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Ranchi : झारखंड हाई कोर्ट ने यौन हिंसा और पॉक्सो मामलों में पीड़िताओं को बेहतर सुरक्षा, त्वरित न्याय और सम्मानजनक पुनर्वास दिलाने के लिए राज्य सरकार, पुलिस और संबंधित विभागों को 19 महत्वपूर्ण निर्देश जारी किए हैं। अदालत ने साफ कहा है कि ऐसे मामलों में किसी भी तरह की लापरवाही या देरी बर्दाश्त नहीं की जाएगी।मुख्य न्यायाधीश एमएस सोनक और न्यायमूर्ति राजेश शंकर की खंडपीठ ने कहा कि निर्देशों का तत्काल पालन सुनिश्चित किया जाए। यदि कोई अधिकारी अपने दायित्वों का पालन नहीं करता है तो उसके खिलाफ विभागीय कार्रवाई के साथ प्राथमिकी दर्ज करने तक की कार्रवाई की जा सकती है।
जीरो एफआईआर दर्ज करना होगा अनिवार्य
हाई कोर्ट ने पुलिस को स्पष्ट निर्देश दिया है कि यौन हिंसा की शिकायत मिलने पर बिना किसी देरी के जीरो एफआईआर दर्ज की जाए। शिकायत दर्ज करने से इनकार करने या जानबूझकर देरी करने वाले पुलिसकर्मियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी।अदालत का मानना है कि ऐसे मामलों में शुरुआती समय बेहद महत्वपूर्ण होता है और देरी से पीड़िता को न्याय मिलने में मुश्किलें बढ़ सकती हैं।
तुरंत इलाज और समय पर फॉरेंसिक जांच
कोर्ट ने कहा है कि घटना के बाद पीड़िता को तत्काल चिकित्सा सहायता उपलब्ध कराई जाए। मेडिकल और फॉरेंसिक जांच भी तय समय के भीतर पूरी होनी चाहिए ताकि महत्वपूर्ण सबूत सुरक्षित रह सकें।साथ ही जांच और इलाज के दौरान पीड़िता की गोपनीयता, गरिमा और सम्मान का पूरा ध्यान रखने के निर्देश दिए गए हैं।
जांच की निगरानी वरिष्ठ अधिकारी करेंगे
यौन अपराध के मामलों की जांच के लिए समर्पित जांच अधिकारी नियुक्त किए जाएंगे। इनकी निगरानी एसपी या एएसपी स्तर के अधिकारी करेंगे।अदालत ने कहा कि जांच में अनावश्यक देरी से सबूत नष्ट होने और मामले के कमजोर पड़ने का खतरा रहता है। इसलिए हर स्तर पर जवाबदेही तय की जानी चाहिए।
दुष्कर्म और पॉक्सो मामलों के लिए अलग समय सीमा
हाई कोर्ट ने दुष्कर्म के मामलों की प्रारंभिक जांच 15 दिनों के भीतर पूरी करने का निर्देश दिया है।वहीं पॉक्सो मामलों में पीड़ित बच्चे या बच्ची को 24 घंटे के भीतर आश्रय, सुरक्षा और चिकित्सा सुविधा उपलब्ध कराना अनिवार्य होगा।
महिला अधिकारी ही दर्ज करेंगी बयान
अदालत ने कहा है कि यौन अपराध की शिकार महिलाओं और बच्चों का बयान केवल महिला पुलिस अधिकारी द्वारा ही दर्ज किया जाए। इससे पीड़िताओं को अपनी बात रखने में सहूलियत मिलेगी और वे कम असहज महसूस करेंगी।
मुफ्त कानूनी सहायता और पुनर्वास की व्यवस्था
कोर्ट ने राज्य सरकार को निर्देश दिया है कि पीड़िताओं को निःशुल्क कानूनी सहायता उपलब्ध कराई जाए। जरूरत पड़ने पर उन्हें अस्थायी आश्रय, पुलिस सुरक्षा और गवाह संरक्षण भी दिया जाए।इसके अलावा तत्काल आर्थिक सहायता, मनोवैज्ञानिक परामर्श, रोजगार सहायता और दीर्घकालिक सामाजिक एवं आर्थिक पुनर्वास के लिए स्पष्ट नीति बनाकर लागू करने को कहा गया है।अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि किसी मामले का अंतिम फैसला चाहे जो भी हो, पीड़िता के लिए अंतिम मुआवजा तय करना अनिवार्य होगा।
पहचान उजागर करने वालों पर होगी कार्रवाई
हाई कोर्ट ने मीडिया, पुलिस और न्यायिक प्रक्रिया से जुड़े सभी लोगों को पीड़िता की पहचान पूरी तरह गोपनीय रखने का निर्देश दिया है।यदि कोई व्यक्ति या संस्था पीड़िता की पहचान सार्वजनिक करती है तो उसके खिलाफ विभागीय और कानूनी कार्रवाई की जाएगी।
नारी निकेतन को बनाया जाएगा सुरक्षित आश्रय
खंडपीठ ने नारी निकेतन (शक्ति सदन) को यौन हिंसा की शिकार महिलाओं के लिए भी आश्रय गृह के रूप में उपयोग करने का निर्देश दिया है।कोर्ट ने कहा कि यहां रहने की कोई तय अधिकतम समय सीमा नहीं होगी। हर मामले की परिस्थितियों को देखते हुए निर्णय लिया जाएगा। साथ ही राज्य सरकार को सभी आश्रय गृहों और पुनर्वास केंद्रों की जानकारी व्यापक स्तर पर प्रचारित करने का निर्देश दिया गया है ताकि जरूरतमंद महिलाओं तक सुविधाओं की जानकारी पहुंच सके।
बलात्कार से जन्मे बच्चों की शिक्षा की जिम्मेदारी राज्य की
हाई कोर्ट ने प्रत्येक जिले में एक नोडल अधिकारी नियुक्त करने का निर्देश दिया है जो बलात्कार से जन्मे बच्चों की शिक्षा और कल्याण की निगरानी करेगा।ऐसे बच्चों को कक्षा 12 तक मुफ्त शिक्षा उपलब्ध कराई जाएगी। इसके अलावा यदि कोई बच्चा प्रतिभावान होकर IIT, NIT, AIIMS या IIM जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में चयनित होता है तो उसे छात्रवृत्ति भी दी जाएगी।
मुआवजा 30 दिनों में देने का निर्देश
कोर्ट ने कहा कि ट्रायल कोर्ट मुकदमे के शुरुआती चरण में ही अंतरिम राहत देने पर विचार करे।साथ ही अंतिम फैसला आने पर, चाहे आरोपी दोषी ठहराया जाए, बरी हो जाए या फरार हो, पीड़िता के लिए अंतिम मुआवजा तय करना जरूरी होगा। अदालत ने मुआवजा राशि का भुगतान 30 दिनों के भीतर करने का निर्देश दिया है।
मामलों के जल्द निपटारे पर जोर
हाई कोर्ट ने कहा कि यौन अपराध से जुड़े मामलों में भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) की धारा 346 के तहत निर्धारित समयसीमा का सख्ती से पालन किया जाए।निचली अदालतों को भी अनावश्यक स्थगन से बचने और मामलों की सुनवाई तेजी से पूरी करने के निर्देश दिए गए हैं।
टू फिंगर टेस्ट पर फिर दोहराई रोक
अदालत ने राज्य सरकार को सभी सरकारी और निजी अस्पतालों में “टू फिंगर टेस्ट” पर पूर्ण प्रतिबंध लागू करने के निर्देश जारी करने को कहा है।कोर्ट ने साफ कहा कि इस प्रतिबंध का उल्लंघन पेशेवर कदाचार माना जाएगा और संबंधित लोगों के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी।
दूरदराज की लड़कियों के लिए जागरूकता और आत्मरक्षा प्रशिक्षण
हाई कोर्ट ने कानूनी जागरूकता बढ़ाने पर भी जोर दिया है। अदालत ने निर्देश दिया कि दूरदराज क्षेत्रों की लड़कियों के लिए जागरूकता अभियान चलाए जाएं।स्कूलों, कॉलेजों और गांवों में निशुल्क आत्मरक्षा प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित करने की भी बात कही गई है ताकि लड़कियां अपने अधिकारों और सुरक्षा उपायों के प्रति जागरूक हो सकें।
हेल्पलाइन 181 और 112 को और प्रभावी बनाने की तैयारी
कोर्ट ने महिला हेल्पलाइन 181 और आपातकालीन सेवा 112 को और अधिक प्रभावी बनाने का निर्देश दिया है। साथ ही दोनों सेवाओं को आपस में जोड़ने की संभावना पर भी विचार करने को कहा गया है ताकि संकट के समय पीड़िताओं को तुरंत मदद मिल सके।
पीड़ित-केंद्रित न्याय व्यवस्था की दिशा में बड़ा कदम
झारखंड हाई कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता धीरज कुमार ने अदालत के इन निर्देशों को पीड़ित-केंद्रित न्याय व्यवस्था की दिशा में महत्वपूर्ण पहल बताया है।हाई कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि यौन हिंसा और पॉक्सो मामलों में संवेदनशीलता, जवाबदेही और त्वरित कार्रवाई अब केवल अपेक्षा नहीं बल्कि अनिवार्य जिम्मेदारी है। अदालत के इन निर्देशों का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि पीड़िताओं को न्याय पाने के लिए लंबा इंतजार न करना पड़े और उन्हें सुरक्षा, सम्मान तथा पुनर्वास की सभी जरूरी सुविधाएं समय पर मिल सकें।

