक

February 22, 2026No Comments3 Mins Read
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देवजी
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News Samvad : जंगल, गोलियों की गूंज और हर वक्त मौत का साया… यही दुनिया थी तिप्पिरी तिरुपति उर्फ देवजी की। वही देवजी, जिसका नाम सुनते ही कभी सुरक्षाबलों की पेशानी पर बल पड़ जाते थे और गांवों में खामोशी छा जाती थी। लेकिन आज यानी 22 फरवरी को कहानी ने ऐसा मोड़ लिया, जिसकी उम्मीद शायद किसी को नहीं थी। करोड़ों का इनामी और नक्सली संगठन के शीर्ष नेताओं में शुमार देवजी ने आखिरकार हथियार डाल दिए और वह भी इंसान बनने की एक नई कोशिश के साथ।

जब ताकत बोझ बन जाती है

नक्सली संगठन में देवजी का नाम ताकत, रणनीति और खौफ का प्रतीक था। मिलिट्री इंटेलिजेंस विंग का प्रमुख, सीएमसी का इंचार्ज, पोलित ब्यूरो का सदस्य और हाल ही में महासचिव, ये तमगे किसी आम इंसान को नहीं मिलते। लेकिन इसी ऊंचाई पर खड़ा होना देवजी के लिए धीरे-धीरे बोझ बनता चला गया। लगातार भागना, ठिकाने बदलना, भरोसे की कमी और हर नए दिन के साथ बढ़ता डर… यह सब उसे अंदर ही अंदर तोड़ रहा था। बताया जाता है कि वह महीनों से यह सवाल खुद से पूछ रहा था… “क्या यही जिंदगी है?”

गांव, परिवार और छूटता हुआ इंसान

करीमनगर का रहने वाला देवजी कभी एक साधारण परिवार का हिस्सा था। गांव, रिश्ते, त्योहार और सामान्य जिंदगी ये सब उसके अतीत का हिस्सा रहे हैं। संगठन की जिम्मेदारियों और हिंसा के लंबे दौर में वह इंसान कहीं पीछे छूट गया। कई बार अपने साथियों की मौत, आम ग्रामीणों का डर और बच्चों की आंखों में दिखता सन्नाटा उसे चुपचाप कचोटता रहा। यही वजह है कि जब मौका मिला, तो उसने ताकत की बजाय इंसानियत को चुना।

जंगल में हुआ फैसला

22 फरवरी को तेलंगाना के असीफाबाद इलाके के जंगलों में जो हुआ, वह सिर्फ एक सरेंडर नहीं था। यह एक मानसिक हार नहीं, बल्कि जिंदगी को फिर से शुरू करने की कोशिश थी। देवजी के साथ मल्ला राजी रेड्डी समेत 16 नक्सलियों ने भी हथियार डाले। ये वे लोग थे, जिन्होंने बरसों जंगलों में बिताए, लेकिन अब उन्हें भी लगा कि यह रास्ता सिर्फ मौत की ओर ले जाता है। सुरक्षा एजेंसियों के मुताबिक, आत्मसमर्पण के वक्त किसी तरह की हड़बड़ी या डर नहीं था… बस एक थका हुआ सन्नाटा था।

सरकार की नजर में क्या मायने?

छत्तीसगढ़ के गृहमंत्री विजय शर्मा ने इसे नक्सलवाद के खिलाफ बड़ी सफलता बताया, लेकिन साथ ही यह भी माना कि ऐसे सरेंडर सिर्फ ताकत से नहीं, बल्कि भरोसे और पुनर्वास की नीति से संभव होते हैं। उनका कहना है कि देवजी लंबे समय तक छत्तीसगढ़ में सक्रिय रहा और बसव राजू के मारे जाने के बाद वह संगठन का बड़ा चेहरा बन गया था।

डर से बाहर निकलने की कोशिश

देवजी का सरेंडर यह बताता है कि नक्सलवाद सिर्फ बंदूक और विचारधारा की लड़ाई नहीं है, बल्कि यह इंसानों के भीतर चलने वाला संघर्ष भी है। जब हिंसा में पला-बढ़ा व्यक्ति खुद यह मान ले कि रास्ता गलत है, तो वह सिर्फ सिस्टम के लिए नहीं, समाज के लिए भी एक संकेत होता है।

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