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Bhubaneswar/Ranchi : कभी-कभी जिंदगी में ऐसे मौके आते हैं जो सिर्फ करियर नहीं, सोच भी बदल देते हैं। ऐसा ही एक अनुभव रहा प्रसिद्ध गैस्ट्रोएंटरोलॉजिस्ट डॉ. जयंत घोष के लिए, जब उन्हें भुवनेश्वर में आयोजित तीसरी एडवांस एंडोस्कोपी कॉन्फ्रेंस में जापान के मशहूर विशेषज्ञ प्रोफेसर डॉ. नोरिया उएडो से सीधे सीखने का मौका मिला।
सीखने की भूख ही असली पहचान
डॉ. जयंत घोष पहले से ही अपने क्षेत्र में एक जाना-पहचाना नाम हैं, लेकिन इसके बावजूद उनकी सीखने की इच्छा आज भी उतनी ही मजबूत है। वे कहते हैं कि डॉक्टर का काम सिर्फ इलाज करना नहीं, बल्कि लगातार सीखते रहना भी है। यही वजह है कि वे इस कॉन्फ्रेंस में न सिर्फ शामिल हुए, बल्कि खुद को एक विद्यार्थी की तरह वहां प्रस्तुत किया।
जब किताबों से बाहर मिली असली सीख
कॉन्फ्रेंस के दौरान हुए लाइव केस सेशन उनके लिए सबसे खास रहे। उन्होंने बताया कि जो बातें किताबों में पढ़ते हैं, उन्हें अपनी आंखों के सामने होते देखना और समझना एक अलग ही अनुभव होता है। हर केस के साथ नई बारीकियां समझ में आईं, जो आगे मरीजों के इलाज में काम आएंगी।
सीधे जापान के एक्सपर्ट से सीखने का मौका
प्रोफेसर डॉ. नोरिया उएडो के साथ हैंड्स-ऑन ट्रेनिंग उनके लिए यादगार और बेहद खास अनुभव वाला पल रहा। उन्होंने कहा कि इस तरह के मौके रोज नहीं मिलते, जहां इतने बड़े विशेषज्ञ से आमने-सामने सीखने को मिले। इतने बड़े विशेषज्ञ से सीधे सीखना न सिर्फ ज्ञान बढ़ाता है, बल्कि आत्मविश्वास भी देता है। एंडोस्कोपी की कई एडवांस तकनीकों को उन्होंने करीब से समझा और खुद करके भी जाना।

सिर्फ ज्ञान ही नहीं, अपनापन भी मिला
डॉ. घोष ने कॉन्फ्रेंस की मेहमाननवाजी को भी खास बताया। उनका कहना है कि जब माहौल अच्छा होता है, तो सीखना और भी आसान हो जाता है। साई इंस्टीट्यूट ऑफ गैस्ट्रोएंटरोलॉजी एंड लिवर साइंसेज की टीम ने हर चीज का खास ध्यान रखा। उन्होंने दिल से धन्यवाद देते हुए कहा कि डॉ. आशुतोष मोहापात्रा और डॉ. सोनमून मोहापात्रा ने उन्हें फैकल्टी के रूप में बुलाकर जो सम्मान दिया, वह उनके लिए बहुत मायने रखता है। साथ ही, उन्होंने पूरी आयोजन टीम के प्रयासों की भी सराहना की।

आखिर में मरीज ही सबसे बड़ी प्राथमिकता
डॉ. जयंत घोष मानते हैं कि इस तरह की सीख का असली मतलब तभी है, जब इसका फायदा मरीजों तक पहुंचे। वे कहते हैं कि जो कुछ भी उन्होंने यहां सीखा है, उसे वे अपने काम में उतारेंगे, ताकि मरीजों को बेहतर और सुरक्षित इलाज मिल सके।
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