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Patna : बिहार सरकार के स्वास्थ्य विभाग ने हाथीपांव यानी लिम्फेटिक फाइलेरिया को खत्म करने की दिशा में शानदार कामयाबी हासिल की है। साल 2026 में पहली बार राज्य के चार जिलों अररिया, मधेपुरा, सुपौल और किशनगंज ने ट्रांसमिशन असेसमेंट सर्वे (TAS-1) के सभी कड़े पैमानों को पास कर लिया है। इसका मतलब यह हुआ कि अब इन जिलों में लोगों को सामूहिक तौर पर दवा बांटने का अभियान रोकने का रास्ता साफ हो गया है और ये जिले अब फाइलेरिया के खात्मे की निगरानी वाले चरण में पहुंच गए हैं।
बिहार की इस बड़ी सफलता की UN यानी संयुक्त राष्ट्र और WHO यान विश्व स्वास्थ्य संगठन ने भी खुलकर तारीफ की है। दुनिया के इन बड़े संगठनों से मिली सराहना यह बताती है कि बिहार का सरकारी स्वास्थ्य ढांचा, दवा खिलाने की रणनीतियां और लाखों स्वास्थ्यकर्मियों की मेहनत बिल्कुल सही दिशा में काम कर रही हैं। यह कामयाबी भारत को साल 2027 तक पूरी तरह फाइलेरिया मुक्त बनाने के राष्ट्रीय लक्ष्य को हासिल करने में बहुत मददगार साबित होगी।
एक ही दिन में लक्ष्य से 35 फीसदी ज्यादा दवा बांटी
भारत को साल 2027 तक फाइलेरिया से मुक्त करने के लिए इस साल सामूहिक दवा सेवन अभियान चलाया जा रहा था। इसके तहत बिहार में एक करोड़ लोगों को फाइलेरिया से बचाव की दवा खिलाने का राज्य स्तरीय लक्ष्य तय किया गया था। लेकिन स्वास्थ्य विभाग ने इस लक्ष्य को पीछे छोड़ते हुए 11 फरवरी 2026 को सिर्फ एक दिन के भीतर एक करोड़ पैंतीस लाख लोगों को अपने सामने दवा खिलाई। यह आंकड़ा तय किए गए शुरुआती लक्ष्य से 35 प्रतिशत ज्यादा है, जो अपने आप में एक रिकॉर्ड है।

सामने खड़े होकर दवा खिलाने की रणनीति आई काम
राज्य के स्वास्थ्य मंत्री निशांत ने इस कामयाबी पर खुशी जताते हुए कहा कि यह सिर्फ किसी एक स्वास्थ्य कार्यक्रम की सफलता नहीं है, बल्कि यह सरकार की बेहतर नीतियों और जनता की भागीदारी का नतीजा है। उन्होंने बताया कि इस अभियान के दौरान ‘डायरेक्टली ऑब्जर्व्ड ट्रीटमेंट’ नीति को सख्ती से लागू किया गया था। इसके तहत स्वास्थ्यकर्मी सिर्फ लोगों के घरों पर दवा छोड़कर नहीं आते थे, बल्कि अपनी मौजूदगी में लोगों को दवा खिलाते भी थे। इसी वजह से दवा खाने वाले लोगों की संख्या में भारी बढ़ोतरी हुई और आज इसके बेहतरीन नतीजे सबके सामने हैं। स्वास्थ्य मंत्री ने इस सफलता का पूरा श्रेय राज्य के लाखों आशा कार्यकर्ताओं, एएनएम, डॉक्टरों, जिला और ब्लॉक स्तर के अधिकारियों, सहयोगी संस्थाओं और आम जनता को दिया, जिन्होंने मिलकर इसे एक जन-आंदोलन बना दिया।
11 जिलों में संक्रमण की दर एक प्रतिशत से नीचे आई
स्वास्थ्य विभाग के आंकड़ों के मुताबिक, बिहार के 11 जिलों के कुल 89 ब्लॉकों में लगातार चले अभियानों की वजह से फाइलेरिया संक्रमण की दर अब एक प्रतिशत से भी कम रह गई है। इन जिलों में अररिया, अरवल, किशनगंज, मधेपुरा, मधुबनी, सुपौल, गया, कैमूर, नालंदा, जहानाबाद और पटना शामिल हैं। अभी हाल ही में अररिया, किशनगंज, मधेपुरा और सुपौल के 37 ब्लॉकों में ट्रांसमिशन असेसमेंट सर्वे (TAS-1) किया गया था, जिसमें से 35 ब्लॉकों ने पहली बार में ही बाजी मार ली। इसमें अररिया और मधेपुरा जिले पूरी तरह सफल घोषित होकर अब सर्वे के दूसरे चरण (TAS-2) के लिए चुन लिए गए हैं, जबकि सुपौल के भी सभी ब्लॉक इस सर्वे को पास करके निगरानी के अगले दौर में पहुंच चुके हैं।
जुलाई में रात के समय लिए जाएंगे खून के सैंपल
फाइलेरिया को जड़ से मिटाने के लिए स्वास्थ्य विभाग आगे की तैयारी में जुट गया है। इसी कड़ी में जुलाई के महीने में राज्य के 25 जिलों के 107 ब्लॉकों में प्री-ट्रांसमिशन असेसमेंट सर्वे (Pre-TAS) शुरू होने जा रहा है। इसके तहत हर ब्लॉक में तीन तय जगहों पर रात के समय लोगों के खून के सैंपल लिए जाएंगे। रात में सैंपल इसलिए लिए जाते हैं क्योंकि फाइलेरिया के परजीवी रात के वक्त ही खून में ज्यादा सक्रिय होते हैं। इन सैंपलों की जांच से यह पता लगाया जाएगा कि संबंधित इलाकों में संक्रमण की दर एक प्रतिशत से कम है या नहीं, ताकि आगे की रणनीति बनाई जा सके।
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