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Ramgarh (Dharmendra Pradhan) : रामगढ़ जिले के चितरपुर प्रखंड में स्थित मां छिन्नमस्तिका सिद्ध पीठ रजरप्पा धाम सिर्फ एक मंदिर नहीं, लाखों लोगों की आस्था का केंद्र है। यहां आने वाला हर श्रद्धालु अपने साथ विश्वास, मनोकामना और उम्मीद लेकर पहुंचता है। कोई संतान सुख की कामना करता है, कोई नौकरी के लिए माथा टेकता है, तो कोई सिर्फ मां के दर्शन से मन की शांति खोजता है। लेकिन वर्षों से यहां श्रद्धालुओं को दर्शन के साथ कई परेशानियों का भी सामना करना पड़ता रहा है। भीड़भाड़, जाम, अव्यवस्थित दुकानें, पार्किंग की कमी, घाट तक पहुंचने में दिक्कत और सुरक्षा जैसी समस्याएं अक्सर लोगों की श्रद्धा पर भारी पड़ जाती थीं। अब प्रशासन इन परेशानियों को खत्म कर रजरप्पा धाम को नया स्वरूप देने की तैयारी में जुट गया है। शनिवार को डीसी ऋतुराज ने मंदिर परिसर का विस्तृत निरीक्षण कर साफ संकेत दे दिया कि अब रजरप्पा धाम सिर्फ आस्था का केंद्र नहीं, बल्कि व्यवस्थित धार्मिक पर्यटन स्थल के रूप में भी विकसित किया जाएगा।

सुबह की आरती से शुरू होती है हजारों लोगों की उम्मीद
रजरप्पा मंदिर की सुबह बहुत अलग होती है। सूरज निकलने से पहले ही मंदिर परिसर में घंटियों की आवाज गूंजने लगती है। दूर-दूर से आए श्रद्धालु कतार में खड़े होते हैं। कोई परिवार के साथ, कोई अकेले, तो कोई नवविवाहित जोड़ा पहली पूजा के लिए पहुंचता है। मंदिर के बाहर फूल, प्रसाद और चुनरी बेचने वाले दुकानदारों की अपनी दुनिया है। उनकी रोजी-रोटी भी इसी आस्था से जुड़ी है। मंदिर के पास दुकान चलाने वाले कई परिवार पीढ़ियों से यही काम कर रहे हैं। इसी वजह से जब विकास और अतिक्रमण हटाने की बात होती है, तो यह सिर्फ निर्माण का मामला नहीं होता, बल्कि कई परिवारों की जिंदगी भी उससे जुड़ जाती है।
बैठक में सिर्फ नक्शा नहीं, लोगों की चिंता भी थी
निरीक्षण से पहले प्रशासनिक भवन में एक अहम बैठक हुई। इसमें दर्जा प्राप्त मंत्री फागू बेसरा, मंदिर प्रबंधन समिति के सदस्य, वन विभाग, राजस्व विभाग और अन्य विभागों के अधिकारी मौजूद रहे। बैठक में झारखंड हाईकोर्ट के आदेशों के तहत मंदिर परिसर के पुनर्विकास की रूपरेखा रखी गई। लेकिन यह सिर्फ फाइलों और नक्शों की बैठक नहीं थी। यहां दुकानदारों, स्थानीय लोगों और समिति के सदस्यों की चिंताएं भी सामने आईं। कई लोगों ने कहा कि विकास जरूरी है, लेकिन रोजी-रोटी भी उतनी ही जरूरी है। दुकानों को हटाया गया है, तो पुनर्वास भी सम्मानजनक होना चाहिए। श्रद्धालुओं की सुविधा बढ़े, लेकिन स्थानीय लोगों का जीवन प्रभावित न हो। उपायुक्त ऋतुराज ने सभी सुझावों को गंभीरता से सुना और भरोसा दिलाया कि विकास और पुनर्वास दोनों साथ-साथ चलेंगे।

बस स्टैंड से घाट तक बदलने वाली है तस्वीर
बैठक के बाद उपायुक्त ने मंदिर परिसर और आसपास के इलाकों का स्थल निरीक्षण किया। प्रस्तावित बस स्टैंड, प्रवेश और निकास द्वार, घाट निर्माण, दुकानों के पुनर्निर्माण और अन्य आधारभूत सुविधाओं के लिए चिन्हित स्थलों का जायजा लिया गया। आज भी कई श्रद्धालुओं को बस से उतरने के बाद काफी दूरी पैदल तय करनी पड़ती है। त्योहारों के समय जाम और भीड़ से हालात और मुश्किल हो जाते हैं। प्रशासन अब ऐसी व्यवस्था चाहता है जहां दर्शन के लिए आने वाला व्यक्ति परेशानी नहीं, सुविधा महसूस करे। घाटों को भी सुरक्षित और साफ-सुथरा बनाने की योजना है, ताकि पूजा और स्नान के दौरान किसी तरह की असुविधा न हो।
अतिक्रमण हटने के बाद सबसे बड़ा सवाल, अब दुकान कहां लगेगी
मंदिर परिसर से अतिक्रमण हटाया गया है। जिन दुकानों को हटाया गया, उनके सामने सबसे बड़ा सवाल यही है कि अब रोजी-रोटी कैसे चलेगी। मीडिया से बातचीत में उपायुक्त ने कहा कि खाली जमीनों का चिन्हितीकरण किया जा रहा है और दुकानदारों को व्यवस्थित तरीके से नए स्थानों पर बसाया जाएगा। यह बात स्थानीय दुकानदारों के लिए राहत की तरह है। क्योंकि उनके लिए यह सिर्फ दुकान नहीं, पूरे परिवार का सहारा है। एक दुकानदार ने कहा, “हम लोग मां के दरबार से ही घर चलाते हैं। अगर नई जगह अच्छी मिलेगी, तो हमें भी खुशी होगी कि मंदिर सुंदर बने।”

श्रद्धालुओं को मिलेगा साफ, सुरक्षित और सहज अनुभव
प्रशासन का कहना है कि रजरप्पा मंदिर झारखंड का प्रमुख आस्था केंद्र है, इसलिए यहां की व्यवस्था मजबूत करना सबसे बड़ी प्राथमिकता है। यातायात, पार्किंग, सुरक्षा, स्वच्छता, भीड़ नियंत्रण और महिलाओं व बुजुर्गों की सुविधा पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है। उद्देश्य यह है कि यहां आने वाला हर श्रद्धालु बिना परेशानी के पूजा कर सके। अक्सर लोग कहते हैं कि मंदिर में शांति मिलती है, लेकिन रास्ते की परेशानी उस शांति को कम कर देती है। अब कोशिश है कि यात्रा भी उतनी ही सहज हो, जितनी श्रद्धा।
पेड़ों की कटाई नहीं, संतुलन के साथ विकास
विकास कार्यों के दौरान कुछ पेड़ों की कटाई की जरूरत पड़ सकती है। इसे लेकर वन विभाग के साथ अलग से चर्चा हुई। डीसी ने स्पष्ट किया कि जहां पेड़ काटे जाएंगे, वहां क्षतिपूर्ति वनीकरण किया जाएगा। यानी विकास होगा, लेकिन प्रकृति की कीमत पर नहीं। यह कदम इसलिए भी जरूरी है, क्योंकि रजरप्पा की पहचान सिर्फ मंदिर से नहीं, बल्कि उसके प्राकृतिक सौंदर्य से भी है।
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