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Patna : बिहार की धरती के नीचे आज भी इतिहास के ऐसे कई पन्ने दबे पड़े हैं, जिनके बारे में दुनिया बहुत कम जानती है। कहीं सदियों पुराने मंदिरों के टूटे हुए पत्थर हैं, तो कहीं ऐसी प्राचीन संरचनाएं, जो अब तक मिट्टी की परतों में छिपी हुई हैं। अब बिहार सरकार इन्हीं अनदेखी धरोहरों को दुनिया के सामने लाने की तैयारी में जुट गई है। सीएम सम्राट चौधरी ने राज्य के प्रमुख ऐतिहासिक और धार्मिक स्थलों का वैज्ञानिक सर्वे, संरक्षण और विकास कराने का निर्देश दिया है। सरकार का मानना है कि अगर इन धरोहरों को सही तरीके से सहेजा गया तो बिहार सिर्फ इतिहास पढ़ाने वाला राज्य नहीं रहेगा, बल्कि दुनिया भर के पर्यटकों को अपनी ओर खींचने वाला बड़ा पर्यटन केंद्र भी बन सकता है।
मां मुंडेश्वरी के बिखरे पत्थरों में छिपा है इतिहास का खजाना
कैमूर जिले की पहाड़ियों पर स्थित मां मुंडेश्वरी मंदिर देश के सबसे प्राचीन जीवित मंदिरों में गिना जाता है। हर साल यहां हजारों श्रद्धालु पहुंचते हैं, लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि मंदिर के आसपास फैले पत्थरों और भग्नावशेषों में भी सदियों पुराना इतिहास छिपा हुआ है। इसी इतिहास को सामने लाने के लिए देश के वरिष्ठ पुरातत्वविदों की टीम ने सीएम सम्राट चौधरी से मुलाकात की। विशेषज्ञों ने बताया कि मंदिर परिसर और आसपास हजारों प्राचीन अवशेष बिखरे पड़े हैं। अगर इनका वैज्ञानिक तरीके से संरक्षण, प्रलेखन और पुनर्स्थापन किया जाए तो पूरा इलाका भारतीय पुरातत्व के सबसे महत्वपूर्ण केंद्रों में शामिल हो सकता है।
सीएम सम्राट चौधरी ने अधिकारियों को निर्देश दिया कि विशेषज्ञों की सिफारिशों के आधार पर चरणबद्ध योजना बनाई जाए। सिर्फ मंदिर ही नहीं, बल्कि पूरे कैमूर क्षेत्र को पर्यटन के लिहाज से विकसित किया जाए ताकि यहां आने वाला हर पर्यटक इतिहास और प्रकृति दोनों का अनुभव कर सके।
अब सिर्फ दर्शन नहीं, इतिहास को समझने भी आएंगे पर्यटक
बैठक में कैमूर के तिलहाड़ कुंड, करकटगढ़ और आसपास के प्राकृतिक व प्रागैतिहासिक महत्व वाले इलाकों को भी जोड़ने पर चर्चा हुई। योजना है कि पूरे क्षेत्र को हेरिटेज और इको टूरिज्म सर्किट के रूप में विकसित किया जाए। इस इलाके की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह बनारस-कोलकाता एक्सप्रेसवे से ज्यादा दूर नहीं है। सड़क संपर्क बेहतर होने के बाद यहां पहुंचना आसान होगा। इसका सीधा फायदा स्थानीय लोगों को मिलेगा। होटल, होम स्टे, परिवहन, स्थानीय हस्तशिल्प, गाइड सेवा और छोटे कारोबार को नई रफ्तार मिलने की उम्मीद है। विशेषज्ञों का यह भी मानना है कि अगर इन स्थलों का वैज्ञानिक तरीके से संरक्षण हुआ तो भविष्य में इन्हें यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में शामिल कराने की दिशा में भी मजबूत पहल की जा सकती है।
जमीन के नीचे छिपे इतिहास को खोजेगी नई तकनीक
सरकार अब पुरातत्व के काम में आधुनिक तकनीक का भी सहारा लेने जा रही है। सीएम ने बोधगया स्थित महाबोधि मंदिर परिसर और उसके आसपास LiDAR और GPR जैसी आधुनिक तकनीकों से सर्वे कराने का निर्देश दिया है। इन तकनीकों की मदद से बिना खुदाई किए जमीन के भीतर मौजूद पुरानी संरचनाओं और अवशेषों का पता लगाया जा सकेगा। इससे उत्खनन का काम पहले से ज्यादा सटीक होगा और ऐतिहासिक धरोहरों को नुकसान पहुंचने की संभावना भी कम होगी। यही तरीका आगे दूसरे महत्वपूर्ण स्थलों पर भी अपनाया जाएगा ताकि वैज्ञानिक तरीके से इतिहास को सामने लाया जा सके।
सुल्तानगंज, मंदार और केसरिया भी बदलेंगे तस्वीर
बैठक में सुल्तानगंज और मंदार के संरक्षण और विकास पर भी विस्तार से चर्चा हुई। सरकार चाहती है कि इन धार्मिक और ऐतिहासिक स्थलों को बेहतर सुविधाओं के साथ विकसित किया जाए ताकि यहां आने वाले श्रद्धालुओं और पर्यटकों की संख्या बढ़े। वहीं, दुनिया के सबसे बड़े बौद्ध स्तूपों में गिने जाने वाले केसरिया स्तूप के शेष हिस्से का वैज्ञानिक उत्खनन कराने का भी फैसला लिया गया है। अब तक इस विशाल स्तूप का केवल कुछ हिस्सा ही सामने आया है। माना जा रहा है कि बाकी क्षेत्र में भी कई महत्वपूर्ण पुरातात्विक अवशेष मौजूद हो सकते हैं, जो बिहार के इतिहास की नई कहानी बता सकते हैं।
इतिहास की रक्षा से बदलेगी गांवों की तस्वीर
बैठक में मौजूद विशेषज्ञों ने साफ कहा कि धरोहरों का संरक्षण सिर्फ पुरानी इमारतों को बचाने का काम नहीं है। जब किसी ऐतिहासिक स्थल का विकास होता है तो उसके आसपास के गांवों की तस्वीर भी बदलने लगती है। सड़कें बनती हैं, छोटे कारोबार शुरू होते हैं, युवाओं को रोजगार मिलता है और स्थानीय संस्कृति को नई पहचान मिलती है। सीएम सम्राट चौधरी ने भी इसी सोच पर जोर देते हुए कहा कि बिहार की धरती के नीचे आज भी इतिहास का बड़ा खजाना छिपा है। जरूरत उसे वैज्ञानिक तरीके से खोजने और सुरक्षित रखने की है।
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