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Pakur (Jaydev Kumar) : पाकुड़ के सिद्धों कान्हु पार्क के पास गुरुवार की शाम रोज की तरह हलचल थी। बच्चे खेल रहे थे, लोग टहल रहे थे। तभी अचानक कुछ आवाजें गूंजने लगीं। ढोलक की थाप, कलाकारों की पुकार और एक कहानी जो धीरे-धीरे हर किसी को अपनी ओर खींचने लगी। यह कोई आम कार्यक्रम नहीं था, बल्कि ‘प्रोजेक्ट परख’ के तहत बाल विवाह के खिलाफ एक कोशिश थी, जो सीधे लोगों के दिल तक पहुंच गई।
एक कहानी, जो कई घरों की सच्चाई है
नुक्कड़ नाटक शुरू हुआ तो उसमें दिखी एक मासूम लड़की की जिंदगी। खेल-कूद की उम्र में शादी, अधूरी पढ़ाई, जिम्मेदारियों का बोझ और सपनों का टूटना। कलाकारों ने बिना किसी बनावटीपन के यह दिखाया कि बाल विवाह सिर्फ एक रस्म नहीं, बल्कि एक बच्चे से उसका बचपन छीन लेने जैसा है। भीड़ में खड़ी कई महिलाओं की आंखें नम हो गईं। कुछ बुजुर्ग सिर हिलाकर मानो अपनी पुरानी सोच पर सवाल उठा रहे थे।
जब दर्शक भी कहानी का हिस्सा बन गए
नाटक के दौरान कई ऐसे पल आए जब दर्शक खुद को उस कहानी में देखने लगे। एक बुजुर्ग ने धीरे से कहा, “हमारे समय में यह आम बात थी, पर अब समझ आता है कि यह गलत था।” बगल में खड़ी एक किशोरी अपनी सहेली से फुसफुसाकर कह रही थी, “हम पढ़ेंगे, जल्दी शादी नहीं करेंगे।” ऐसे छोटे-छोटे संवाद इस बात का संकेत थे कि संदेश असर कर रहा है।

प्रशासन भी आया लोगों के बीच
इस कार्यक्रम में प्रधान जिला एवं सत्र न्यायाधीश दिवाकर पांडेय और फैमिली जज रजनीश पाठक भी मौजूद रहे। उनके साथ डीसी मनीष कुमार और एसपी निधि द्विवेदी भी आम लोगों के बीच खड़े होकर पूरा नाटक देखते नजर आए। अधिकारियों ने साफ कहा कि कानून अपनी जगह है, लेकिन असली बदलाव तब आएगा जब समाज खुद आगे आएगा।
एक संदेश, जो दिल में उतर गया
नाटक खत्म हुआ तो कुछ पल के लिए सन्नाटा छा गया। फिर तालियों की गूंज ने माहौल बदल दिया। लेकिन यह सिर्फ तालियां नहीं थीं, बल्कि एक सोच में बदलाव की शुरुआत थी। लोग धीरे-धीरे अपने घर लौटने लगे, लेकिन उनके साथ एक सवाल भी जा रहा था कि क्या हम अपने आसपास होने वाले बाल विवाह को रोक पाएंगे?
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