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Ranchi (Pawan Thakur) : कहते हैं ननिहाल वह जगह होती है जहां बच्चे सबसे सुरक्षित महसूस करते हैं, जहां मामा-मामी का दुलार और नानी की कहानियां होती हैं। लेकिन रांची के अनगड़ा की रहने वाली एक 13 साल की मासूम के लिए उसका ननिहाल किसी खौफनाक मंजर से कम साबित नहीं हुआ। मां का साया पहले ही सिर से उठ चुका था और जिस ननिहाल से उसे ममता की उम्मीद थी, वहीं उसे दरिंदगी, कोख का बोझ, लोक-लाज के नाम पर चुप्पी और फिर बेघर होने का दंश झेलना पड़ा।
भरोसे का कत्ल और खौफ की रातें
घटना की शुरुआत तब हुई जब वह मासूम अपनी बुआ के साथ नानी के घर गई थी। पड़ोस की एक महिला (रिश्ते में मामी) ने उसे अपने घर सोने के लिए बुलाया। इल्जाम है कि उस रात उस महिला के बेटे ने न केवल उस बच्ची का बचपन रौंदा, बल्कि उसे जान से मारने की धमकी देकर खामोश कर दिया। वह मासूम रोज उस दरिंदगी को सहती रही, इस डर से कि शायद कोई उसकी बात नहीं सुनेगा।
जब अपनों ने ही फेर लिया मुंह
सच्चाई तब सामने आई जब बच्ची की तबीयत बिगड़ने लगी। बुआ उसे डॉक्टर के पास ले गई, जहां पता चला कि वह प्रेग्नेंट है। एक 13 साल की बच्ची, जो खुद अभी खिलौनों से खेलने-कूदने की उम्र में थी, उसके भीतर एक और जान पल रही थी। जब उसने रोते हुए अपने मामा-मामी को सब बताया, तो न्याय की उम्मीद में उसे फिर से निराशा हाथ लगी। समाज में बदनामी के डर से मामा-मामी ने गांव में बैठक बुलाकर मामले को दबा दिया। 26 जनवरी 2026, जब पूरा देश गणतंत्र का उत्सव मना रहा था, वह बच्ची बंद कमरों के भीतर असहनीय दर्द से गुजर रही थी। घर में ही उसकी डिलीवरी कराई गई। लेकिन कुदरत को कुछ और ही मंजूर था। 24 मार्च 2026 को बीमारी की वजह से उस नवजात ने दम तोड़ दिया।
बेघर कर दी गई ‘बेटी’
जुल्म की इंतहा तब हुई जब बच्चे की मौत के बाद मामा-मामी ने उस बच्ची को सहारा देने के बजाय घर से बाहर निकाल दिया। उसे धमकी दी गई कि “अगर दोबारा इधर आई तो जान से मारकर फेंक देंगे।” बिना मां की 13 साल की वह बच्ची, जिसके पास न घर था न सहारा, सड़कों पर न्याय के लिए सिसक रही थी।
डालसा बना ‘उम्मीद की किरण’
इस अंधेरे में पीएलवी (PLV) बेबी देवी एक फरिश्ता बनकर आईं। उन्होंने मामले की जानकारी डालसा सचिव राकेश रौशन को दी। इसके बाद कानून की मशीनरी हरकत में आई। झालसा के कार्यपालक अध्यक्ष न्यायमूर्ति सुजित नारायण प्रसाद और न्यायायुक्त अनिल कुमार मिश्रा के मार्गदर्शन में डालसा सचिव राकेश रौशन ने फौरी कार्रवाई की। सीनियर डीएसपी अमर कुमार पांडेय और टाटीसिल्वे थानेदार मामला दर्ज करने का निर्देश दिया गया। तुरंत पोक्सो एक्ट के तहत एफआईआर दर्ज की गयी।
कलम थामने की जिद और नया सवेरा
आज वह बच्ची सुरक्षित है। उसकी आंखों में बीते कल का खौफ तो है, लेकिन भविष्य की एक नई चमक भी है। उसने डालसा सचिव राकेश रौशन से कहा… “मैं पढ़ना चाहती हूं।” डालसा ने उसकी इस इच्छा को अपना संकल्प बना लिया है। उसे कस्तूरबा गांधी आवासीय विद्यालय में दाखिला दिलाने की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है। जिस समाज ने उसे दुत्कारा, आज कानून उसी बच्ची को फिर से खड़ा करने के लिए हाथ थामे खड़ी हैं।
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