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Ranchi : जिस उम्र में बच्चे अपनी मां के आंचल में छुपकर लोरियां सुनते हैं और पिता के कंधों पर बैठकर दुनिया देखने की जिद करते हैं, उस उम्र में रांची के मोरहाबादी का एक सात साल का मासूम जिंदगी के सबसे क्रूर थपेड़े झेल रहा था। भूख की आग, सूनी आंखें और सड़कों की धूल ही उसकी नियति बन चुकी थी। लेकिन जब समाज और अपनों ने मुंह मोड़ लिया, तब कानून के रखवालों ने आगे बढ़कर इस बच्चे को गले से लगाया। रांची DLSA यानी जिला विधिक सेवा प्राधिकार ने न सिर्फ इस बच्चे को एक नई जिंदगी दी, बल्कि उसके टूट चुके सपनों में फिर से उड़ान भर दी।
पहले मां छूटी, फिर भरी बाजार में पिता की हत्या… और अनाथ हो गया बचपन
इस बच्चे की जिंदगी का सफर बेहद दर्दनाक रहा। मां गंभीर बीमारी से जूझ रही थी और एक दिन वह हमेशा के लिए छोड़कर चली गई। पिता ही उस मासूम का इकलौता सहारा थे, लेकिन 2 अक्टूबर 2019 की उस काली शाम ने बच्चे से वह आखिरी उम्मीद भी छीन ली। मोरहाबादी मछली मार्केट के पास उसके पिता की बेरहमी से हत्या कर दी गई। वह सात साल का बच्चा अचानक इस बड़ी दुनिया में बिल्कुल अकेला हो गया। पेट की भूख मिटाने के लिए वह कभी सड़कों पर दाने-दाने को तरसता, तो कभी मांग-छान कर अपना पेट भरता। कभी राहत की उम्मीद में अपनी बुआ के घर जाता, तो वहां भी उसे नन्हीं उंगलियों से बकरियां चरानी पड़तीं। उसका बचपन कहीं गुम हो चुका था।
जब कानून फरिश्ता बनकर आया और गुमला से ढूंढ निकाला
मासूम की इस बेबसी की खबर जब रांची डालसा तक पहुंची, तो न्याय व्यवस्था का संवेदनशील रूप सामने आया। झालसा के कार्यपालक अध्यक्ष और न्यायमूर्ति सुजीत नारायण प्रसाद के निर्देश पर एक फौरी योजना बनी। झालसा की सदस्य सचिव कुमारी रंजना अस्थाना और न्यायायुक्त अनिल कुमार मिश्रा-1 के मार्गदर्शन में डालसा सचिव राकेश रौशन ने टीम तैयार की। लालपुर पुलिस के सहयोग से बच्चे को गुमला के एक सुदूर इलाके से रेस्क्यू किया गया। जब उसे रांची लाया गया, तो उसकी आंखों में डर और अनिश्चितता थी, जिसे डालसा की टीम ने अपने अपनेपन से दूर किया।
पढ़ाई की छांव और भविष्य के लिए 5 लाख का सहारा
बच्चे के पुनर्वास के लिए डालसा ने दिन-रात एक कर दिया। जिला शिक्षा पदाधिकारी और डीसीपीयू की मदद से उसका दाखिला रांची के ‘नेताजी सुभाष चंद्र बोस आवासीय विद्यालय’ में कराया गया। अब उसे न तो सिर छिपाने की चिंता थी और न ही अगले वक्त की रोटी की। इसके साथ ही, बच्चे के कल को सुरक्षित करने के लिए डालसा ने उसे 5 लाख रुपये का पीड़ित मुआवजा दिलाया। बच्चे के नाम से बैंक में खाता खुलवाकर 1 लाख रुपये उसके तत्कालीन खर्चों के लिए रखे गए, और बाकी के 4 लाख रुपये की फिक्स्ड डिपॉजिट करा दी गई। यह रकम तब तक सुरक्षित रहेगी जब तक वह 18 साल का होकर अपने पैरों पर खड़ा नहीं हो जाता।
“मैं बड़ा होकर पुलिस अफसर बनूंगा…”
आज वह सहमा हुआ बच्चा नेताजी सुभाष चंद्र बोस स्कूल की तीसरी क्लास में मुस्कुराता हुआ नजर आता है। जब कोई उससे पूछता है कि तुम क्या बनोगे? तो उसकी आंखों में एक अजीब सी चमक आ जाती है। वह पूरे गर्व से कहता है, “मैं बड़ा होकर पुलिस अफसर बनूंगा।” शायद वह अपनी जैसी बेबसी किसी और बच्चे की जिंदगी में नहीं देखना चाहता।
आपकी एक सूचना बदल सकती है किसी मासूम की दुनिया
इस भावुक कर देने वाले मामले के बाद डालसा सचिव राकेश रौशन ने समाज के हर नागरिक से अपील की है। उन्होंने कहा कि हमारे आसपास ऐसे कई बच्चे हो सकते हैं जो अपनों को खोकर अंधेरे में जी रहे हैं। अगर आपके पास ऐसी कोई भी जानकारी हो, या आपको मुफ्त कानूनी सहायता की जरूरत हो, तो बेझिझक डालसा, रांची के दफ्तर में आएं या टोल फ्री नंबर 15100 पर फोन करें। आपका एक सजग कदम किसी अनाथ बच्चे की तकदीर बदल सकता है।
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