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Home » छठी मइया की आराधना शुरू, जानिए चैती छठ के 4 दिनों का महत्व
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छठी मइया की आराधना शुरू, जानिए चैती छठ के 4 दिनों का महत्व

March 22, 2026No Comments4 Mins Read
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छठ
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News Samvad : चैती छठ का चार दिवसीय महापर्व रविवार से शुरू हो गया है। लोक आस्था, श्रद्धा और सूर्य उपासना का यह पर्व खास तौर पर बिहार, झारखंड, पूर्वी उत्तर प्रदेश और नेपाल में बड़े धूमधाम और नियम-कायदों के साथ मनाया जाता है।
नहाय-खाय से शुरू होकर यह पर्व 36 घंटे के कठिन निर्जला व्रत के साथ संपन्न होता है।

 सूर्य देव और छठी मैया की आराधना

इस पर्व में भगवान भास्कर (सूर्य देव) और छठी मैया की पूजा की जाती है। मान्यता है कि छठी मैया संतानों की रक्षा करती हैं और लंबी आयु का आशीर्वाद देती हैं।
पूरे अनुष्ठान में व्रती बेहद सख्त नियमों का पालन करते हैं और परिवार की सुख-समृद्धि व अच्छे स्वास्थ्य की कामना करते हैं।

पुजारी भुनेश्वर पंडित बताते हैं कि छठ की शुरुआत पवित्र स्नान से होती है और प्रसाद की तैयारी भी बेहद शुद्ध तरीके से की जाती है — गेहूं को गंगाजल से धोकर सुखाया जाता है और उसकी विशेष देखभाल की जाती है।

 पहला दिन: नहाय-खाय और कद्दू-भात

छठ का पहला दिन “नहाय-खाय” कहलाता है। इस दिन व्रती नदी, तालाब या कुएं में स्नान करके शुद्ध भोजन बनाते हैं।

क्या बनता है?

  • अरवा चावल
  • चने की दाल
  • कद्दू की सब्जी (बिना प्याज-लहसुन)

भगवान को भोग लगाने के बाद व्रती यही प्रसाद ग्रहण करते हैं और फिर इसे दूसरों में बांटा जाता है।

क्यों खास है कद्दू-भात?
कद्दू में लगभग 96% पानी होता है, जो आगे आने वाले निर्जला व्रत में शरीर को हाइड्रेट रखने में मदद करता है। साथ ही इसमें विटामिन, फाइबर और मिनरल्स होते हैं जो शरीर को मजबूत बनाते हैं।

 दूसरा दिन: खरना और गुड़ की खीर

दूसरे दिन को खरना या लोहंडा कहा जाता है। इस दिन व्रती पूरे दिन बिना पानी के उपवास रखते हैं।

शाम को छठी मैया को चढ़ाया जाता है:

  • गुड़ की खीर
  • रोटी
  • फल

इसके बाद व्रती प्रसाद ग्रहण करते हैं और यहीं से 36 घंटे का निर्जला व्रत शुरू हो जाता है।

गुड़ की खीर का महत्व:
गुड़ को शुद्ध माना जाता है और इसमें आयरन व ऊर्जा भरपूर होती है। यह शरीर को ताकत देता है और लंबे समय तक पानी में खड़े रहने के दौरान शरीर को गर्म भी रखता है।

 तीसरा दिन: संध्या अर्घ्य

तीसरे दिन व्रती डूबते सूर्य को अर्घ्य देने घाट पर जाते हैं।
बांस के दउरा में प्रसाद सजाकर, छठ गीतों के साथ पूजा की जाती है।

प्रसाद में शामिल होते हैं:

  • ठेकुआ (सबसे खास)
  • कसार
  • चावल के लड्डू
  • फल, नारियल, केला
  • गन्ना, अदरक, हल्दी

यह दृश्य बेहद भावुक और भक्ति से भरा होता है, जहां पूरा वातावरण छठ गीतों से गूंज उठता है।

 चौथा दिन: उषा अर्घ्य और समापन

अंतिम दिन उगते सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है।
इसके साथ ही छठ पर्व का समापन होता है।

इसके बाद व्रती प्रसाद बांटते हैं और लोग एक-दूसरे को बधाई देते हैं।

 क्या है धार्मिक मान्यता?

छठ पूजा केवल एक त्योहार नहीं बल्कि प्रकृति, अनुशासन और आस्था का संगम है।

  • छठी मैया को ब्रह्माजी की मानस पुत्री और सूर्य की बहन माना जाता है
  • त्रेतायुग में माता सीता ने छठ व्रत किया था
  • द्वापर युग में द्रौपदी ने भी यह पूजा की थी

 नालंदा और आंगारी धाम की खास पहचान

नालंदा के बड़गांव में मान्यता है कि भगवान श्रीकृष्ण के पौत्र राजा साम्य ने सूर्य उपासना करके कुष्ठ रोग से मुक्ति पाई थी।
यहीं 12 सूर्य मंदिरों (अर्क) में से एक स्थित है।

वहीं एकंगरसराय का आंगारी धाम भी बेहद प्रसिद्ध है। यहां का सूर्य मंदिर पश्चिममुखी है, जो बहुत दुर्लभ माना जाता है।
कहा जाता है कि यहां स्नान और अर्घ्य देने से गंभीर बीमारियों से राहत मिलती है।

आस्था के साथ स्वच्छता और अनुशासन

छठ पर्व की सबसे खास बात है इसकी सादगी, स्वच्छता और अनुशासन।
चार दिनों तक घर-परिवार से लेकर घाट तक साफ-सफाई का विशेष ध्यान रखा जाता है।

 कुल मिलाकर, छठ केवल पूजा नहीं बल्कि प्रकृति के प्रति सम्मान, शरीर और मन की साधना और परिवार के सुख-समृद्धि की कामना का पर्व है।

इसे भी पढ़ें : श्री महावीर मंडल पूर्वी क्षेत्र का गठन, रमेश सिंह अध्यक्ष, बजरंग वर्मा को बड़ी जिम्मेदारी

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